Murshidabad Eid Namaz: पश्चिम बंगाल की सियासत में एक बार फिर धर्म और राजनीति का संगम देखने को मिला. मुर्शिदाबाद की उस जमीन पर, जिसे ‘नई बाबरी मस्जिद’ के लिए प्रस्तावित बताया जा रहा है, पहली बार ईद की नमाज अदा की गई. भीड़ उमड़ी, माहौल उत्साह से भरा था और लोग दूर-दूर से पहुंचे. लेकिन इसी बीच एक सवाल सबसे बड़ा बनकर उभरा कि इस पूरी पहल के केंद्र में रहे हुमायूं कबीर खुद नमाज में क्यों नहीं दिखे? क्या यह सिर्फ संयोग था या इसके पीछे कोई बड़ा सियासी प्लान छिपा है? नमाज के साथ ही यह जगह सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि राजनीतिक बहस का केंद्र बन गई है. बता दें कि पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव 23 अप्रैल और 29 अप्रैल को दो चरण में होने हैं.
न्यूज एजेंसी ANI के अनुसार ईद के मौके पर यहां का नजारा बिल्कुल अलग था. बंगाल के कई जिलों के साथ-साथ झारखंड से भी लोग पहुंचे. नमाज के बाद मिठाइयां बांटी गईं. माहौल शांतिपूर्ण रहा. लेकिन इस पूरे आयोजन के पीछे की राजनीति भी उतनी ही गर्म है. हुमायूं कबीर पहले ही इस मुद्दे को चुनावी बहस में ला चुके हैं. ऐसे में उनका नमाज में शामिल न होना कई सवाल खड़े कर रहा है. क्या वह रणनीतिक दूरी बना रहे हैं या किसी बड़े ऐलान की तैयारी में हैं?
नमाज, नई ‘बाबरी’ और सियासत क्यों बना मुद्दा?
- ईद की नमाज में हजारों लोग शामिल हुए. मुर्शिदाबाद के अलावा बीरभूम, नादिया और पूर्वी मिदनापुर से भी बड़ी संख्या में नमाजी पहुंचे. लोगों ने खुशी जाहिर की कि पहली बार इस जमीन पर नमाज अदा की गई. कार्यक्रम शांतिपूर्ण रहा और किसी तरह का व्यवधान नहीं हुआ.
- दूसरी तरफ, हुमायूं कबीर की गैरमौजूदगी चर्चा का विषय बनी रही. बताया गया कि वे अन्य कार्यक्रमों में व्यस्त थे, लेकिन राजनीतिक हलकों में इसे रणनीति के तौर पर भी देखा जा रहा है. कबीर पहले ही इस मुद्दे को चुनावी एजेंडा बना चुके हैं और बड़े दावे कर चुके हैं.
यह वही जमीन है जहां ‘नई बाबरी मस्जिद’ बनाने का प्रस्ताव रखा गया था. (फाइल फोटो PTI)
इस जगह पर नमाज पढ़ने का क्या महत्व है?
यह वही जमीन है जहां ‘नई बाबरी मस्जिद’ बनाने का प्रस्ताव रखा गया था. ऐसे में यहां पहली बार ईद की नमाज पढ़ना एक प्रतीकात्मक और भावनात्मक कदम माना जा रहा है, जो आगे चलकर राजनीतिक मुद्दा भी बन सकता है.
हुमायूं कबीर नमाज में क्यों नहीं पहुंचे?
आधिकारिक तौर पर कहा गया कि वे अन्य कार्यक्रमों में व्यस्त थे. लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह एक रणनीतिक कदम हो सकता है, ताकि वे खुद को विवाद से थोड़ा दूर रखते हुए मुद्दे को जिंदा रख सकें.
इस मुद्दे का चुनाव पर क्या असर पड़ सकता है?
कबीर पहले ही ऐलान कर चुके हैं कि उनकी पार्टी बड़ी संख्या में सीटों पर चुनाव लड़ेगी. ऐसे में यह मुद्दा धार्मिक भावनाओं के साथ-साथ वोट बैंक की राजनीति को भी प्रभावित कर सकता है.
क्या इस पर राजनीतिक विवाद बढ़ सकता है?
हां, इस मुद्दे पर पहले ही सत्तारूढ़ और विपक्षी दलों की तीखी प्रतिक्रिया आ चुकी है. आने वाले समय में यह बड़ा राजनीतिक विवाद बन सकता है, खासकर चुनाव के करीब.
सियासत में नया मोड़
अब सबकी नजर इस बात पर है कि हुमायूं कबीर आगे क्या कदम उठाते हैं. क्या यह सिर्फ एक धार्मिक आयोजन था या चुनावी रणनीति की शुरुआत? पश्चिम बंगाल की राजनीति में यह मुद्दा आने वाले दिनों में और गर्मा सकता है.



