नई दिल्ली (Science Facts). ब्रह्मांड की गहराइयों और तारों की दुनिया हमेशा से ही इंसान को अपनी तरफ खींचती रही है. इसमें कोई शक नहीं है कि अंतरिक्ष यात्री (Astronauts) बहुत साहसी होते हैं. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि अगर वहां कोई बहुत दुखी हो या बहुत खुश हो तो क्या वह रो सकता है? तकनीकी तौर पर अंतरिक्ष यात्री रो तो सकते हैं, लेकिन उनके आंसू वैसे नहीं गिरेंगे, जैसे धरती पर गिरते हैं. अंतरिक्ष में गुरुत्वाकर्षण यानी ग्रेविटी (Gravity) न होने की वजह से रोना अलग ही अनुभव बन जाता है.
स्पेस में रोना मना है! क्यों अंतरिक्ष में आंसू गालों पर नहीं गिरते?
धरती पर हम जैसे ही भावुक होते हैं, हमारी ‘लैक्रिमल ग्लैंड्स’ (अश्रु ग्रंथियां) पानी छोड़ती हैं और गुरुत्वाकर्षण उसे नीचे गिरा देता है. अंतरिक्ष में ग्रेविटी नहीं है. इसलिए आंसू नीचे नहीं गिरते. इसके बजाय, वे आंखों के आस-पास जमा होने लगते हैं और एक तरल गेंद (Liquid Ball) की तरह बन जाते हैं. जैसे-जैसे आप ज्यादा रोते हैं, यह गेंद बड़ी होती जाती है और आपकी आंखों के ऊपर एक परत बना लेती है.
जब आंसू खतरा बन जाते हैं
अंतरिक्ष यात्री क्रिस हैडफील्ड ने एक बार बताया था कि अंतरिक्ष में रोना दर्दनाक हो सकता है. वहां आंसू आंखों से नहीं गिरते, बल्कि आपकी पूरी आंख को ढक लेते हैं और पलकों के साथ चिपक जाते हैं. इससे दृष्टि (Vision) धुंधली हो जाती है. अगर यह पानी का बुलबुला बहुत बड़ा हो जाए तो आपकी नाक तक पहुंच सकता है और सांस लेने में भी दिक्कत पैदा कर सकता है. इसलिए वहां रोना सेफ्टी रिस्क बन जाता है.
आंसुओं को हटाने के लिए क्या करते हैं एस्ट्रोनॉट्स?
अब आप सोच रहे होंगे कि अगर आंसू गिरते नहीं तो वे जाते कहां हैं? अंतरिक्ष यात्रियों को अपनी आंखों से उन आंसुओं के बुलबुलों को मैनुअली (हाथ से या तौलिए से) पोंछना पड़ता है. अगर वे ऐसा नहीं करेंगे तो वह पानी का घेरा उनकी आंखों में जलन पैदा करेगा क्योंकि आंसुओं में नमक होता है. स्पेस स्टेशन के अंदर हवा का बहाव भी इन आंसुओं को इधर-उधर उड़ा सकता है, जो इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस के लिए भी ठीक नहीं है.
क्या अंतरिक्ष में प्यास और पसीना भी अलग होता है?
सिर्फ आंसू ही नहीं, पसीना भी अंतरिक्ष में बड़ी समस्या है. जिम करते समय जब अंतरिक्ष यात्रियों को पसीना आता है तो वह भी शरीर से टपकता नहीं है. वह पसीना त्वचा पर गीली चादर की तरह चिपक जाता है. इसे भी तौलिए से पोंछना पड़ता है. इसी तरह वहां पानी पीना भी एक कला है. अंतरिक्ष में पानी की बूंदों को हवा में ‘पकड़कर’ निगलना पड़ता है.
विज्ञान का अनोखा सच
अंतरिक्ष में इंसान का शरीर वही रहता है, लेकिन वहां का वातावरण सब कुछ बदल देता है. वहां रोना सिर्फ भावनाओं का इजहार नहीं, बल्कि वैज्ञानिक घटना बन जाता है. अगली बार जब आप आसमान में चमकते तारों को देखें तो याद रखिएगा कि वहां के लोग अपनी खुशी और गम को वैसे जाहिर नहीं कर सकते जैसे हम यहां धरती पर कर लेते हैं.





