भारत के सॉलिसिटर जनरल के तौर पर तुषार मेहता ने पिछले आठ वर्षों में अपनी गहरी छाप छोड़ी है. न सिर्फ मोदी सरकार का देश की सबसे बड़ी अदालत में मजबूती से पक्ष रखते हैं वो, बल्कि अपनी सौम्यता, विनम्रता और तथ्यों को सुंदर ढंग से सहेज कर पेश करने के लिए भी जाने जाते हैं मेहता.
भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की दो पुस्तकों का रविवार की शाम विमोचन हुआ. दिल्ली के भारत मंडपम में ये कार्यक्रम हुआ, जिसकी अध्यक्षता की भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने और मुख्य अतिथि की भूमिका में रहे गृह और सहकार मंत्री अमित शाह. इस मौके पर न सिर्फ तुषार मेहता का अपना परिवार मौजूद था, बल्कि अमित शाह की पत्नी सोनलबेन और बहू रिशिता भी मौजूद थी. आखिर तुषार मेहता और अमित शाह के बीच परिवार जैसे संबंध जो हैं.
इसका संकेत कार्यक्रम के दौरान आगे भी मिला, जब अमित शाह ने खुद तुषार मेहता के साथ अपनी नजदीकी का जिक्र किया, उनकी मां की भी चर्चा की, जिनको अपनी किताब समर्पित की है तुषार मेहता ने और लिखा है कि आज जिस मंजिल पर वो हैं, उसमें उनकी मां के संघर्ष और त्याग की बड़ी भूमिका है.
स्वाभाविक तौर पर उनकी दोनों किताबों के विमोचन के लिए विश्व मातृत्व दिवस से बेहतर कोई दिन नहीं हो सकता था. इसलिए रविवार की शाम होने के बावजूद इस कार्यक्रम में न सिर्फ न्यायिक क्षेत्र की हस्तियां बड़े पैमाने पर शामिल हुईं, बल्कि समाज के दूसरे हिस्सों की भी. जहां तक न्यायिक क्षेत्र का सवाल था, सुप्रीम कोर्ट के जजों के अलावा कई राज्यों के चीफ जस्टिस, अन्य न्यायाधीश और तमाम वरिष्ठ अधिवक्ता मौजूद थे भारत मंडपम के हॉल नंबर दो में.
मंच पर न्यायपालिका और कार्यपालिका दोनों का ही संगम था, लेकिन अमित शाह ने पहले ही साफ कर दिया कि वो इस कार्यक्रम में इन दोनों से जुड़े मुद्दों के बारे में कुछ बोलेंगे नहीं, बल्कि उनकी चर्चा के लिए कोई और मंच होगा, यहां तो वे अपने दोस्त तुषार मेहता की किताबों के विमोचन और उस पर बात करने के लिए ही आए हैं.
तुषार मेहता की पुस्तक विमोचन के दौरान अमित शाह अपनी बात रखते हुए.
अमित शाह ने किया भी वही, ज्यादातर समय मेहता और उनकी किताब पर ही बोलते रहे. यही काम अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी ने भी किया. पूरी किताब पढ़कर आए थे वो और इसके तमाम पहलुओं को एक के बाद एक गिनाते रहे, कुछ उसी अंदाज में जैसे वो किसी महत्वपूर्ण केस की तैयारी करने के बाद उस पर कोर्ट में जिरह करने के लिए आए हों.
जहां तक मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत का सवाल था, उन्होंने एक तरफ तो तुषार मेहता की दोनों पुस्तकों को लिखने के लिए जमकर तारीफ की, तो दूसरी तरफ उलाहना भी दी, वो भी इस बात पर कि उन्होंने अपनी किताबों में भारतीय न्यायालयों के किस्सों का जिक्र क्यों नहीं किया है. भारत के मुख्य न्यायाधीश का सुझाव था कि तुषार मेहता को अपनी तीसरी किताब भारतीय न्यायपालिका से जुड़े रोचक किस्सों पर लिखना चाहिए. तीसरी किताब के लिए काम आ सकने वाले कई मजेदार किस्से भी सीजेआई सूर्यकांत ने सुना डाले.
दरअसल, मेहता ने जो दो पुस्तकें लिखी हैं, वो हैं- The Bench, the Bar and the Bizarre और The Lawful and the Awful. जैसा किताबों के टाइटल से ही साफ है, ये कानून की रूटीन किताबें नहीं हैं, बल्कि लीक से हटकर हैं, जिसमें बड़ी ही साफगोई से न्यायपालिका और विधि व्यवस्था को लेकर टिप्पणी की गई है. ये सारे किस्से विदेशी न्यायालयों के हैं, खास तौर पर अमेरिकी अदालतों के.
