आम आदमी पार्टी (AAP) के भीतर मचे घमासान और सात राज्यसभा सांसदों के बीजेपी में शामिल होने से दिल्ली की राजनीति में हलचल मचा दी है। अरविंद केजरीवाल ने इस बगावत को ‘धक्का’ करार दिया था, लेकिन असली कानूनी ‘धक्का’ राघव चड्ढा और उनके साथी सांसदों को लग सकता है. इस पूरे विवाद की जड़ में सुप्रीम कोर्ट का 2023 का ‘सुभाष देसाई बनाम महाराष्ट्र राज्यपाल’ (शिवसेना मामला) फैसले में एक टिप्पणी है है. इस ऐतिहासिक केस में अदालत ने स्पष्ट किया था कि ‘लेजिस्लेटिव पार्टी’ (विधायक/सांसद दल) खुद को पॉलिटिकल पार्टी (मूल राजनीतिक दल) से स्वतंत्र घोषित नहीं कर सकती. यदि यह दलील इस केस में लागू होती है तो महज दो-तिहाई बहुमत होने के बावजूद राघव चड्ढा गुट का विलय या अलग होना अवैध घोषित हो सकता है.
राघव चड्ढा गुट के लिए क्यों बढ़ सकती है मुश्किल?
· नंबर बनाम संगठन: दसवीं अनुसूची के पैराग्राफ 4 के तहत दो-तिहाई सदस्यों का आंकड़ा तो राघव गुट के पास दिख रहा है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के अनुसार सिर्फ संख्या बल ही पार्टी की पहचान तय नहीं कर सकता.
· पार्टी की व्हिप का उल्लंघन: कोर्ट ने माना है कि लेजिस्लेटर स्वतंत्र रूप से काम नहीं कर सकते; उन्हें मूल राजनीतिक पार्टी की व्हिप और निर्णयों को मानना होगा.
· पार्टी लेवल पर विलय अनिवार्य: कानून की व्याख्या के अनुसार विलय केवल विधायी स्तर पर नहीं बल्कि पार्टी के संगठनात्मक स्तर पर भी होना चाहिए.
· संवैधानिक स्ट्रेस टेस्ट: यह मामला भारत के दलबदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) की परीक्षा है, जिसका उद्देश्य ‘अवसरवादी दलबदल’ को रोकना है न कि उसे कानूनी मान्यता देना.
· सभापति की भूमिका: अब राज्यसभा सभापति को यह तय करना होगा कि क्या यह विलय कानूनी मानकों को पूरा करता है या यह पैराग्राफ 2 के तहत दलबदल का मामला है.
सुप्रीम कोर्ट की 2023 की दलील और इसके मायने
सुप्रीम कोर्ट ने शिवसेना मामले में क्या मुख्य सिद्धांत तय किया था?
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट सीमा रेखा (clear demarcation) खींचते हुए कहा था कि विधायी बहुमत अकेले राजनीतिक दल की पहचान या उसके फैसलों को तय नहीं कर सकता. लेजिस्लेटिव विंग, मूल पॉलिटिकल पार्टी से अलग होकर स्वतंत्र रूप से काम नहीं कर सकती.
क्या राघव चड्ढा और अन्य सांसद दलबदल कानून से बच पाएंगे?
यदि केवल संख्या बल (दो-तिहाई) को आधार बनाया गया तो वे बच सकते हैं लेकिन यदि मूल पार्टी की सहमति और संगठन के विलय को अनिवार्य माना गया (जैसा 2023 के फैसले में संकेत था), तो उनकी सदस्यता पर खतरा मंडरा सकता है.
संवैधानिक रूप से यह ‘धक्का’ राघव चड्ढा के लिए कैसे भारी पड़ सकता है?
अगर यह साबित हो जाता है कि विधायी दल ने मूल पार्टी की इच्छा के विरुद्ध काम किया है तो उन्हें अयोग्य (Disqualified) ठहराया जा सकता है. बिना समय सीमा के फैसला लंबित रहने तक वे तकनीकी रूप से पार्टी से बंधे रहेंगे, जिससे उनकी स्थिति और भी जटिल हो जाएगी.
