असम चुनाव 2026. असम की हरियाली और वहां की चाय की खुशबू पूरी दुनिया में मशहूर है, लेकिन इस बार असम के चाय बागानों से एक अलग ही संदेश निकल रहा है. बुधवार सुबह डिब्रूगढ़ के एक चाय बागान में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अचानक चाय की पत्तियां चुन रही महिलाओं के बीच पहुंचे, तो नजारा देखने लायक था. पीएम मोदी का यह अंदाज केवल एक चुनावी दौरा नहीं, बल्कि एक गहरा भावनात्मक जुड़ाव था, जो असम विधानसभा चुनाव 2026 की दिशा बदलने की ताकत रखता है. प्रधानमंत्री मोदी ने खुद इस अनुभव को साझा करते हुए कहा, ‘चाय असम की आत्मा है और आज सुबह डिब्रूगढ़ के बागानों में महिलाओं के साथ बातचीत करना एक यादगार अनुभव रहा.’
पीएम मोदी की बॉडी लैंग्वेज इस दौरान एक शासक की नहीं, बल्कि एक ऐसे व्यक्ति की थी जो अपनी जड़ों की ओर लौटा हो. उन्होंने महिलाओं के साथ बैठकर उनकी समस्याओं को सुना और हंसी-मजाक भी किया. अपनी पुरानी यादों को ताजा करते हुए मोदी ने एक बार फिर दोहराया, ‘मैं आज जहां भी हूं, आप लोगों की उगाई चाय बेचकर ही यहां तक पहुंचा हूं. क्या आपके आशीर्वाद के बिना यह मुमकिन था?’ उनका यह बयान सीधे तौर पर चाय बागान श्रमिकों के दिल को छू गया, जो असम की राजनीति में किंगमेकर की भूमिका निभाते हैं.
चाय बागान श्रमिकों को बीजेपी ने अपनी ओर खींचने के लिए ‘जमीन के अधिकार’ का बड़ा दांव खेला है.
चुनावी गणित और ‘जमीन का हक’
पीएम मोदी का चाय बागान में उतरना केवल फोटो सेशन नहीं है. इसके पीछे एक बड़ा राजनीतिक संदेश छिपा है. सालों से कांग्रेस का वोट बैंक माने जाने वाले चाय बागान श्रमिकों को बीजेपी ने अपनी ओर खींचने के लिए ‘जमीन के अधिकार’ का बड़ा दांव खेला है. हाल ही में गुवाहाटी और सिलचर के दौरों के दौरान मोदी ने हजारों श्रमिकों को ‘जमीन के पट्टे’ वितरित किए हैं. उन्होंने साफ संदेश दिया कि जो काम कांग्रेस ने 60 सालों में नहीं किया, वह बीजेपी ने कर दिखाया है. अब बागान में काम करने वाले मजदूरों के पास अपनी जमीन होगी और उनके बच्चों का भविष्य सुरक्षित होगा.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मोदी का लोगों से मिलने का यह सहज अंदाज विपक्षी खेमे में हलचल पैदा कर देता है. जहां कांग्रेस 5 गारंटियों और स्वास्थ्य बीमा की बात कर रही है, वहीं मोदी ‘सम्मान’ और ‘पहचान’ की बात कर रहे हैं. डिब्रूगढ़ की रैलियों से पहले बागान का यह दौरा यह सुनिश्चित करने के लिए है कि ‘अपर असम’ की सीटों पर बीजेपी का दबदबा बरकरार रहे. मोदी की बॉडी लैंग्वेज आत्मविश्वास से भरी हुई है और वह जनता को यह यकीन दिलाने में सफल दिख रहे हैं कि वे उन्हीं में से एक हैं.
पिछली सरकारों ने असम को केवल एक ‘वोट बैंक’ समझा- पीएम मोदी
पुरानी यादें और नया संकल्प
मोदी ने अपनी बातों में अक्सर असम के महापुरुषों और वहां की संस्कृति का जिक्र किया. उन्होंने याद दिलाया कि कैसे पिछली सरकारों ने असम को केवल एक ‘वोट बैंक’ समझा, जबकि उनकी सरकार ने इसे ‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’ का केंद्र बनाया है. आज जब असम 9 अप्रैल को होने वाले पहले चरण के मतदान की ओर बढ़ रहा है, तो पीएम मोदी का यह ‘चाय पे चर्चा’ वाला अवतार मतदाताओं, विशेषकर महिलाओं और युवाओं के बीच एक नई लहर पैदा कर रहा है.
डिब्रूगढ़ से शुरू हुआ यह भावनात्मक अभियान अब धेमाजी और विश्वनाथ की रैलियों तक फैलेगा. मोदी ने साफ कर दिया है कि चाय की यह खुशबू अब केवल प्यालों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि असम के विकास और सम्मान की नई गाथा लिखेगी. अब देखना यह है कि 4 मई को जब नतीजे आएंगे, तो क्या ‘चायवाले’ का यह जादू एक बार फिर असम में बीजेपी की हैट्रिक लगवा पाएगा?





