सोशल मीडिया (फेसबुक) और रचना का क्रियाकरम-Social media and creation activity

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फेसबुक पर कविता अब संक्रामक महामारी का रूप लेती जा रही है।

यहाँ बहुतों ने बहुतों को कविता में कविता के लिए उकसाया है और बहुतों द्वारा बहुत कुछ लिखा भी जा रहा है। जो देखो वही चपेट में आ रहा है।

संक्रमित व्यक्ति पूरी मुस्कान के साथ खुद ही फेसबुक पर कविता लिखकर या फेसबुक पर लाइव आकर इसकी चपेट में आने की सूचना दे रहा है।

बड़ी मारामारी मची है। लोग लिखेंगे ही क्योंकि वे फेसबुक पर हैं। हर आदमी हाथ आजमा रहा है।

पर यह संक्रमण सुखद है। सुखद इस मायने में है कि शैक्षिक गुणवत्ता के सूचकांक के लगातार नीचे लुढ़कने और नई पीढ़ी के पढ़ने-लिखने से कोसों दूर होने के तमाम आरोपों के बावजूद हमारी साहित्यिक रचनाधर्मिता सोशल मीडिया के जरिये आकाशीय ऊंचाईयां छू रही है।

फेसबुक और व्हाट्सएप पर लेखन क्षेत्र में जबरदस्त प्रतियोगिता है। भले ही हम एक-दूसरे का लिखा न पढ़ें, पर लिखते खूब हैं।

एक-दूसरे की तारीफ़ झोंककर एकदूसरे को सकारात्मक रूप से प्रेरित भी करते रहते हैं। ऐसी स्वस्थ भावना और कहाँ मिलेगी !!

स्वान्तः सुखाय की आड़ में अब तक इतना लिखा जा चुका है, कि उसका मूल्यांकन तो खैर छोड़ ही दीजिए, बल्कि सच कहूँ तो आने वाली पीढियां इस साहित्यिक अवदान के ऋण से कभी उबर नहीं पाएंगी। 

खुशी इतनी कि दिल में न समाए और हमें खुशी है कि कुछ लिखा तो जा रहा है। सोचता हूँ अगर फेसबुक न होता तो साहित्य की कितनी क्षति होती !!!

फेसबुक न होता तो,  तो क्या होता, तो क्या होता??

तुकबंदियों की सीढ़ी से साहित्य के शैल शिखर पर झंडे गाड़े जा रहे हैं। तुकबंदित्व ने कविता को नया आयाम दिया है।

इसने कविता को जन-जन तक पहुंचाया है। इस संदर्भ में हमारे राष्ट्रीय कवि और प्रखर राजनीतिक चिंतक अठावले ने अपनी आशु कविता से सभी का दिल जीत लिया।

नमूने के तौर पर उनकी ये पंक्तियां देखें और फिर उसका रस-लालित्य देखें। एक देश है रोम, हमारे अध्यक्ष हैं बिड़ला ओम।

अभी तक दोहा, सोरठा व छंद आदिक कठिन व्याकरण ने पता नहीं कितनों की रचनाधर्मिता की भ्रूणहत्या की होगी !

लेकिन अठावले की कविता और फेसबुक के मंच ने इस क्षेत्र में नई सम्भावनाएं जगा दीं हैं। *अब हर आदमी खुद में कवि होने की संभावनाएं तलाशने लगा है।

पहले कवि बनने के लिए प्रेम में ग़ाफ़िल होना अर्थात ‘कुछ-कुछ होता है’ होना जरूरी हुआ करता था या कम से कम आपके अंदर तो दूसरों के लिए दर्द होना जरूरी ही था,

जैसे कि वाल्मीकि जी को क्रौंच पक्षी को देखकर के हुआ था। पर अब यह सब आउटडेटेड है।

अब कवि खुद सामर्थ्यवान है, उसकी कविता किसी भाव-उद्दीपन की मोहताज नहीं। अब वह खुद ही अपनी कविता से दूसरों को दर्द देता है।

हाँ तो फेसबुक और अठावले जैसों ने छंद मुक्त कविता के जरिये एकबारगी सबको “मानव होना भाग्य है, कवि होना सौभाग्य” के स्थपित सत्य से परिचय कराकर गर्वित होना सिखा दिया।

अब कवि होना मुख्य टारगेट है, मानव होना आपकी च्वाइस। सो नए लौंडे-लपाड़े कविता के क्षेत्र में दुःसाहस की हद तक आशावादी हो गए हैं।

‘मसि कागद छुओ नहिं, कलम गह्यो नहि हाथ’ की परंपरा की पूरी की पूरी फौज रचना कर्म हेतु मैदान में उतर गई। 

