खेती तो कभी भी फायदे की चीज नहीं रही साहब। चंपारण से लेकर आज तक।
प्रेमचंद के होरी की महागाथा से लेकर नागार्जुन की किसान-त्रासदी के बोध तक।
नागार्जुन की “अकाल और उसके बाद” अन्नाभाव की एक करुण गाथा है।
शासक और बिचौलिए के चक्रव्यूह में फंसा किसान अभिमन्यु की तरह अब तक सीधी लड़ाई ही लड़ता रहा।
वह अपनों से दांव-पेच कब चल सका?
परिणाम……..
यह विडंबना है कि खेती से सबका पेट भरने वाले किसानों को सदा-सर्वदा अपने पेट के लिए उन लोगों से ही लड़ना पड़ा जो उनके पैदा किये गये अनाज की जमाखोरी और
कालाबाजारी से अनाज के बाजार को नियंत्रित कर शासकीय शक्तियों में तब्दील हो चुके थे।
किसानों के पेट पर उन्हीं लोगों ने लात मारी जिनका अस्तित्व उन्हीं के उपजाए खाद्यान्न पर टिका था।
समाज के हर व्यक्ति का पेट भरा हो इसके लिए खेती को प्राथमिकता पर रखना होगा। प्राथमिकता देनी होगी किसानों को जो सबका पेट भरने में ही अपना भविष्य देखते हैं।
पर स्थितियां इसके उलट हैं।
खेती सबका पेट पालने के बाद भी अपने मूल किसान का पेट कब भर सकी है?
पूरे देश की क्षुधा को शांत करने की सामर्थ्य रखने वाली खेती अपने किसानों के कोठारों को कब भर सकी है?
तमाम लोगों के पेट मे अन्न की गर्मी लाने वाली खेती अपने अन्नदाताओं को सिर्फ़ ठंडी आहें ही दे सकी!!!
क्या आत्मनिर्भरता का रास्ता किसानों के घर तक नहीं जाता?
माना कि कुछ किसान अब संपन्न हो गए हैं पर क्या इसीसे गांधी जी के समाज के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति के आर्थिक उन्नयन की संकल्पना पूर्ण हो गयी,
मान लिया जाना चाहिए??
अरे साहब फायदे में तो हमेशा हुक्मरान रहें हैं और फायदे में रहें हैं
बिचौलिए जो लाभ का स्रोत अपने पास रखने के लिए तीन-तिकड़म करते रहते हैं।
खेती के अर्थशास्त्र को समझने के लिए हमें आम किसानों की जमीनी सच्चाइयों से रूबरू होना होगा जो अपने अस्तित्व के लिए जूझ रहा है।
आखिर किसानों के गोदान के होरी के चरित्र में ढलने की विवशता क्यों हो?
आखिर कैसे हो पाएगी फायदे की खेती जबकि बिचौलियों के प्रेशर-ग्रुप्स अति सक्रिय हैं।
खेती तो नफ़रत की सफल रही है अपने देश में,
पर किसानों में यह हुनर कहाँ ? उन्हें भूख पर राजनीति करनी जो नहीं आती……
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