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क्रिकेट में आज 300 रनों का पीछा करना एक सामान्य बात लगती है, लेकिन 18 जनवरी 1998 को ढाका के नेशनल स्टेडियम में जो हुआ, उसने वनडे क्रिकेट की परिभाषा बदल दी. ‘सिल्वर जुबली इंडिपेंडेंस कप’ के बेस्ट-ऑफ-थ्री फाइनल का यह निर्णायक मुकाबला था. सामने पाकिस्तान की मजबूत टीम थी और लक्ष्य था 48 ओवरों में 315 रन एक ऐसा स्कोर जिसे उस समय तक वनडे इतिहास में कभी भी हासिल नहीं किया गया था.
1998 में पहली बार किसी टीम ने चेज किया था 300+ का स्कोर, ढाका में भारत ने किया ये करिश्मा
नई दिल्ली. यह क्रिकेट इतिहास की उन चंद रातों में से एक थी, जिसने भारतीय प्रशंसकों को हार के जबड़े से जीत छीनने का असली मतलब समझाया. जनवरी 1998 का वह ढाका का मैदान, कोहरे से भरी शाम और सीमा पार के कट्टर प्रतिद्वंद्वी के खिलाफ एक ऐसा लक्ष्य, जो उस दौर में ‘नाममुकिन’ माना जाता था.
क्रिकेट में आज 300 रनों का पीछा करना एक सामान्य बात लगती है, लेकिन 18 जनवरी 1998 को ढाका के नेशनल स्टेडियम में जो हुआ, उसने वनडे क्रिकेट की परिभाषा बदल दी. ‘सिल्वर जुबली इंडिपेंडेंस कप’ के बेस्ट-ऑफ-थ्री फाइनल का यह निर्णायक मुकाबला था. सामने पाकिस्तान की मजबूत टीम थी और लक्ष्य था 48 ओवरों में 315 रन एक ऐसा स्कोर जिसे उस समय तक वनडे इतिहास में कभी भी हासिल नहीं किया गया था.
सईद अनवर और एजाज अहमद का तूफान
टॉस हारकर पहले बल्लेबाजी करने उतरी पाकिस्तानी टीम ने भारतीय गेंदबाजों की जमकर खबर ली. सलामी बल्लेबाज सईद अनवर (140) और एजाज अहमद (117) ने शतकीय पारियां खेलते हुए स्कोरबोर्ड पर 314 रनों का पहाड़ खड़ा कर दिया. खराब रोशनी के कारण मैच को 48 ओवर का कर दिया गया था, जिससे चुनौती और भी कठिन हो गई थी.
सचिन का धमाका और ‘मास्टरस्ट्रोक’ रॉबिन सिंह
लक्ष्य का पीछा करने उतरी भारतीय टीम को सचिन तेंदुलकर ने तूफानी शुरुआत दी (26 गेंदों पर 41 रन). लेकिन असली टर्निंग पॉइंट तब आया जब कप्तान मोहम्मद अजहरुद्दीन ने एक साहसी फैसला लिया. उन्होंने सबको चौंकाते हुए अनुभवी रॉबिन सिंह को नंबर 3 पर प्रमोट किया. रॉबिन सिंह ने सौरव गांगुली के साथ मिलकर पाकिस्तानी गेंदबाजों के पसीने छुड़ा दिए. गांगुली ने जहां शानदार 124 रन बनाए, वहीं रॉबिन सिंह ने 82 रनों की जुझारू पारी खेली. दोनों के बीच हुई 179 रनों की विशाल साझेदारी ने भारत को जीत की दहलीज पर लाकर खड़ा कर दिया.
अंतिम ओवर का रोमांच: कानितकर की वो ऐतिहासिक चौका
जैसे-जैसे मैच खत्म होने की ओर बढ़ा, रोमांच चरम पर पहुँच गया. अंतिम ओवर में भारत को जीत के लिए 9 रनों की दरकार थी और गेंद पाकिस्तान के सबसे भरोसेमंद स्पिनर सकलैन मुश्ताक के हाथों में थी क्रीज पर थे ऋषिकेश कानितकर और जवागल श्रीनाथ. पहली चार गेंदों पर भारतीय बल्लेबाजों ने भागकर रन जुटाए. अब 2 गेंदों पर 3 रन चाहिए थे. पूरा स्टेडियम थम सा गया था.सकलैन ने पाँचवीं गेंद फेंकी और बाएं हाथ के बल्लेबाज कानितकर ने मिड-विकेट की दिशा में एक जोरदार चौका जड़ दिया. भारत ने 1 गेंद शेष रहते यह ऐतिहासिक लक्ष्य हासिल कर लिया.
यह केवल एक मैच की जीत नहीं थी, बल्कि भारतीय क्रिकेट के नए युग का आगाज था. गांगुली के ‘सेंचुरी’, रॉबिन सिंह के ‘सरप्राइज प्रमोशन’ और कानितकर के उस ‘अंतिम चौके’ ने करोड़ों भारतीयों को वो खुशी दी जिसे आज भी क्रिकेट प्रेमी याद करते हैं. ढाका की उस रात भारत ने दुनिया को बता दिया कि रिकॉर्ड्स टूटते ही हैं बशर्ते आपके पास लड़ने का जज्बा हो.