एक-आध लाइनों के साथ हम भी कूदे थे मैदान में, पर अच्छा रिस्पॉन्स न मिलने से ( उल्टे टी.आर.पी.और डाउन हुई)  किसी की तरह झोला उठाकर चल दिये।

हम तो साहित्यकार वाली स्टाइल में उठने-बैठने भी लगे थे। कहने का मतलब हंसना-बोलना बहुत कम कर दिया था।

गम्भीर बन गया था। बोलने के नाम पर सिर्फ हमारी चुप्पी बोलती थी। पठन-पाठन में खुद की अरुचि के बावजूद साहित्य में पठनीयता के संकट से अहर्निश चिंतित रहने लगा।

गम्भीरता इस कदर चेहरे पर पसरी कि  साहित्यिक समारोहों की जगह मर्सिया पढ़ने के बुलावा आने लगे।

साहित्यकार दिखने के लिए बाक़ायदा एक पेन और डायरी भी ले ली थी। मगर सब बेकार।

पेन-डायरी के पैसे डूबे सो अलग। लेकिन हम जानते हैं कि हमारी कविता में कोई कमी नहीं रही होगी, बस फेसबुक और ग्रुप्स के  स्थापित आचरण में ही कहीं गड़बड़ी रही होगी।
पर एक हम असफल हुए तो क्या हुआ, कविता तो असफल नहीं हुई!!

आज के फेसबुकिया कवि जुगनुओं की तरह चमकते हुए तारे की राह चल सूरज-चंदा बनने की हसरत रखते हैं।एक हम ही नहीं है जहाँ में और भी तमाम हैं……

रचनाधर्मिता से ग्रस्त लोगों की हनक इतनी कि कविता में जहाँ से चाहे वहीं से पंक्ति मोड़ देते हैं।

अब समझइय्या की मौत है !! ढूढ़ते रहिये कविता का मर्म आप !! लिखने वाले ने लिख दी ब्रम्हाक्षरी, अब समझते रहिये उम्र भर। लेकिन यह कोई खराब बात नहीं।

असल में यही तो कविता और लेखन की खूबसूरती है कि वह लोगों के समझ में न आए। कविता और लेखन वही उच्चकोटि का जो सर के ऊपर से निकले।

पर एक कमी खलती है अपनी जमात में। भाई लोग अभी भी आत्मनिर्भर नहीं है पूरी तरह से। वह मंच से ही पब्लिक से मदद की गुहार लगाने लगते हैं।

कुछ शायर लोग जब मंच पर पब्लिक से यह कहते हुए पाए जाते हैं कि अब अगला मिसरा आप उठा लेना, आप संभाल लेना, तब समझ में नहीं आता ये भाई लोग करने क्या आते हैं यहाँ ?? 

क्यों भाई आप से क्यों नहीं उठाया जा रहा, आपसे क्यों नहीं सँभल रहा? अरे भाई ऐसा मिसरा आप लोग लिखते ही क्यों हैं, जिसको खुद नहीं संभाल सकते ?? 

ऐसा मिसरा लिखने से क्या फायदा जिसको संभालने के लिए मिश्राजी,शुक्लाजी, ठाकुर साहब या खान साहब से गुहार लगानी पड़े…. भई अब तो आत्मनिर्भर बनिये!!!

मेरी नहीं तो कम से कम देश की आवाज को सुनिए; देश की नहीं तो कम से कम किसी के मन की बात सुनिये, पर आत्मनिर्भर बनिये।

और हाँ, इससे इतर सोशल मीडिया पर एक ऐसा वर्ग भी है जो कविता की भीड़ में खुद के खो जाने से डरता है।

यह वर्ग कविता तो नहीं लेकिन कविता की व्याख्या में जरूर नाम कमा रहा है।

ऐसे लोग जो भीड़ की धक्कामुक्की से डरते हैं, वह कविता की भीड़ से इतर व्याख्या में कुछ नया करने की कोशिश कर रहें हैं।

इसकी तारीफ की जानी चाहिए।एक बहुश्रुत दोहे की व्याख्या कुछ इस टाइप में आई। 

ग़ौर फ़रमाइये। दोहा है-
“ऐसे बानी बोलिये मन का आपा खोय,औरन को शीतल करै आपहु शीतल होय” 

      अर्थात’ भाईसाब के अनुसार ऐसी बोली बोलिये कि सामने वाला अपना आपा खो दे; वह आपे से बाहर आ जाय। ऐसी बोली जो दूसरे की चढ़ी गर्मी को उतार दे और इसके बाद खुद की छाती में भभक रही आग को भी तुरंत ठंडक दे।’

निश्चित ही यह क्रांतिधर्मी व्याख्या सोशल मीडिया के प्लेटफार्म के जरिये ही प्रकाश में आ सकी है। अतः सोशल मीडिया का एहसान मानते हुए आप भी इस अद्भुत व्याख्या की दाद दीजिए.

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