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सुल्तानपुर के समनाभार गांव में स्थित प्राचीन स्थल आज भी अपने गौरवशाली इतिहास की गवाही देता है. यहां मिली खंडित विष्णु और सूर्य प्रतिमाएं, मध्यकालीन ईंटें और मंदिर के अवशेष बताते हैं कि कभी यहां भव्य धार्मिक केंद्र मौजूद था. सरोवर किनारे स्थित यह धरोहर अब श्रद्धा और इतिहास दोनों का प्रमुख केंद्र बन चुकी है.
समनाभार गांव का यह प्राचीन स्थल सुल्तानपुर जिले की अमूल्य ऐतिहासिक धरोहर माना जाता है. यहां की खंडित मूर्तियां, मध्यकालीन ईंटें और धार्मिक अवशेष इस क्षेत्र के गौरवशाली अतीत की गवाही देते हैं. यह सुल्तानपुर की एक प्राचीन धरोहर माना जाता है.

उत्तर प्रदेश का सुल्तानपुर जिला ऐतिहासिक दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है. यहां अनेक प्राचीन स्थल, खंडित मूर्तियां और पुरातात्विक अवशेष मौजूद हैं, जिनका संबंध हजारों वर्षों पुराने इतिहास से जोड़ा जाता है. जिले के गांवों में आज भी ऐसे साक्ष्य दिखाई देते हैं जो प्राचीन सभ्यता और धार्मिक परंपराओं की कहानी कहते हैं. इन्हीं धरोहरों में समनाभार गांव का स्थल विशेष महत्व रखता है.

इस स्थल पर दिखाई देने वाला मध्यकालीन ईंटों का ढेर इतिहास का महत्वपूर्ण प्रमाण माना जाता है. इन ईंटों की बनावट और आकार को देखकर ऐसा लगता है कि यहां किसी समय विशाल मंदिर और धार्मिक स्थल का निर्माण हुआ रहा होगा. समय और प्राकृतिक आपदाओं के कारण वह मंदिर नष्ट हो गया, लेकिन उसके अवशेष आज भी इस क्षेत्र के गौरवशाली अतीत की कहानी कहते हैं.
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समनाभार गांव में मिली प्रतिमाओं में सूर्य देव से संबंधित मूर्तियां भी पाई गई हैं. इन प्रतिमाओं को देखकर यह लगता है कि यहां का प्रमुख मंदिर सूर्य भगवान को समर्पित रहा होगा. सूर्य प्रतिमाओं की शैली और शिल्पकला पूर्व मध्यकालीन कला की उत्कृष्टता को दर्शाती है. वरिष्ठ पत्रकार विक्रम बृजेंद्र सिंह लोकल 18 से बताते हैं कि मंदिर के ध्वस्त होने के बाद ये प्रतिमाएं इधर-उधर बिखर गई होंगी, जिन्हें बाद में ग्रामीणों ने एकत्रित कर सुरक्षित रखा. वर्तमान समय में इन प्रतिमाओं की पूजा भी की जाती है. यह स्थल धार्मिक विविधता और प्राचीन भारतीय स्थापत्य कला का अनोखा उदाहरण माना जाता है.

समनाभार गांव में अब भगवान नरसिंह का एक आधुनिक मंदिर भी बना दिया गया है, जहां ग्रामीण श्रद्धापूर्वक पूजा-अर्चना करते हैं. इस मंदिर के बगल प्राचीन अवशेषों के ठीक निकट स्थित है, जिससे इस स्थान की धार्मिक गरिमा और बढ़ जाती है. मंदिर के परिसर में स्थापित पुरानी प्रतिमाएं लोगों की आस्था का केंद्र बनी हुई हैं. यहां आने वाले श्रद्धालु न केवल पूजा करते हैं बल्कि इन ऐतिहासिक मूर्तियों को देखकर प्राचीन कला और संस्कृति की झलक भी महसूस करते हैं.

भगवान विष्णु की मूर्ति में प्राचीन भारतीय शिल्पकला की अद्भुत झलक दिखाई देती है. मूर्ति में किरीट मुकुट, कुण्डल, कंठहार, श्रीवत्स, यज्ञोपवीत, मेखला, बाजूबंद और वनमाला जैसे आभूषण अत्यंत सुंदर ढंग से उकेरे गए हैं. प्रभामंडल साधारण होते हुए भी आकर्षक प्रतीत होता है. प्रतिमा के सिर के दोनों पार्श्वों में मालाधर विद्याधर मिथुन आकृतियां भी बनाई गई हैं, जो इसकी कलात्मकता को और विशेष बनाती हैं.

यहां स्थित भगवान विष्णु की खंडित पत्थर की मूर्ति विशेष रूप से उल्लेखनीय है. मूर्ति का निचला भाग टूटा हुआ है, लेकिन शेष भाग आज भी अत्यंत आकर्षक दिखाई देता है. लगभग 86×59 सेंटीमीटर आकार की यह प्रतिमा दीवार से जुड़ी हुई है. मूर्ति में भगवान विष्णु चतुर्भुज रूप में दर्शाए गए हैं. उनके हाथों में गदा, चक्र और शंख शोभायमान हैं. मूर्ति की कलात्मक बनावट यह दर्शाती है कि उस समय मूर्तिकला कितनी विकसित थी.