इनमें जहां कुछ जजों के खुद को देवता समझ लेने के भाव का जिक्र है, तो वकीलों, मुवक्किलों और यहां तक कि जजों की भी परेशानियों, लाचारियों और दुविधाओं का ब्यौरा भी है. कई सारे रोचक किस्से हैं इन किताबों में, जो जिला से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक के हैं. मेहता ने खुद हल्के- फुल्के अंदाज में साफ किया कि उन्होंने क्यों अपनी किताबों के केंद्र में भारतीय न्याय व्यवस्था और यहां की अदालतों को नहीं रखा. उनका कहना था कि उन्हें अभी काफी समय तक प्रैक्टिस करनी है, इसलिए वो भारतीय न्यायालयों के जिक्र से बचे.
दूसरा कारण ये भी था कि वो इन किस्सों को सामने रख कर ये बताना चाह रहे थे कि दुनिया के बाकी देशों की अदालतें और वहां हुए फैसले भारतीय न्याय व्यवस्था से बेहतर नहीं है, जैसा कई लोगों को भ्रम है. हालांकि भारत के मुख्य न्यायाधीश की सलाह पर गौर कर वो जल्दी ही तीसरी किताब ला सकते हैं, ऐसा खचाखच भरे हॉल में बैठे सभी लोगों को लगा.
सामान्य तौर पर कोई बड़ा वकील या जज जब किताब लिखता है, तो वो या तो उसकी आत्मकथा होती है, या फिर बड़ी, मशहूर कानूनी लड़ाइयों, संवैधानिक प्रश्नों और उनसे जुड़े मुद्दों की कहानी. लेकिन तुषार मेहता ने थोड़ा अलग रास्ता चुना अपनी किताबों के लिए. साफगोई के साथ वो उन मु्ददों और किस्सों को इनमें उठाते दिखे, जो आपको गुदगुदाते हैं, साथ में न्यायिक व्यवस्था पर सवाल भी उठाते हैं. इसलिए ये दोनों किताबें लीक से हटकर हैं.
दरअसल, मेहता की अपनी जिंदगी भी लीक से हटकर ही रही है. भारत के प्रथम सॉलिसिटर जनरल सीके दफ्तरी के बाद बतौर एसजी सबसे लंबे समय तक इस कुर्सी पर रहने वाले तुषार मेहता भारत के किसी बड़े कानूनी घराने से नहीं हैं. आम तौर पर ये मान्यता है कि न्यायिक क्षेत्र में उंचे मुकाम पर पहुंचने के लिए खानदानी वकील रहना फायदेमंद रहता है, लेकिन मेहता अपने घर के पहले वकील हैं.
तुषार मेहता की किताब The Lawful and the Awful का कवर पेज
उनकी आरंभिक शिक्षा भी मुंबई, दिल्ली जैसे बड़े महानगर में नहीं हुई, बल्कि गुजरात के जामनगर शहर में हुई, जो पहले रणजी और दलीपसिंह जैसे मशहूर क्रिकेटरों के शहर के तौर पर जाना जाता था, तो अब औद्योगिक- सामरिक इलाके के तौर पर. इसी जामनगर में तुषार मेहता का बचपन बीता.
11 सितंबर 1964 को जन्मे तुषार मेहता के सिर से बहुत जल्दी पिता का साया हट गया. मैट्रिक की परीक्षा शुरू होने के कुछ दिनों पहले ही उनके पिता की एक दुर्घटना में मौत हो गई, जो गुजरात सरकार में मामलतदार के तौर पर काम कर रहे थे. बावजूद इसके तुषार मेहता ने अपनी परीक्षा नहीं छोड़ी, अध्ययन जारी रखा, पिता के जाने के गम को सीने के अंदर दबाये रखते हुए.
मेहता ने बारहवीं की पढ़ाई विज्ञान विषय के साथ जामनगर शहर के ही डीसीसी हाई स्कूल से की. विज्ञान विषय लेकर इंजीनियर बनने का इरादा था मेहता का, सपना था नर्मदा नदी पर दशकों से लंबित पड़े सरदार सरोवर बांध को जल्दी से जल्दी पूरा करने का, जो जल संकट से जूझ रहे सौराष्ट्र के इलाके के लिए आशा की बड़ी उम्मीद के तौर पर देखा जा रहा था आजादी के बाद से ही.
