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Virender sehwag 5 records: वीरेंद्र सहवाग, जिन्हें क्रिकेट की दुनिया ‘नजफगढ़ के नवाब’ के नाम से जानती है. भारतीय क्रिकेट इतिहास के वह जादुई बल्लेबाज रहे हैं जिन्होंने खेल के प्रति देखने का नजरिया ही बदल दिया. जब सहवाग क्रीज पर होते थे, तो गेंदबाज की पहली चिंता विकेट लेना नहीं, बल्कि खुद को बचाना होता था. टेस्ट क्रिकेट में 104 मैचों में 8586 रन और वनडे में 251 मैचों में 8273 रनों के साथ उनका करियर न केवल आंकड़ों का पिटारा है, बल्कि साहस और निर्भीकता की एक अनूठी गाथा है. सहवाग की बल्लेबाजी में एक अलग ही लय थी. वह ऐसे खिलाड़ी थे जो क्रीज पर कदम रखते ही विपक्षी टीम के हौसले पस्त कर देते थे. उन्होंने अपने करियर में कई ऐसे रिकॉर्ड बनाए, जिन्हें तोड़ पाना आज के दौर के आधुनिक बल्लेबाजों के लिए भी एक हिमालयी चुनौती साबित हो रही है.
वीरेंद्र सहवाग (Virender Sehwag) ने मार्च 2008 में चेन्नई के एम.ए. चिदंबरम स्टेडियम में जब दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ बल्लेबाजी शुरू की, तो किसी ने नहीं सोचा था कि इतिहास रचा जाएगा.मेहमान टीम के 540 रनों के विशाल लक्ष्य का पीछा करते हुए सहवाग ने गेंदबाजों की धज्जियां उड़ाते हुए मैदान के चारों तरफ शॉट लगाए. उन्होंने मात्र 304 गेंदों का सामना करते हुए 319 रनों की पारी खेली, जिसमें 42 चौके और 5 गगनचुंबी छक्के शामिल थे, जिसने टेस्ट क्रिकेट में आक्रमण की नई परिभाषा गढ़ी.

इस पारी की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि सहवाग ने केवल 278 गेंदों में अपना तिहरा शतक पूरा कर लिया था, जो उस समय का सबसे तेज टेस्ट तिहरा शतक था. उन्होंने मैथ्यू हेडन के 362 गेंदों के रिकॉर्ड को पीछे छोड़ते हुए एक नया कीर्तिमान स्थापित किया था. 14 साल से अधिक का समय बीत चुका है, लेकिन आज के आक्रामक क्रिकेट के दौर में भी कोई भी बल्लेबाज उस गति और आत्मविश्वास के साथ तिहरे शतक के करीब नहीं पहुंच सका है.

भारतीय क्रिकेट के इतिहास में सुनील गावस्कर, सचिन तेंदुलकर और राहुल द्रविड़ जैसे महान खिलाड़ियों ने खेल को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया, लेकिन दो तिहरे शतक लगाने का गौरव केवल वीरेंद्र सहवाग को प्राप्त है. उनकी पहली तिहरी सेंचुरी 2004 में मुल्तान के ऐतिहासिक मैदान पर पाकिस्तान के घातक गेंदबाजी आक्रमण के खिलाफ आई थी, जहां उन्होंने 375 गेंदों में 309 रन बनाकर दुनिया भर को दंग कर दिया था.
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मुल्तान की उस ऐतिहासिक पारी के बाद 2008 में चेन्नई में दूसरा तिहरा शतक जड़कर सहवाग ने खुद को सर्वकालिक महान बल्लेबाजों की सूची में शामिल कर लिया. आज के क्रिकेट में, जहां पिचें गेंदबाजों के लिए ज्यादा मददगार होती हैं, यह रिकॉर्ड टूटना लगभग नामुमकिन सा लगता है. करुण नायर को छोड़कर अब तक कोई अन्य भारतीय बल्लेबाज तिहरे शतक का आंकड़ा नहीं छू पाया है, जिससे सहवाग का यह कीर्तिमान हमेशा के लिए एक अभेद्य दीवार जैसा सुरक्षित है.

दिसंबर 2009 में श्रीलंका के खिलाफ कानपुर टेस्ट में सहवाग ने अपनी बल्लेबाजी का जो रौद्र रूप दिखाया, वह टेस्ट इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है. मैच के दूसरे दिन सहवाग ने मुरली विजय के साथ शुरुआत की और देखते ही देखते श्रीलंकाई गेंदबाजों की बखिया उधेड़ दी. उस एक दिन के खेल में सहवाग ने अकेले ही 284 रन ठोक डाले, जो टेस्ट क्रिकेट के एक दिन में किसी भारतीय बल्लेबाज द्वारा बनाए गए सर्वाधिक रनों का अनूठा रिकॉर्ड है.

