असम में मुस्लिम वोट किधर गया? कांग्रेस वहीं खड़ी है, यानी उसका वोटिंग प्रतिशत 2021 में जितना था, लगभग उतना ही इसबार भी रहा. लेकिन मुस्लिमों के दम पर असम की सियासत में किंगमेकर की भूमिका निभाने वाली बदरुद्दीन अजमल की पार्टी ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (AIUDF) का वोट प्रतिशत आधा हो गया. मुस्लिम बहुल सीटों पर एकछत्र राज करने वाली AIUDF को इस बार ऐसा झटका लगा है, जिसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की होगी. अब सवाल ये है कि आखिर जो मुस्लिम वोट AIUDF से छिटका, वो गया कहां?
2011 की जनगणना के अनुसार, असम की कुल जनसंख्या में मुस्लिम आबादी 34.22% थी. उस समय राज्य की कुल आबादी करीब 3.12 करोड़ थी, जिसमें से लगभग 1.06 करोड़ मुस्लिम थे. आज 15 साल हो गए, यह आंकड़ा निश्चित तौर पर बढ़ा होगा. कुछ स्रोतों के मुताबिक, आज यह 38% से 40% फीसदी के आसपास पहुंच गया है. सीएम हिमंता बिस्वा सरमा कई बार खुद यह आंकड़ा गिना चुके हैं. अब आज के नतीजों पर आते हैं. कांग्रेस और एआईयूडीएफ के टोटल वोट जोड़ लिए जाएं तो भी इसके बराबर नहीं बनते. तो फिर वोट गए कहां, क्या मुस्लिमों ने बीजेपी को वोट किया?
AIUDF का एक वक्त था जलवा
असम की राजनीति में लंबे समय से यह माना जाता रहा है कि बंगाली भाषी मुस्लिम मतदाता AIUDF के प्रति वफादार हैं. हालांकि, 2026 के आंकड़ों ने इस धारणा को ध्वस्त कर दिया है. चुनाव दर चुनाव मुस्लिम मतदाताओं ने यह महसूस किया कि AIUDF के साथ रहने से न केवल उनकी राजनीतिक सौदेबाजी की शक्ति कम हो रही है, बल्कि इससे सत्तारूढ़ दल को ध्रुवीकरण का मौका भी मिल रहा है. नतीजतन, जिस मुस्लिम वोट बैंक के दम पर बदरुद्दीन अजमल सत्ता की चाबी अपने पास रखते थे, उसी वोट बैंक ने अब विकल्प तलाशना शुरू कर दिया है. AIUDF का वोट शेयर 9.3% से गिरकर 5.46% पर आना यह दर्शाता है कि पार्टी के पारंपरिक आधार में जबरदस्त सेंधमारी हुई है.
कांग्रेस की स्थिरता: बढ़त नहीं, पर अस्तित्व की लड़ाई जीती
कांग्रेस पार्टी के लिए ये आंकड़े राहत और चिंता दोनों लेकर आए हैं. 2021 में करीब 29.7% वोट हासिल करने वाली कांग्रेस 2026 में भी लगभग उसी आंकड़े के इर्द-गिर्द खड़ी है. हालांकि, पार्टी अपनी वोट हिस्सेदारी बढ़ाने में नाकाम रही, लेकिन उसने AIUDF के पतन के बीच खुद को मुस्लिम और धर्मनिरपेक्ष मतदाताओं के लिए एकमात्र व्यावहारिक विकल्प के रूप में पेश किया. मुस्लिम मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा, जो पहले AIUDF की ओर जाता था, इस बार स्ट्रेटजिक वोटिंग के तहत कांग्रेस की ओर झुका है, ताकि वोटों का बिखराव रोका जा सके. कांग्रेस का वोट शेयर न बढ़ना यह भी संकेत देता है कि उसने ऊपरी असम और चाय बागान क्षेत्रों में खोया हुआ आधार अभी तक पूरी तरह वापस नहीं पाया है.