दलबदल विरोधी कानून का इतिहास क्या है और इसे क्यों लाया गया?
भारत में 1960 और 70 के दशक में ‘आया राम गया राम’ की राजनीति (बार-बार पार्टी बदलना) चरम पर थी. इसे रोकने के लिए 1985 में 52वें संविधान संशोधन के जरिए 10वीं अनुसूची जोड़ी गई. इसका मुख्य उद्देश्य राजनीतिक स्थिरता सुनिश्चित करना और अवसरवादी दलबदल को रोकना था.
क्या शुरू से ही ‘विलय’ के लिए दो-तिहाई सदस्यों की संख्या जरूरी थी?
नहीं, मूल कानून में एक-तिहाई (1/3) सदस्यों के टूटने पर उसे विभाजन मानकर अयोग्यता से छूट दी गई थी. लेकिन इस प्रावधान का बड़े पैमाने पर दुरुपयोग हुआ जिसके बाद 2003 में 91वें संविधान संशोधन द्वारा विभाजन के प्रावधान को हटा दिया गया. अब अयोग्यता से बचने का एकमात्र रास्ता विलय है, जिसके लिए दो-तिहाई (2/3) सदस्यों की सहमति अनिवार्य है.
राघव चड्ढा और अन्य सांसदों के मामले में पैराग्राफ 4 क्या कहता है?
10वीं अनुसूची का पैराग्राफ 4 यह अपवाद देता है कि यदि किसी विधायी दल के कम से कम दो-तिहाई सदस्य दूसरी पार्टी में विलय के लिए सहमत हो जाते हैं तो उन पर दलबदल कानून लागू नहीं होगा. वर्तमान में AAP के 10 राज्यसभा सांसदों में से 7 (दो-तिहाई) अलग हुए हैं जो तकनीकी रूप से इस संख्या बल को पूरा करते प्रतीत होते हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने पॉलिटिकल पार्टी और लेजिस्लेटिव पार्टी के बीच क्या अंतर स्पष्ट किया है?
2023 के ‘सुभाष देसाई बनाम महाराष्ट्र राज्यपाल’ केस में कोर्ट ने दोनों के बीच एक स्पष्ट “सीमा रेखा” खींची है. कोर्ट ने कहा कि विधायी दल (सांसद/विधायक) मूल राजनीतिक दल से स्वतंत्र होकर काम नहीं कर सकते. राजनीतिक दल ही व्हिप नियुक्त करने और पार्टी की पहचान तय करने का अधिकार रखता है, न कि केवल निर्वाचित सदस्यों का बहुमत.
क्या बिना मूल संगठन के विलय के केवल सांसदों का दूसरी पार्टी में जाना मान्य है?
कानून की सामान्य व्याख्या के अनुसार विलय के लिए दोहरी शर्त जरूरी दिखती है: पहला—संगठनात्मक स्तर पर मूल राजनीतिक दल का विलय, और दूसरा—विधायी दल के दो-तिहाई सदस्यों का समर्थन. यदि मूल संगठन (AAP का केंद्रीय नेतृत्व) विलय के खिलाफ है, तो केवल सांसदों का गुट खुद को मूल पार्टी से अलग कर विलय का दावा नहीं कर सकता.
यदि यह मामला अयोग्यता की ओर बढ़ता है, तो फैसला आने तक सांसदों की स्थिति क्या रहेगी?
जब तक राज्यसभा सभापति अयोग्यता याचिकाओं पर अंतिम निर्णय नहीं लेते तब तक वे सांसद तकनीकी रूप से उसी पार्टी (AAP) के सदस्य बने रहेंगे जिसके टिकट पर वे चुने गए थे. हालांकि, इस दौरान वे दूसरी पार्टी का समर्थन कर सकते हैं, लेकिन मूल पार्टी की व्हिप का उल्लंघन करने पर उन पर अयोग्यता की तलवार लटकी रहेगी.