सहवाग ने इससे पहले दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ भी एक दिन में 257 रन बनाए थे, जिसे उन्होंने ही बाद में खुद से बेहतर किया. आज के समय में टेस्ट क्रिकेट की परिस्थितियों और गेंदबाजों के लिए अनुकूल पिचों को देखते हुए, एक दिन में 284 रन का स्कोर पार करना किसी भी बल्लेबाज के लिए एक Herculean Task है. ऋषभ पंत जैसे आक्रामक बल्लेबाज टीम में जरूर हैं, लेकिन निरंतरता की कमी के कारण यह रिकॉर्ड अभी भी सहवाग के नाम ही दर्ज है.

दिसंबर 2011 में वेस्टइंडीज के खिलाफ इंदौर में खेले गए वनडे मैच में सहवाग ने कप्तान के तौर पर अपनी काबिलियत का लोहा मनवाया. उन्होंने 149 गेंदों में 219 रनों की एक ऐसी आतिशी पारी खेली जिसे देख दुनिया भर के क्रिकेट प्रशंसक दंग रह गए थे. इस पारी की बदौलत भारत ने 418 रनों का पहाड़ जैसा स्कोर खड़ा किया, जो उस समय वनडे क्रिकेट में एक कप्तान द्वारा खेली गई सबसे बड़ी और ऐतिहासिक पारी बन गई थी.

11 साल से अधिक समय बीतने के बाद भी, वनडे क्रिकेट में कप्तान द्वारा सर्वाधिक रनों का यह विश्व रिकॉर्ड अभी भी सहवाग के नाम पर सुरक्षित है. रोहित शर्मा ने 208 रनों की पारी खेलकर इस रिकॉर्ड के करीब दस्तक दी थी, लेकिन करियर के इस पड़ाव पर उनके द्वारा इस रिकॉर्ड को तोड़ना अब काफी मुश्किल नजर आता है. कोई अन्य शीर्ष क्रम का कप्तान आज के दौर में इतनी बड़ी पारी खेलने की क्षमता शायद ही प्रदर्शित कर पाए.

सहवाग की बल्लेबाजी का सबसे डरावना पहलू यह था कि वे पहली ही गेंद से गेंदबाज पर दबाव बनाना पसंद करते थे. उन्होंने अपने वनडे करियर में कुल 124 बार पारी की पहली गेंद का सामना किया और उनमें से 20 बार उन्होंने गेंद को सीधे सीमा रेखा के बाहर भेजकर अपना इरादा साफ कर दिया था. यह किसी भी ओपनर के लिए एक सपने जैसा आंकड़ा है, जिसे आज के दौर के आक्रामक बल्लेबाज भी नहीं छू पाए हैं.

क्रिस गेल, ब्रेंडन मैकुलम और डेविड वॉर्नर जैसे दिग्गज सलामी बल्लेबाजों ने भी कोशिश की, लेकिन वे सहवाग के इस अनोखे रिकॉर्ड के आसपास भी नहीं पहुंच सके.आज के आधुनिक क्रिकेट में भी बल्लेबाज पहली गेंद पर जोखिम लेने से बचने की कोशिश करते हैं और पिच की मिजाज समझने में समय लेते हैं. इसीलिए क्रिकेट के जानकर मानते हैं कि पहली गेंद पर इतनी बार बाउंड्री लगाने का यह जादुई कीर्तिमान आने वाले कई दशकों तक सुरक्षित रहने वाला है.

सहवाग का क्रिकेटिंग करियर केवल रनों की संख्या के बारे में नहीं है, बल्कि यह उस निडरता और आत्मविश्वास के बारे में है जिसके साथ उन्होंने खेल खेला. उन्होंने साबित किया कि क्रिकेट में तकनीक के साथ-साथ आक्रामकता का तालमेल कैसे इतिहास रच सकता है. आज जब हम उनके इन पांच रिकॉर्ड्स पर नजर डालते हैं, तो यह स्पष्ट होता है कि सहवाग भारतीय क्रिकेट के एक ऐसे स्तंभ थे, जिनका स्थान भरना किसी के लिए भी संभव नहीं है. उनका अंदाज ही उनकी पहचान थी, और उनके रिकॉर्ड्स आज भी आने वाली पीढ़ियों के लिए एक प्रेरणा और एक बड़ी चुनौती बने हुए हैं.


