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क्रिकेट के मैदान से कालकोठरी तक, लॉर्ड्स के मैदान पर बजी ताली, देश लौटते ही पड़ी गाली, एक गुमनाम नायक की कहानी

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नई दिल्ली. कुछ खिलाड़ियों की कहानियां बाउंड्री लाइन पर खत्म हो जाती हैं, लेकिन भारतीय क्रिकेट इतिहास के पहले सिख टेस्ट क्रिकेटर, लाल सिंह गिल का जीवन खेल के मैदान से कहीं आगे जाकर प्यार, निर्वासन, युद्ध और अस्तित्व के संघर्ष की एक ऐसी दास्तान बनता है जो किसी हॉलीवुड फिल्म की तरह लगती है.

1932 में जब भारतीय क्रिकेट टीम अपने इतिहास का पहला टेस्ट मैच खेलने ऐतिहासिक लॉर्ड्स मैदान पर उतरी, तो उस अंतिम ग्यारह में एक ऐसा नाम शामिल था जिसका भारत में पैदा होना तो दूर, वहां का निवासी होना भी तय नहीं था वह नाम था लाल सिंह.

मलाया की पिचों से लॉर्ड्स का ऐतिहासिक सफर

16 दिसंबर 1909 को कुआलालंपुर (मलाया, अब मलेशिया) में जन्मे लाल सिंह का परिवार पीढ़ियों पहले भारत छोड़ चुका था. उस दौर के कड़े नियमों के अनुसार, वे भारतीय टीम में खेलने के योग्य भी नहीं थे लेकिन उनकी अद्भुत प्रतिभा और पटियाला के महाराजा भूपिंदर सिंह के विशेष हस्तक्षेप के कारण उन्हें भारतीय टीम में शामिल होने की अनुमति मिली. जून 1932 में जब कप्तान सी. के. नायडू की अगुवाई में टीम मैदान पर उतरी, तब लाल सिंह ने अपनी आक्रामक बल्लेबाजी से ज्यादा अपनी चीते जैसी फील्डिंग से ब्रिटिश विशेषज्ञों को स्तब्ध कर दिया. उन्होंने इंग्लैंड के दिग्गज बल्लेबाज फ्रैंक वूली को जिस फुर्ती से दौड़कर रन आउट किया, उसने लॉर्ड्स के मैदान में मौजूद 25,000 दर्शकों को खड़े होने पर मजबूर कर दिया था.

अंग्रेजी मीडिया ने उन्हें एक ऐसे फील्डर के रूप में वर्णित किया जो “मैदान पर सांप की तरह रेंगता था”. इसके अलावा उन्होंने दूसरी पारी में अमर सिंह के साथ मिलकर महज 40 मिनट में 74 रनों की आक्रामक साझेदारी भी की

पेरिस का प्यार और एक जानलेवा हमला

क्रिकेट तो लाल सिंह के जीवन का सिर्फ एक छोटा सा अध्याय था. लॉर्ड्स टेस्ट के बाद वे पटियाला के महाराजा के विशेष सहायक (एडीसी) बन गए. उनकी लोकप्रियता और महाराजा से नजदीकी के कारण साल 1936 में उन पर एक जानलेवा हमला हुआ, जिसमें वे गंभीर रूप से घायल हो गए लेकिन किसी तरह बच निकले.  इसके बाद वे बॉम्बे (अब मुंबई) के ताज होटल में एक अमेरिकी जाज सिंगर, मर्टल वॉटकिंस के प्यार में पड़ गए.  वे उनके साथ पेरिस चले गए, जहां उन्होंने अपनी पत्नी के करियर को संभाला और एक आलीशान नाइटक्लब भी चलाया. हालांकि, यह रिश्ता लंबा नहीं चला और द्वितीय विश्व युद्ध शुरू होने से ठीक पहले, 1939 में वे वापस मलाया लौट आए.

क्रिकेट के बाद कालकोठरी का नरक

मलाया लौटते ही लाल सिंह का जीवन पूरी तरह बदल गया. जब जापानी सेना ने ब्रिटिश मलाया पर कब्जा कर लिया, तो लाल सिंह और उनके भाइयों ने ब्रिटिश अधिकारियों को भागने में मदद की.  इस ‘अपराध’ के लिए जापानी सेना ने उनके दो बड़े भाइयों को फांसी दे दी और उनकी सारी पुश्तैनी जमीन, आलीशान मकान और सोने की खदानें जब्त कर लीं. लाल सिंह को बोर्नियो के एक बेहद अमानवीय और क्रूर लेबर कैंप (कैदी शिविर) में भेज दिया गया. तीन साल तक नारकीय यातनाएं झेलने और कड़े श्रम के कारण उनका शानदार शरीर एक कंकाल में तब्दील हो गया.  अगस्त 1945 में जब परमाणु हमले के बाद जापानी सेना में अफरा-तफरी मची, तो लाल सिंह वहां से भाग निकलने में सफल रहे.  जब वे वापस कुआलालंपुर पहुंचे, तो उनकी हालत इतनी खराब थी कि उनकी सगी मां भी उन्हें पहचान नहीं पाईं.

मैदान के नायक से ग्राउंड्समैन तक का सफर

सब कुछ गंवा चुके लाल सिंह के पास अब जीवित रहने का कोई साधन नहीं था. जिस खिलाड़ी ने कभी लॉर्ड्स की हरी घास पर तालियां बटोरी थीं, वही खिलाड़ी पेट पालने के लिए कुआलालंपुर के ‘सेलांगर क्रिकेट क्लब’ में एक मामूली ग्राउंड्समैन और कोच के रूप में काम करने लगा. बाद में, जब सेलांगर के सुल्तान ने उन्हें इस बदहाली में देखा, तो उनकी मदद की और उनकी कुछ संपत्ति वापस दिलाने में भूमिका निभाई. 19 नवंबर 1985 को इस गुमनाम लीजेंड ने दुनिया को अलविदा कह दिया. लाल सिंह की कहानी सिर्फ रनों और विकेटों का स्कोरकार्ड नहीं है, बल्कि यह इंसानी जज्बे, प्यार, युद्ध की त्रासदी और हर परिस्थिति में जिंदा रहने की एक अमर दास्तान है.



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