लेकिन किस्मत किसी और दिशा में ले जाना चाह रही थी तुषार मेहता को. पिता की मौत के बाद आर्थिक संकट से जूझ रहा था उनका परिवार. इसका इशारा उन्होंने खुद अपनी किताब में किया है. मेहता ने लिखा है कि जब वो तेरह वर्ष के ही थे और पिता का देहांत हो गया, तो उनकी विधवा मां ने अपने गहने बेचकर उन्हें पढ़ाया- लिखाया, उनकी शिक्षा पूरी करवाई.
आर्थिक चुनौती के बीच बारहवीं की पढाई पूरी की तुषार मेहता ने. लेकिन तमाम तैयारियों और मेहनत के बाद जब किसी अच्छे इंजीनियरिंग कॉलेज में उनका दाखिला नहीं हो पाया, तो जामनगर शहर के ही डीकेवी आर्ट्स एंड साइंस कॉलेज से इन्होंने बीएससी की पढ़ाई करने की सोची.
1983 में बीएससी की पढ़ाई पूरी करने के बाद तुषार मेहता का गुजरात के सबसे बड़े शहर अहमदाबाद आना हुआ. यहां आकर इनका मन एक समय यूपीएससी की परीक्षा पास कर सिविल सर्विस में जाने का बना, आखिर पिता खुद गुजरात सरकार की प्रशासनिक सेवा में रहे थे. लेकिन जल्दी ही इन्होंने कानून को अपना प्रोफेशन बनाना तय किया.
अहमदाबाद के मशहूर विधि संस्थान, सर एलए (लल्लूभाई आत्माराम) शाह लॉ कॉलेज में तुषार मेहता ने दाखिला लिया और इसी के होस्टल में रहे भी. पश्चिम भारत के मशहूर लॉ कॉलेजों में से एक था ये कॉलेज. बीस जून 1927 को गुजरात लॉ सोसायटी की तरफ से ये कॉलेज स्थापित किया गया था और बंबई यूनिवर्सिटी से मान्यता हासिल करने वाला चौथा सबसे पुराना लॉ कॉलेज था ये. गुजरात यूनिवर्सिटी की स्थापना के बाद 1950 में उसके अंदर आ गया ये कॉलेज. इस कॉलेज ने जस्टिस जेसी शाह और जस्टिस एए अहमदी के तौर पर भारत को दो मुख्य न्यायाधीश दिये, इसके अलावा ढेर सारे सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट जज इस कॉलेज से पढ़कर निकले छात्र बने.
विधि क्षेत्र मे जबरदस्त उपलब्धियों वाले इस कॉलेज में दाखिला लेने के बाद तुषार मेहता ने दिल लगाकर एलएलबी की पढ़ाई की. परिणाम ये रहा कि इन्हें एक नहीं, पांच- पांच गोल्ड मेडल हासिल हुए एलएलबी के दौरान. इनमें से तीन मेडल गुजरात यूनिवर्सिटी की तरफ से, तो दो गुजरात लॉ सोसायटी की तरफ से मिले. दो मेडल तो जस्टिस एनजी शैलत और नानी पालखीवाला के नाम पर ही थे.
तुषार मेहता की किताब The Bench, the Bar and the Bizarre का कवर पेज
एलएलबी की पढाई शानदार ढंग से पूरी करने के बाद तुषार मेहता ने 9 मार्च 1987 को गुजरात बार काउंसिल में बतौर वकील अपना रजिस्ट्रेशन कराया, सनद हासिल की. इसके बाद वकील के तौर पर इन्होंने गुजरात हाईकोर्ट में प्रैक्टिस शुरू की. शुरुआती वर्षों में राज्य के मशहूर वकील कृष्णकांत वखारिया के साथ जूनियर के तौर पर काम किया. कुछ समय बाद अपनी स्वतंत्र प्रैक्टिस शुरू कर दी तुषार मेहता ने.
वकील के तौर पर काम करते हुए अगले डेढ़ दशक के अंदर तुषार मेहता ने सहकार से लेकर नगर निगम और पंचायत से लेकर बिजली विवाद तक, इनसे जुड़े मामलों में महारत हासिल कर ली. इस वजह से कोऑपरेटिव सेक्टर से जुड़े लोगों से उनका परिचय घना होता गया. इन्हीं में एक थे अमित शाह, जो 1997 में पहली बार अहमदाबाद शहर के सरखेज इलाके से बीजेपी के टिकट पर विधायक बने थे, उससे पहले 1995-96 में गुजरात स्टेट फाइनेंस कॉरपोरेशन के चेयरमैन रहे और वर्ष 2000 में देश के सबसे बड़े जिला सहकारी बैंक, अहमदाबाद डिस्ट्रिक्ट कोऑपरेटिव बैंक के अध्यक्ष बने.
