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‘ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट’ पर झुके, तो हिंद महासागर दुश्मनों को सौंप देंगे, एक्‍सपर्ट ने बताया गेम चेंजर

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मान लीजिए आपके घर का पिछला दरवाजा खुला हो और मोहल्ले के सबसे बड़े गुंडे की नजर उसी दरवाजे पर गड़ी हो, तो आप क्या करेंगे? जाहिर सी बात है, सबसे पहले वहां एक मजबूत ताला जड़ेंगे. बस, ठीक यही कहानी है भारत के 72 हजार करोड़ वाले ‘ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट’ की. इन दिनों इस प्रोजेक्ट पर तगड़ा गदर कटा हुआ है. एक तरफ कुछ लोग हैं जो कह रहे हैं कि भइया, पर्यावरण बचाइए. वहीं दूसरी तरफ रणनीतिकार छाती पीट-पीट कर कह रहे हैं कि अगर कुछ ‘पीआर कैंपेन’ के चक्कर में आकर हमने ये प्रोजेक्ट रोक दिया, तो समझ लीजिए अपना हिंद महासागर हमने चीन के हाथों में थाली में सजाकर सौंप दिया. क्‍योंक‍ि भारत के ल‍िए यह गेम चेंज‍िंग प्रोजेक्‍ट है.

’ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट’ आखिर है क्या और इस पर इतना हंगामा क्यों है?

भारत सरकार अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के सबसे आखिरी छोर यानी ‘ग्रेट निकोबार’ में 72,000 करोड़ रुपये की लागत से एक मेगा प्रोजेक्ट बना रही है. इसमें एक बड़ा इंटरनेशनल पोर्ट , एक इंटरनेशनल एयरपोर्ट, एक पावर प्लांट और एक नया शहर बसाने की योजना है. लेकिन, हाल के दिनों में इस प्रोजेक्ट के खिलाफ सोशल मीडिया पर एक कैंपेन सा चल पड़ा है. लेकिन एक्‍सपर्ट कह रहे क‍ि यह जानबूझकर चलाया जा रहा है ताक‍ि प्रोजेक्‍ट को रोका जा सके. इस तरह के कैंपेन देश के रणनीतिक विकास में रोड़ा अटका रहे हैं.

पूर्वी मोर्चे को खाली छोड़ने का अंजाम खतरनाक क्‍यों?

एक्‍सपर्ट कह रहे क‍ि अगर हम अपने पूर्वी मोर्चे को डिमिलिटराइज्ड यानी बिना सेना के और यूं ही छोड़ देते हैं… तो नतीजा भयानक होगा. दरअसल, अंडमान और निकोबार भारत का ‘पूर्वी मोर्चा’ है. अगर हम वहां अपनी नेवी को मजबूत नहीं करते हैं, वहां पोर्ट और रनवे नहीं बनाते हैं, तो वह इलाका बिल्कुल सूना रहेगा. समुद्र में जो इलाका सूना होता है, वहां धीरे-धीरे दुश्मन ताकतें अपनी पैठ बना लेती हैं. अगर भारत घरेलू विरोधों के डर से वहां विकास नहीं करेगा, तो भविष्य में जंग जैसी स्थिति में या शांति के समय में भी हम हिंद महासागर में अपनी ही चौखट पर कमजोर पड़ जाएंगे.

मलक्का स्‍ट्रेट दुनिया की सबसे अहम समुद्री ‘चेकपोस्ट’ क्‍यों?

ग्रेट निकोबार आईलैंड के ठीक बगल में ‘मलक्का स्‍ट्रेट’ है. यह इंडोनेशिया और मलेशिया के बीच एक बहुत ही संकरा समुद्री रास्ता है. आपको जानकर हैरानी होगी कि दुनिया भर का लगभग 40% व्यापार और चीन का 80% से ज्यादा तेल इसी पतले से रास्ते से होकर गुजरता है. ग्रेट निकोबार इस रास्ते के मुहाने पर एक ‘टोल प्लाजा’ या ‘चेकपोस्ट’ की तरह बैठा है. अगर भारत यहां अपना मजबूत नेवल बेस और समुद्री हब बना लेता है, तो वह चीन समेत किसी भी देश के जहाजों की आवाजाही पर सीधे नजर रख सकता है. युद्ध की स्थिति में भारत इस रास्ते को ब्लॉक करके दुश्मन की अर्थव्यवस्था और सेना की कमर तोड़ सकता है.

एक ‘गेम चेंजिंग’ प्रोजेक्ट क्यों है यह भारत का मास्टरस्ट्रोक?

एक्‍सपर्ट इसे भारत का सबसे बड़ा समुद्री मास्टरस्ट्रोक कह रहे हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि यह सिर्फ एक मिलिट्री बेस नहीं है, बल्कि एक स्ट्रैटेजिक मैरीटाइम हब है. जब यहां एक बड़ा इंटरनेशनल पोर्ट बनेगा, तो दुनिया भर के जो व्यापारिक जहाज मलक्का से गुजरेंगे, वे तेल भरवाने, मरम्मत के लिए या सामान उतारने के लिए भारत के इस पोर्ट पर रुकेंगे. इससे न सिर्फ भारत को अरबों डॉलर की कमाई होगी, बल्कि उस इलाके में भारत का दबदबा भी बढ़ेगा. जहाज सिंगापुर या कोलंबो जाने के बजाय ग्रेट निकोबार में रुकेंगे. आर्थिक तरक्की के साथ-साथ यह इंडियन नेवी के लिए एक ऐसा स्थायी ठिकाना बन जाएगा, जहां से पूरे साउथ ईस्‍ट एश‍िया पर नजर रखी जा सकेगी.

यहां भारत की मौजूदगी चीन के गले की फांस क्‍यों?

चीन पिछले कई सालों से स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स नाम की रणनीति के तहत भारत को समुद्र में घेरने की कोशिश कर रहा है. वह श्रीलंका (हंबनटोटा), पाकिस्तान (ग्वादर) और म्यांमार में अपने बंदरगाह बना चुका है. चीन की नेवी लगातार हिंद महासागर में अपनी पनडुब्बियों और युद्धपोतों की गश्त बढ़ा रही है. ऐसे में अगर भारत अपने ही निकोबार द्वीप को विकसित नहीं करेगा, तो चीन हिंद महासागर का अघोषित बॉस बन जाएगा. ग्रेट निकोबार में भारत की मौजूदगी चीन के गले की वह फांस है, जो उसे हिंद महासागर में अपनी मनमानी करने से रोकती है.



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