SC on Patriarchy: सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर कहा है कि भारत में महिलाओं के खिलाफ पितृसत्तात्मक नियंत्रण अभी भी गहराई से जड़ें जमाए हुए है. संवैधानिक गारंटी और कई प्रगतिशील कानूनों के बावजूद, महिलाओं के शरीर, चुनाव और जीवन पर नियंत्रण की मानसिकता समाज में गहराई से बसी हुई है. सुप्रीम कोर्ट ने इसे समाज की बीमारी कहा.
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिस्वर सिंह की बेंच ने राजस्थान के एक मामले में पति को आजीवन कारावास की सजा बरकरार रखते हुए यह सख्त टिप्पणी की है. 2011 में अपनी पत्नी को दहेज के लिए जिंदा जलाकर मारने वाले आरोपी को कोर्ट ने दोषी ठहराया. बेंच ने कहा कि यह घटना घरेलू हिंसा और दहेज प्रथा की जड़ों को उजागर करती है.
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा, ‘संविधान समानता, लिंग के आधार पर भेदभाव न करने और जीवन व व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है, लेकिन ऐसे मामले दिखाते हैं कि इतने सालों बाद भी कई महिलाओं के लिए ये अधिकार अभी भी दूर की कौड़ी बने हुए हैं.’
बेंच ने कानूनी और न्यायिक प्रयासों का जिक्र करते हुए कहा कि दहेज निषेध अधिनियम 1961 से लेकर घरेलू हिंसा संरक्षण अधिनियम, कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न रोकथाम कानून तक कई प्रावधान बने. ट्रिपल तलाक, व्यभिचार कानून को रद्द करना, सशस्त्र बलों में महिलाओं की बराबरी और संपत्ति में बेटियों के बराबर हक जैसे कई ऐतिहासिक फैसले आए. फिर भी, जमीनी हकीकत बदलने में ये प्रयास नाकाफी साबित हुए हैं.
कोर्ट ने आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि 2023 में महिलाओं के खिलाफ 4.48 लाख से ज्यादा अपराध दर्ज किए गए, जबकि दहेज संबंधित हिंसा हर साल 6,000 से अधिक महिलाओं की जान ले रही है. घरेलू हिंसा की शिकायतें अभी भी सबसे ज्यादा आ रही हैं. कोर्ट ने इसे ‘sobering picture'(सोचने पर मजबूर करने वाली तस्वीर) बताया.
कोर्ट ने कहा कि साक्षरता बढ़ने, आर्थिक विकास होने और महिलाओं के शिक्षा व रोजगार में भागीदारी बढ़ने के बावजूद, खासकर ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में पितृसत्ता रोजमर्रा की जिंदगी में बनी हुई है. घर के अंदर अधिकार अभी भी ज्यादातर पुरुषों के पास है और महिलाओं की स्वायत्तता शर्तों वाली और सीमित है. कामकाजी महिलाएं भी घरेलू जिम्मेदारियों का बड़ा बोझ उठाती हैं.
बेंच ने साफ कहा कि महिलाओं के खिलाफ हिंसा की घटनाओं को अलग-अलग या असामान्य घटना नहीं माना जाना चाहिए. ये घटनाएं समाज में फैली ‘बीमारी’का हिस्सा हैं.
फैसले के सबसे प्रभावशाली हिस्से में कोर्ट ने सवाल उठाया,’दशकों तक कानून, योजनाएं और सुधारों के बाद भी महिलाओं के शरीर, चुनाव और जीवन पर नियंत्रण इतनी गहराई से क्यों बना हुआ है?’
कोर्ट ने जवाब खुद देते हुए कहा कि इसका समाधान सिर्फ कानूनों या अदालतों में नहीं, बल्कि ‘हम, भारत के लोग’ में है. समाज को अपनी सोच और व्यवहार बदलना होगा.
यह फैसला महिलाओं की असली समानता अभी भी चुनौती बनी हुई होने की याद दिलाता है.





