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झालमुड़ी से जुड़ा बलिया-बंगाल का रिश्ता, बगावत और इतिहास की खुशबू आज भी जिंदा, जाने

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बलिया के बेदुआ मोहल्ला निवासी झालमुड़ी विक्रेता रविंद्र कुमार पिछले करीब 40 वर्षों से मसालेदार भुजा बेच रहे हैं. उन्होंने कहा कि बंगाल में गरीब से लेकर अमीर तक हर व्यक्ति के सुबह के नाश्ते में झालमुड़ी शामिल रहती है. जब उनसे पूछा गया कि अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उनकी दुकान पर झालमुड़ी खाने आ जाएं तो क्या करेंगे. इस पर वह कुछ पल चुप रहे और फिर बोले मोदी जी आएंगे तो उन्हें फ्री में झालमुड़ी खिलाएंगे.

बलिया: पश्चिम बंगाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा झालमुड़ी खाने के बाद यह साधारण सा दिखने वाला व्यंजन एक बार फिर चर्चा में आ गया है. इसी बहाने बलिया और बंगाल के उस ऐतिहासिक रिश्ते की भी याद ताजा हो गई, जो केवल खानपान तक सीमित नहीं बल्कि इतिहास, क्रांति और स्वाभिमान से जुड़ा रहा है. बलिया के बेदुआ मोहल्ला निवासी झालमुड़ी विक्रेता रविंद्र कुमार पिछले करीब 40 वर्षों से मसालेदार भुजा बेच रहे हैं. उन्होंने कहा कि बंगाल में गरीब से लेकर अमीर तक हर व्यक्ति के सुबह के नाश्ते में झालमुड़ी शामिल रहती है. जब उनसे पूछा गया कि अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उनकी दुकान पर झालमुड़ी खाने आ जाएं तो क्या करेंगे. इस पर वह कुछ पल चुप रहे और फिर बोले मोदी जी आएंगे तो उन्हें फ्री में झालमुड़ी खिलाएंगे.

बलिया पर सल्तनत कालीन शासकों की थी नजर

इस बीच इतिहासकारों ने भी बलिया और बंगाल के पुराने संबंधों को लेकर कई अहम तथ्य साझा किए हैं. प्रख्यात इतिहासकार डॉ. शिवकुमार सिंह कौशिकेय के अनुसार बलिया और बंगाल का रिश्ता सदियों पुराना है. उन्होंने बताया कि सन् 1302 ईस्वी में बंगाल के शासक बख्तियार खिलजी ने अंग और बंग क्षेत्र के भूभाग में बलिया महाल बनाकर इस इलाके को राजस्व अभिलेख में दर्ज कराया था. इसके बाद 5 मई 1529 को बलिया के घाघरा तट पर इतिहास का बड़ा जल और थल युद्ध हुआ, जहां एक ओर बाबर की सेना थी तो दूसरी तरफ सिकंदर लोदी और बंगाल के नवाब की ताकत. इस युद्ध में तलवारों की टकराहट और नावों की गूंज के बीच आखिरकार बाबर की जीत हुई और बलिया इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया.

बंगाल बलिया का संघर्ष क्रांति का है रिश्ता

इतिहासकारों के मुताबिक सन 1942 की अगस्त क्रांति में भी बलिया और बंगाल ने अंग्रेजी हुकूमत को चुनौती दी थी. बलिया की वीरांगना जानकी देवी ने महिलाओं के साथ मिलकर अंग्रेजों का यूनियन जैक उतारकर तिरंगा फहराया था, जबकि बंगाल के मिदनापुर में मातंगनी हाजरा अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन का नेतृत्व कर रही थीं. यही वजह है कि बलिया और बंगाल का रिश्ता आज भी संघर्ष, क्रांति और स्वाभिमान की मिसाल माना जाता है.

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Rajneesh Kumar Yadav

मैं रजनीश कुमार यादव, 2019 से पत्रकारिता से जुड़ा हूं. तीन वर्ष अमर उजाला में बतौर सिटी रिपोर्टर काम किया. तीन वर्षों से न्यूज18 डिजिटल (लोकल18) से जुड़ा हूं. ढाई वर्षों तक लोकल18 का रिपोर्टर रहा. महाकुंभ 2025 …और पढ़ें



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