लालबहादुर शास्त्री ही संयमित जीवन जीते थे। उन्होंने हमेशा पद कि गरिमा बनाए रखी और कभी अपने पद और रुतबे का बेजा इस्तेमाल नहीं किया।
जब जवान – जय किसान का नारा देने वाले शास्त्री जी हमेशा ईमानदार बने रहे।
जब वह प्रधानमंत्री थे, तो उनके पुत्र एक रात सरकारी गाड़ी लेकर कहीं चले गए थे। वह देर रात जब कहीं से लौटकर आए, तो शास्त्री जी जगे हुए थे।
उन्होंने पूछा,’ बड़ी कार लेकर क्या सेकेंड शो देखने गए थे?’
उनके पुत्र ने सहमते हुए जवाब दिया, ‘ हम लोग ड्राइव पर निकल गए थे। ‘
शास्त्री जी ने कहा, ‘ यदि कहीं जाना हो तो, सरकारी गाड़ी न ले जाकर घर वाली फिएट कार ले जाया करो।’
अगली सुबह लालबहादुर शास्त्री जी जब तैयार हुए, तो उन्होंने अपने ड्राइवर कि बुलाकर पूछा, ‘ कल शाम हमें दफ्तर से घर छोड़ने के बाद गाड़ी कितने मील चली?’
ड्राइवर ने मिलीमीटर देखने के बाद बताया कि गाड़ी कुल चौंतीस मील चली।
शास्त्री जी ने जेब से रुपये निकले और बोले, ‘ चौंतीस मील चलने का जो खर्च आया है, उसका पता लगाकर रुपए ट्रांसपोर्ट विभाग में जमा करा देना।’शास्त्री जी की ईमानदारी देखकर ड्राइवर चकित रह गया।
शास्त्री जी ने जीवन में कभी सरकारी साधनों का दुरुपयोग नहीं किया और न होने दिया।
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