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वीडी सतीशन बने केरल के CM तो राहुल गांधी अपने ‘आंख-कान’ वेणुगोपाल को कहां करेंगे फिट? क्या खरगे की गद्दी सौंपकर कर्ज उतारेगा गांधी परिवार?

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Kerala CM VD Satheesan swearing-in: केरल की राजनीति में आखिरकार एक बड़े और ऐतिहासिक बदलाव पर मुहर लग गई है. सोमवार (18 मई, 2026) को तिरुवनंतपुरम के सेंट्रल स्टेडियम में आयोजित एक भव्य समारोह में वरिष्ठ कांग्रेस नेता वी.डी. सतीशन ने केरल के नए मुख्यमंत्री के तौर पर पद और गोपनीयता की शपथ ली. राज्यपाल ने सतीशन और उनकी कैबिनेट को शपथ दिलाई. इस ऐतिहासिक मौके पर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा सहित देश भर के कई दिग्गज नेता मौजूद रहे. संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चे (UDF) की इस बंपर जीत और सतीशन की ताजपोशी के साथ ही केरल में वाम लोकतांत्रिक मोर्चे (LDF) का सालों पुराना शासन समाप्त हो गया है.

राहुल गांधी के संकटमोचक का क्या होगा?

लेकिन इस बड़ी जीत के जश्न के बीच, कांग्रेस के गलियारों में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (AICC) के महासचिव (संगठन) के.सी. वेणुगोपाल की भूमिका को लेकर चर्चा सबसे तेज़ है. ऐन वक्त पर मुख्यमंत्री पद की रेस से वेणुगोपाल के पीछे हटने के बाद अब देश की राजनीति का सबसे बड़ा सवाल यही है कि राहुल गांधी अपने इस सबसे करीबी ‘संकटमोचक’ को कहां फिट करेंगे? क्या इसके लिए मल्लिकार्जुन खरगे की कुर्सी की कुर्बानी दी जाएगी? आइए जानते हैं इस सियासी ड्रामे की पूरी ‘इनसाइड स्टोरी’.

दिल्ली के फरमान पर भारी पड़ा स्थानीय जनादेश

केरल के इस चुनाव परिणाम ने कांग्रेस के भीतर शक्ति संतुलन को पूरी तरह बदल दिया है. पार्टी के भीतर यह बात जगजाहिर थी कि राहुल गांधी अपने सबसे भरोसेमंद सिपहसालार के.सी. वेणुगोपाल को केरल का मुख्यमंत्री बनाना चाहते थे. यहाँ तक कि नतीजे आने से ठीक पहले पार्टी दफ्तरों के बाहर वेणुगोपाल के बड़े-बड़े पोस्टर्स भी लग चुके थे. हालांकि, केरल के स्थानीय विधायकों, जमीन से जुड़े कार्यकर्ताओं और क्षेत्रीय क्षत्रपों की रणनीति कुछ और ही थी. स्थानीय नेतृत्व का साफ कहना था कि जो नेता पिछले पाँच वर्षों से जमीन पर रहकर विपक्ष की मजबूत आवाज़ बना हुआ था, सीएम की कुर्सी उसी वी.डी. सतीशन को मिलनी चाहिए. अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक, यदि आलाकमान दिल्ली से कोई फैसला थोपता, तो केरल कांग्रेस में एक बड़ी बगावत तय थी. इस संभावित विद्रोह को भांपते हुए सोनिया गांधी और प्रियंका गांधी ने राहुल गांधी को जमीनी हकीकत स्वीकार करने की सलाह दी, जिसके बाद केंद्रीय नेतृत्व को अपने कदम पीछे खींचने पड़े.

गांधी परिवार के ‘एकछत्र वर्चस्व’ को लगा झटका?

केरल के इस घटनाक्रम ने कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व, विशेषकर राहुल गांधी की राजनीतिक पकड़ और ‘हाईकमान कल्चर’ पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं. इस सियासी खींचतान ने पार्टी के आंतरिक मतभेदों को भी सतह पर ला दिया. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, जहाँ राहुल गांधी अपनी पसंद पर अड़े थे, वहीं प्रियंका गांधी वाड्रा ने सोनिया गांधी के समर्थन से जमीन पर लोकप्रिय वी.डी. सतीशन का खुलकर पक्ष लिया. उनका मानना था कि पार्टी को अपने ही हाथों किसी आत्मघाती संकट में धकेलने से बचाना आवश्यक है. राहुल गांधी के लिए अपने ही राजनीतिक गढ़ (वायनाड से गहरे जुड़ाव के कारण) में इस तरह बैकफुट पर आना एक बड़ा राजनीतिक झटका माना जा रहा है. यह इस बात का सीधा प्रमाण है कि जब क्षेत्रीय समीकरण मजबूत हों, तो प्रांतीय क्षत्रप दिल्ली के केंद्रीय फरमानों को भी झुकाने का माद्दा रखते हैं.

क्या के.सी. वेणुगोपाल को मिलेगा कांग्रेस का सर्वोच्च पद?