‘मियां’ पॉलिटिक्स ने पलटा पूरा खेल
बदरुद्दीन अजमल की राजनीति हमेशा से धार्मिक पहचान और भाषाई अल्पसंख्यकों के अधिकारों के इर्द-गिर्द केंद्रित रही है. लेकिन मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के आक्रामक राजनीतिक रुख और राज्य में लाए गए नए कानूनों ने मुस्लिम समाज के भीतर एक नई बहस को जन्म दिया है. युवा मुस्लिम मतदाता अब केवल पहचान की राजनीति नहीं, बल्कि सुरक्षा और विकास चाहते हैं. उन्हें लगा कि AIUDF की मौजूदगी भाजपा के लिए चुनाव को ‘हिंदू बनाम मुस्लिम’ बनाने में मददगार साबित होती है. इस धारणा ने अजमल के प्रभाव को कम किया और मतदाताओं को यह सोचने पर मजबूर किया कि क्या AIUDF को वोट देना अंततः विपक्ष को कमजोर करना है.
आखिर कहां गए AIUDF के वोट?
अगर आंकड़ों का विश्लेषण करें, तो AIUDF का करीब 4% वोट शेयर गायब हुआ है. यह वोट सीधे तौर पर कांग्रेस में स्थानांतरित नहीं हुआ, बल्कि इसका एक हिस्सा निर्दलीयों और कुछ क्षेत्रीय दलों की ओर भी गया है. वहीं, कुछ सीटों पर मतदाताओं की उदासीनता भी देखी गई. रोचक बात यह है कि कांग्रेस का वोट शेयर वहीं खड़े रहने का मतलब है कि कांग्रेस ने अपने पुराने वोट खोए हैं और उनकी भरपाई AIUDF से आए नए वोटों से की है. यानी कांग्रेस के भीतर भी इनपुट और आउटपुट का एक चक्र चला है, जहां ग्रामीण और मध्यम वर्ग के कुछ हिंदू मतदाता भाजपा की ओर खिसके और उनकी जगह मुस्लिम मतदाताओं ने ली.
भाजपा की रणनीति और विपक्ष का बिखराव
असम में भाजपा ने बेहद चतुराई से ‘माइनॉरिटी वोट’ को विभाजित रखने की रणनीति पर काम किया. सरकार की कल्याणकारी योजनाओं जैसे ओरुनोदोई योजना का लाभ बिना किसी भेदभाव के सभी समुदायों तक पहुँचा, जिसने मुस्लिम समाज के एक छोटे लेकिन महत्वपूर्ण हिस्से, विशेषकर स्वदेशी मुस्लिमों Goriya, Moriya को भाजपा की ओर आकर्षित किया. जब AIUDF कमजोर हुई और कांग्रेस अपनी पुरानी स्थिति से आगे नहीं बढ़ पाई, तो इसका सीधा फायदा सत्तारूढ़ गठबंधन को हुआ. विपक्ष का गठबंधन टूटना और फिर अलग-अलग चुनाव लड़ना AIUDF के ताबूत में आखिरी कील साबित हुआ, जिससे वोटों का ऐसा बिखराव हुआ कि अजमल का किला ढह गया.
क्या खत्म हो जाएगा AIUDF का वजूद?
2026 के नतीजे AIUDF के लिए अस्तित्व का संकट लेकर आए हैं. 5.46% वोट शेयर के साथ किसी भी राज्य स्तरीय पार्टी के लिए प्रासंगिक बने रहना कठिन होता है. यह चुनाव परिणाम असम की राजनीति में तीसरे ध्रुव के खात्मे की शुरुआत हो सकती है. अब राज्य की सियासत फिर से बाइपोलर हो चली है, जहां एक तरफ भाजपा के नेतृत्व वाला गठबंधन है और दूसरी तरफ कांग्रेस. मुस्लिम मतदाताओं ने साफ संदेश दिया है कि वे अब ऐसी पार्टी के साथ खड़े होना चाहते हैं जो दिल्ली और दिसपुर में सरकार बनाने की क्षमता रखती हो, न कि केवल कुछ सीटों पर सिमटकर रहने वाली क्षेत्रीय पार्टी के साथ.


