एक परंपरा का फ़िर से उद्भव

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संजीव कुमार शुक्ला

हमारी परंपरा में शाप देने की एक उत्कृष्ट व महती परंपरा रही है। “देहउँ श्राप कि मरिहउँ जाई” की हमारे यहाँ एक सुदीर्घ एवं स्वस्थ परम्परा रही है।यह प्रायः साधु-महात्मा प्रकृति के लोगों का ब्रम्हास्त्र था।

एक प्रकार से इस बिरादरी का इस अस्त्र पर कॉपीराइट जैसा था। इधर शाप दिया नहीं कि उधर सामने वाला भस्म। इसमें बस दरकार थी, तो एक लोटे की और उसमें छिड़काव होने भर के लिये थोड़े से जल की। और हाँ;  श्राप देने के पहले गुस्सा आना एक जरूरी शर्त हुआ करती थी।

गुस्साए महात्मा लोग लोटे से जल लेकर जिस पर खार खाये होते थे, उस पर पानी की दो-चार छींटे मारकर उसको तत्काल पत्थर,जानवर, राक्षस या जो चाहते वह बना देते। कभी-कभी क्रोध की अधिकता के कारण जब महात्मा लोग कुछ जल्दी में सोच नहीं पाते तो विकल्प के अभाव में वह उसे आग के हवाले कर राख की ढेरी में तब्दील कर देते थे। 

आवश्यक सामग्री के रूप में वैसे तो लोटे और जल की आवश्यकता रहती थी, पर हाई-फाई सोसायटी के महात्मा जनों के लिये इसका (लोटे और जल की) भी झंझट नहीं । यह सुविधा तपस्या के स्तर से निर्धारित होती थी। ऐसे में शापित व्यक्ति की एक न चलती।

आज के दौर में इसकी तुलना कुछ-कुछ गाइडेड मिसाइल से की जा सकती है। पर पूरी तरह से यह तुलना सटीक नहीं बैठती  है। एक-दो अंतर तो खुले तौर पर हैं। जहाँ मिसाइल पूरी तरह से भौतिक है, वहीं शाप अदृश्य संहारक क्षमता से युक्त एक दैवीय शक्ति है। हमारी ऋषि परंपरा में कुछ ऋषि-मुनि शाप देने के मामले में बड़ा नाम कमा गए। दुर्वासा ऋषि शाप देने के मामले में अपने समकालीन ऋषियों में सभी को पीछे छोड़ चुके थे।

वह शाप से ही अपना सम्भाषण शुरू करते थे। एक दिन में कितने शाप देने हैं, इसका टारगेट वह खुद ही तय करते थे। देवी-देवता तक उनसे भय खाते थे, दूर से ही दिखने पर लोग अपना रास्ता बदल लेते थे। कब आपका मूड बिगड़ जाय और शाप दे बैठें। ये मुनि लोग तो कई बार अपने शाप का असर देखने के लिए शाप दे देते थे कि देखें इसका असर क्या होता है??

नितांत प्रयोग के तौर पर …. 

शाप देने के ब्रम्हास्त्र के चलते एक बार महर्षि भृगु ने तो शेषशय्या पर लेटे भगवान विष्णु तक को पद-प्रहार कर दिया था। तिस पर भगवान विष्णु ने अपने क्रोध को दबाते हुए कहा कि मुनिवर आपके पैर कोमल हैं; चोट आ गयी होगी।

हमारे अपराध को क्षमा करें…  कहने का मतलब भगवान तक इन लोगों से बचते थे। तो साब यह थी, हमारे देश के ऋषि-मुनियों की हनक, जिनकी कहानियों को सुनकर आज भी सीना चौड़ा (जितना होने भर है) हो जाता है!! कोई अन्यायी कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, इन महात्माओं के सामने भीगी बिल्ली बन जाता था। 

