नई दिल्ली. क्रिकेट की दुनिया में कई रिकॉर्ड बनते हैं और टूटते हैं. लेकिन कुछ आंकड़े ऐसे होते हैं जो रिकॉर्ड की सीमा लांघकर ‘दंतकथा’ बन जाते हैं. श्रीलंका के जादूगर स्पिनर मुथैया मुरलीधरन का 1347 इंटरनेशनल विकेटों का एवरेस्ट एक ऐसा ही अभेद्य किला है, जिसे देख आज के दौर के गेंदबाज शायद लड़खड़ा जाएं. यह महज एक संख्या नहीं, बल्कि दो दशकों तक बल्लेबाजों के मन में बैठा वह खौफ है, जो मुरली की बड़ी-बड़ी घूमती आंखों और उससे भी ज्यादा घूमने वाली गेंदों से पैदा होता था.
मुथैया मुरलीधरन (Muthiah Muralidaran) का सफर किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है. 1992 में जब उन्होंने डेब्यू किया, तो किसी ने नहीं सोचा था कि कलाई के एक अजीबोगरीब घुमाव वाला यह पतला सा लड़का एक दिन शेन वार्न और ग्लेन मैक्ग्रा जैसे दिग्गजों को पीछे छोड़ देगा. उनकी गेंदबाजी का एक्शन हमेशा चर्चा और विवादों के केंद्र में रहा. 1995 के मेलबर्न टेस्ट में जब अंपायर डेरेल हेयर ने उन्हें ‘नो बॉल’ करार दिया, तो पूरी दुनिया में हंगामा मच गया. लेकिन मुरली टूटे नहीं. उन्होंने अपनी बायो-मैकेनिकल जांच कराई, दुनिया को दिखाया कि उनकी कोहनी में जन्मजात मोड़ है, और आईसीसी को अपने नियम बदलने पर मजबूर कर दिया. वह विवादों की आग से तपकर कुंदन की तरह निकले और फिर शुरू हुआ विकेटों का वो सिलसिला जो रिकॉर्ड बुक को छोटा करने लगा.
मुरलीधरन के नाम टेस्ट में सबसे ज्यादा 800 विकेट दर्ज हैं
मुरलीधरन के करियर का सबसे बड़ा शिखर टेस्ट क्रिकेट रहा. उन्होंने 133 मैचों में 800 विकेट चटकाए. आज जब टी20 क्रिकेट के बढ़ते चलन और खिलाड़ियों के वर्कलोड मैनेजमेंट के कारण गेंदबाज 50-60 टेस्ट के बाद ही थकने लगते हैं, मुरली का यह आंकड़ा एक सपने जैसा लगता है. उन्होंने टेस्ट करियर में 67 बार पारी में पांच विकेट और 22 बार मैच में दस विकेट लेने का कारनामा किया. उनकी सबसे बड़ी खूबी यह थी कि वह थका देने वाले स्पैल फेंकने के बावजूद गेंद की धार कम नहीं होने देते थे. टर्निंग पिचों पर तो वह घातक थे ही, लेकिन सूखी और बेजान पिचों पर भी उनकी ‘दूसरा’ और ‘ऑफ स्पिन’ बल्लेबाजों को नाच नचा देती थी. अपने विदाई टेस्ट में, भारत के खिलाफ प्रज्ञान ओझा का विकेट लेकर जब उन्होंने 800 का आंकड़ा छुआ, तो वह पल क्रिकेट इतिहास के सबसे भावुक और गौरवशाली पलों में दर्ज हो गया.
टेस्ट के बाद वनडे में भी मुरलीधरन का दबदबा
सिर्फ सफेद जर्सी ही नहीं, रंगीन कपड़ों में भी मुरली का जादू सिर चढ़कर बोलता था. वनडे क्रिकेट में उन्होंने 350 मैचों में 534 विकेट अपने नाम किए. साल 1996 के विश्व कप में श्रीलंका की खिताबी जीत में उनकी भूमिका एक रीढ़ की हड्डी की तरह थी. वह रन रोकना भी जानते थे और नाजुक मौकों पर विकेट निकालना भी. उनके खिलाफ रन बनाना एक ऐसी पहेली थी जिसे सचिन तेंदुलकर और ब्रायन लारा जैसे महान बल्लेबाज भी कभी-कभी हल नहीं कर पाते थे.मुरलीधरन के नाम वनडे में 10 बार पारी में पांच विकेट लेने का रिकॉर्ड है, जो स्पिनर्स के लिए आज भी एक मील का पत्थर है.
इंटरनेशनल क्रिकेट में सबसे ज्यादा विकेट लेने वाले दुनिया के टॉप 5 गेंदबाज
इंटरनेशनल क्रिकेट में सबसे ज्यादा विकेटों की लिस्ट में मुथैया मुरलीधरन के एकछत्र राज की गवाही देती है. 1347 विकेटों के साथ वह टॉप पर हैं, जबकि दिग्गज शेन वार्न 1001 विकेट लेकर दूसरे स्थान पर काबिज हैं. तेज गेंदबाजों में जेम्स एंडरसन (991) और ग्लेन मैक्ग्रा (949) ने अपनी धार दिखाई. वहीं भारत के अनिल कुंबले 956 विकेटों के साथ चौथे पायदान पर हैं. मुरलीधरन की श्रेष्ठता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने रिकॉर्ड 77 बार पारी में पांच विकेट लिए हैं, जो अन्य गेंदबाजों की तुलना में दोगुने से भी अधिक है.
क्यों ‘अजेय’ है मुरलीधरन का किला?
आज के दौर में जब हम 1347 विकेटों के इस विशाल साम्राज्य को देखते हैं, तो इसकी भव्यता और बढ़ जाती है. मौजूदा दौर में फिटनेस की समस्याएं और टी20 लीग्स की भरमार ने खिलाड़ियों के करियर को छोटा कर दिया है. टेस्ट क्रिकेट अब पहले जैसा प्राथमिकता में नहीं रहा.ऐसे में किसी गेंदबाज का 20 साल तक लगातार खेलना, चोटों से बचे रहना और तीनों फॉर्मेट में अपनी धार बनाए रखना नामुमकिन सा लगता है. मुथैया मुरलीधरन सिर्फ एक गेंदबाज नहीं थे, वह क्रिकेट के मैदान पर एक मनोवैज्ञानिक योद्धा थे. जब वह दौड़ते हुए आते थे और अपनी बड़ी-बड़ी आंखों से बल्लेबाज को घूरते थे, तो आधे बल्लेबाज तो वहीं अपना विकेट दे बैठते थे. उनकी मुस्कुराहट जितनी मासूम थी, उनकी ऑफ-ब्रेक उतनी ही कातिलाना.
मुरलीधरन के रिकॉर्ड को तोड़ना मुश्किल
मुरलीधरन का यह रिकॉर्ड किसी म्यूजियम में रखी उस बेशकीमती कलाकृति की तरह है, जिसे दुनिया देख तो सकती है. सराह तो सकती है, लेकिन शायद ही कोई उसे दोबारा रच पाएगा. 1347 विकेटों का यह किला आज भी शान से खड़ा है और आने वाली पीढ़ियों को यह याद दिलाता रहेगा कि जब जूनून और प्रतिभा मिलते हैं, तो इतिहास नहीं, ‘मुरलीधरन’ जैसा अमर अध्याय लिखा जाता है.


