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कभी गाना बजने पर पर्दे पर लोग लुटाते थे पैसे और सीट भी रहती थी हाउसफुल, कुछ ऐसा था मिर्जापुर के फेमस सिनेमाघर ‘नवीन’ का जलवा

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मिर्जापुर का नवीन सिनेमाघर कभी शहर के मनोरंजन का सबसे बड़ा केंद्र हुआ करता था, जहां 15 रुपये की टिकट पर फिल्में हाउसफुल चलती थीं और गानों पर लोग पर्दे पर पैसे लुटाते थे. 1971 में शुरू हुआ यह थिएटर 2012 में बंद हो गया. बदलते समय और मोबाइल के बढ़ते प्रभाव ने इस सिनेमा संस्कृति को खत्म कर दिया. आज यह सिनेमाघर सिर्फ यादों में जिंदा है.

मिर्जापुर: 90 के दशक में मनोरंजन का साधन सिनेमा होता था. फिल्मों को देखने के लिए लोग पहुंचते थे. फिल्में हिट होने पर कई हफ्तों तक इंतजार करना पड़ता था. यह अब सिर्फ कहानी हो गई है. सिनेमाहॉल बंद पड़ा हुआ है. उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले में स्थित नवीन सिनेमाघर कभी मनोरंजन का केंद्र था. ‘तलाश’ फ़िल्म से 1971 में सिनेमाघर की शुरुवात हुई थी और कई सालों तक फ़िल्म देखने के लिए लोग आते रहे. यहां राजा हिंदुस्तानी, गंगा-जमुना और सरस्वती जैसी फिल्में हफ्तों तक हाउसफुल रही थी.

गाने पर लोग पर्दों पर लुटाते थे पैसे

फ़िल्म देखने वालों ने बताया कि गाना बजने के बाद लोग पर्दों पर पैसे लुटाते थे. करीब 15 वर्षों से सिनेमाघर बंद पड़ा हुआ है. लोगों का कहना है कि मनोरंजन के साधन बदल गए. अब सिनेमाघरों को कोई नहीं पूछने वाला है. इनकी उपयोगिता खत्म हो गई है.

राजकुमार ने बताया कि यहां पर कई फिल्में देखी है. राजा हिंदुस्तानी, दिलवाले दुल्हनिया, ससुरा बड़ा पैसावाला कई फिल्में देखी हैं. इन सिनेमाघरों में हमने काम किया है. यहां पर लगने वाली फिल्म के पोस्टरों को पूरे शहर में चिपकाते थे. लाउडस्पीकर से भी बताते थे. इस टाकीज की सबसे फेमस फिल्मों में गंगा, जमुना और सरस्वती रही है. एक हफ्ते तक हाउसफुल था. बोर्ड सिनेमाघर खुलने से पहले ही टंग जाता था. 48 सीट का सिनेमाघर था. उस समय 15 रुपये टिकट था. रामसिंह ने बताया कि कई फिल्मों को देखा है.

1971 में शुरू 2012 में बंद

अमिताभ जायसवाल ने बताया कि जून 1971 में शुरुवात हुआ था. करीब 2012 में यह सिनेमाघर बंद हुआ था. पहले मनोरंजन का साधन सिनेमाघर हुआ करता था. चाहे नेता का परिवार हो. अधिकारी का परिवार हो या कोतवाल का परिवार हो. सबके मनोरंजन का साधन यहीं हुआ करता था.

गाना बजने पर पैसा लुटाते थे

नवरात्रि में 500 सीट के सिनेमाघर में 450 साइकिल खड़ी रहती थी. बाहर से आने वाले भक्त दर्शन करते थे और फिर सिनेमा में फिल्म देखते थे. तब वापस जाते थे. अब इसे खोल दिया जाए तो कोई देखने के लिए नहीं आएगा. मोबाइल की वजह से सिनेमा का युग खत्म हो गया. अब कोई देखने वाला नहीं है. गाना बजने पर पैसा लुटाते थे. यहां पर तलाश और दो रास्ते जैसी फिल्में हिट हुई थी.

About the Author

Vivek Kumar

विवेक कुमार एक सीनियर जर्नलिस्ट हैं, जिन्हें मीडिया में 10 साल का अनुभव है. वर्तमान में न्यूज 18 हिंदी के साथ जुड़े हैं और हरियाणा, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की लोकल खबरों पर नजर रहती है. इसके अलावा इन्हें देश-…और पढ़ें



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