पर हाय रे दुर्भाग्य !!!!  न जाने इस गौरवशाली परम्परा को किसकी नजऱ लग गयी कि यह कलयुग तक आते-आते सरस्वती नदी की भांति लुप्तप्राय हो गयी। पता नहीं किसका शाप लगा…… एक  पूरा का पूरा कालखंड शाप के अस्तित्व से शून्य रहा। अब वो बात कहाँ….… अब तो सिर्फ़ लोग बद्दुआ से ही काम चलाते हैं।

जहां सतयुग, त्रेता, द्वापर शाप की दृष्टि से स्वर्णिम युग रहे हैं वहीं कलयुग बेचारा अतीत की मधुर स्मृतियों से ही सन्तोष करता रहा। ऋषि तो कलयुग में भी तमाम हुए पर शाप देने वाले एक भी न हुए। लेकिन कहते हैं कि समय एक जैसा नहीं रहता, सो समय बदला।

इतिहास ने एक बार फ़िर से ख़ुद को दुहराया। शाप की परंपरा फिर से जी उठी और इस परंपरा की वाहक बनीं आधुनिक साध्वी …. हम भाग्यशाली हैं कि हम उस गौरवशाली परम्परा के साक्षी बन रहें हैं, जिसका एक सुनहरा अतीत रहा है। 

हाल में ही एक अद्भुत साध्वी का अवतरण हुआ है जो शाप देने की योग्यता धारती हैं। खुद उनके कथनानुसार, उन्होंने एक शहीद पुलिस अधिकारी को भी श्राप दे दिया था। लोगों ने साध्वी के बयान का  जबरदस्त विरोध किया। बाद में शायद उन्होंने करकरे जी की देश के प्रति की गई उत्कृष्ट सेवाओं को देखते हुए खुद ही उनको शाप-मुक्त कर दिया था।

इनकी उल्लेखनीय योग्यताओं को देखते हुए ही आपको राजनीति में उतारा गया है। इसमें कोई दो राय नहीं किराजनीति में इनकी उपस्थित-मात्र से हम भारतीय अपने पड़ोसी देशों पर मानसिक दबाव बनाने में सफ़ल हुए हैं। ऐसे दो-चार शाप देने वाले और लोग नेतानगरी में आ जाय तो हमारे देश को महाशक्ति बनने से कोई नहीं रोक सकता। आप बहुत ही गुस्सैल स्वभाव की हैं।

अभी हाल में फ्लाइट में आगे वाली सीट को लेकर उसमें सवार अन्य यात्रियों से उनकी कुछ कहासुनी हो गयी। अरे भई, एक तो साध्वी तिस पर सांसद !! ऐसे में वह आगे नहीं बैठेगीं तो क्या आप बैठेगें? जो सबके लिए नियम बनाए, उसको आप नियम बताएंगे ?? आखिर प्रेस्टीज इश्यू भी कोई चीज़ होती है। इसी बीच कुछ नादान यात्रियों ने उनसे बहस शुरू कर दी; बग़ैर यह समझे कि वह किससे बहस कर रहें हैं। यह निहायत बत्तमीजी थी।

अरे मूढ़ लोगों अगर वह क्रोध में आकर हवाई जहाज को बैलगाड़ी होने का श्राप दे देतीं तो महीनों लग जाते दिल्ली पहुंचने में। सब अक़्ल ठिकाने आ जाती। हम लोगों के साथ असली दिक्कत यह है कि हम समय रहते अपनी विभूतियों को सम्मान नहीं दे पाते या उनकी योग्यताओं को पूरा-पूरा यूटिलाइज नहीं कर पाते उल्टे छिद्रान्वेषी प्रवृत्ति के चलते उनकी आलोचना करते हैं।

हमें तो पुरानी और समाप्तप्राय परम्परा को जगाने के लिए उनका आभारी होना चाहिए, उनको साधुवाद देना चाहिए। ईश्वर इस कौम की रक्षा करे !!!! https://hindiblogs.co.in/contact-us/

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संजीव कुमार शुक्ला

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