कांग्रेस में ‘त्याग’ और समझौते करने वाले नेताओं को पुरस्कृत करने की पुरानी परंपरा रही है. भले ही अपनी मर्जी से पीछे हटने के कारण वेणुगोपाल का ग्राफ राहुल गांधी की नज़रों में और बढ़ गया हो, लेकिन कड़वी सच्चाई यह भी है कि गृह राज्य की सत्ता न पा सकने के कारण दिल्ली दरबार में उनके रसूख की सीमाएं भी उजागर हुई हैं. अब कयास लगाए जा रहे हैं कि राहुल गांधी अपने इस सबसे वफादार साथी के राजनीतिक ‘त्याग’ की भरपाई राष्ट्रीय स्तर पर करेंगे. वेणुगोपाल पिछले कई वर्षों से टिकट बंटवारे से लेकर संगठन के हर छोटे-बड़े फैसलों में राहुल गांधी के मुख्य रणनीतिकार रहे हैं. ऐसे में सांगठनिक स्तर पर उनके लिए आगे बढ़ने का अब सिर्फ एक ही रास्ता बचता है- ‘कांग्रेस राष्ट्रीय अध्यक्ष’ का पद. दिल्ली के सियासी गलियारों में यह चर्चा बेहद गर्म है कि वेणुगोपाल को समायोजित (Adjust) करने के लिए एक बड़ी स्क्रिप्ट तैयार की जा रही है.

खरगे की कुर्सी पर मंडराया संकट और सांगठनिक चुनौतियां

वेणुगोपाल को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने की इन सुगबुगाहटों ने मौजूदा कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के राजनीतिक भविष्य पर सवालिया निशान लगा दिया है. खरगे ने अपने कार्यकाल में हमेशा राहुल गांधी के लिए एक मजबूत ढाल और संकटमोचक की भूमिका निभाई है. लेकिन अब वेणुगोपाल की भरपाई के लिए खरगे की कुर्सी की कुर्बानी दिए जाने की अटकलें तेज हैं.

खरगे को कुर्सी से हटाना आसान नहीं?

हालांकि खरगे को उनके पद से हटाना गांधी परिवार के लिए भी आसान नहीं होगा. आगामी अक्टूबर महीने में कांग्रेस के सांगठनिक चुनाव होने तय हैं. खरगे पार्टी के एक बेहद सम्मानित दलित चेहरे हैं और संगठन के बड़े हिस्से पर उनकी मजबूत पकड़ है. ऐसे में चुनाव से ठीक पहले सांगठनिक फेरबदल के नाम पर खरगे को किनारे करना राहुल गांधी के लिए एक नया आंतरिक संकट खड़ा कर सकता है, क्योंकि खरगे गुट इस तरह के किसी भी एकतरफा फैसले का अंदरूनी विरोध कर सकता है.

सतीशन कैबिनेट में सोशल इंजीनियरिंग और क्षेत्रीय संतुलन

दूसरी ओर केरल में मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते ही वी.डी. सतीशन ने सत्ता संचालन में अपनी परिपक्वता दिखाते हुए कैबिनेट में क्षेत्रीय और सामाजिक संतुलन का पूरा ध्यान रखा है. सतीशन की इस नई टीम में अकेले कांग्रेस पार्टी से 11 मंत्रियों को जगह मिली है, जिसमें रमेश चेन्निथला, सनी जोसेफ, के. मुख्यधरण, ए.पी. अनिल कुमार और पी.सी. विष्णुनाथ जैसे कद्दावर चेहरे शामिल हैं. सरकार के स्थायित्व को सुनिश्चित करने के लिए गठबंधन के सबसे बड़े सहयोगी दल ‘इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग’ (IUML) के 5 विधायकों को कैबिनेट में शामिल किया गया है, जिनमें पी.के. कुन्हालीकुट्टी और के.एम. शाजी प्रमुख हैं. इसके अलावा केरल कांग्रेस (जोसेफ) के मोंस जोसेफ और आरएसपी के शिबू बेबी जॉन ने भी मंत्री पद की शपथ ली है. सतीशन ने स्पष्ट किया है कि उनकी इस कैबिनेट में समाज के हर वर्ग, धर्म और महिलाओं को पर्याप्त प्रतिनिधित्व दिया गया है.

कांग्रेस में ‘हाईकमान कल्चर’ का अंत और स्वायत्त क्षत्रपों का उदय

इस पूरी सियासी जंग का अंतिम निष्कर्ष यह है कि केरल को वी.डी. सतीशन के रूप में एक ऐसा मुख्यमंत्री मिला है, जिसके पास जमीनी कार्यकर्ताओं का वास्तविक समर्थन है. यह घटनाक्रम भारतीय राजनीति और विशेषकर कांग्रेस के लिए एक नया मोड़ है. इसने साबित कर दिया है कि जब राज्यों की अपनी आवाज़ दिल्ली के बंद कमरों की फुसफुसाहटों से ज्यादा तेज़ हो जाए, तो आलाकमान को झुकना ही पड़ता है.

सतीशन ने कर्नाटक के सिद्धारमैया की तरह यह साबित कर दिया है कि यदि आपकी पकड़ जमीन पर और विधायकों पर मजबूत है, तो आप एक स्वतंत्र और शक्तिशाली मुख्यमंत्री के रूप में काम कर सकते हैं. सतीशन का यह उभार आने वाले दिनों में कांग्रेस के भीतर राज्यों की स्वायत्तता को और मजबूत करेगा. राष्ट्रीय स्तर पर इस त्याग और समझौते का ऊंट किस करवट बैठता है, यह आने वाला वक्त तय करेगा. अभी तो केरल में कांग्रेस की सरकार बनी है, इसकी खुशी मनाई जा रही है.



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