अमित शाह ने जब अहमदाबाद जिला सहकारी बैंक के अध्यक्ष की कुर्सी संभाली, उस वक्त गुजरात का सहकार क्षेत्र मोटे तौर पर कांग्रेस के ही कब्जे में था, दूध की सहकारी मंडलियों से लेकर सहकारी बैंक तक. सहकार का क्षेत्र आम जनता के साथ जुड़ने और उनकी समस्याओं को सुलझाने का महत्वपूर्ण साधन हो सकता है, ये बात गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी और 2002 में गृह राज्य मंत्री बन गये अमित शाह दोनों भली- भांति समझते थे. इसलिए बीजेपी ने इस क्षेत्र में तेजी से अपनी पकड़ मजबूत की और एक के बाद एक तमाम सहकारी संस्थानों से कांग्रेस को बेदखल कर बीजेपी की वहां पकड़ बनाई. इस दौरान कई सारे अदालती मामले भी चले, जिसमें वकील के तौर पर तुषार मेहता ने अमित शाह का साथ दिया और उनके करीब आते गये.
बतौर वकील अपनी मजबूत साख बना चुके तुषार मेहता 14 अगस्त 2008 को गुजरात हाईकोर्ट के सीनियर एडवोकेट बने और उसी साल 16 दिसंबर को गुजरात राज्य के एडिशनल एडवोकेट जनरल भी. जब वो इस पद पर आसीन हुए, उस समय गुजरात के कानून मंत्री अमित शाह ही थे, जो पहले से ही मेहता के कायल थे, दोस्त थे.
तुषार मेहता की दो पुस्तकों का विमोचन करते हुए अमित शाह और सीजेआई सूर्यकांत
अपनी इस नई भूमिका में तुषार मेहता ने राज्य सरकार के सामने खड़ी तमाम कानूनी चुनौतियों का मजबूती से मुकाबला किया. ये वो दौर था, जब एक तरफ गुजरात दंगों के दर्जनों मामले लोअर कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक चल रहे थे, तो दूसरी तरफ पुलिस मुठभेड़ों में मारे गये कुछ आतंकियों- अपराधियों के मामले भी चर्चा बटोर रहे थे, एसआईटी से लेकर न्यायिक जांच तक चल रही थी उनकी. इन्हीं मामलों को लेकर तब विपक्ष पूरी ताकत से हमलावर था. गुजरात में कांग्रेस मोदी सरकार पर हमले कर रही थी, तो केंद्र में कांग्रेस की अगुआई वाली यूपीए सरकार मोदी और शाह को घेरने का कोई मौका नहीं छोड़ रही थी.
इन कानूनी चुनौतियों का सामना करने में मोदी और शाह की भरपूर मदद की तुषार मेहता ने. तब तक गुजरात हाईकोर्ट में वकालत करते हुए दो दशक से भी अधिक का समय हो चुका था तुषार मेहता को. लेकिन उन्हें न तो निचली अदालत में खड़ा होने में कोई परेशानी थी, न ही सुप्रीम कोर्ट में पेश होने के लिए बार- बार दिल्ली आने में.
न सिर्फ खुद अदालतों में हाजिरी देना, मुकदमों में जिरह करना, बल्कि राम जेठमलानी जैसे कानून विशेषज्ञों को भी बड़े ही आराम से इन मामलों का एक- एक पहलू सुलझाना, ये सारा काम सहज ढंग से करते थे तुषार मेहता. अपने कैरियर के शुरुआती दौर से ही हर केस का पूरी गहराई से अध्ययन करना, उसके हर पहलू में जाना तुषार मेहता की आदत में शुमार था, इसलिए किसी भी केस की जानकारी उनकी जुबान पर रहती थी.
तुषार मेहता की दो किताबों के विमोचन में मौजूद लोग
इसी बीच वो समय भी आया, जब अमित शाह के खिलाफ तत्कालीन यूपीए सरकार के दबाव में सीबीआई ने सोहराबुद्दीन मुठभेड़ मामले में चार्जशीट दाखिल कर दी और मजबूरन उन्हें मोदी मंत्रिमंडल से इस्तीफा देकर जुलाई 2010 में सीबीआई के सामने सरेंडर करना पड़ा. शाह की इस कानूनी लड़ाई में तुषार मेहता पूरी ताकत से उनके साथ खड़े रहे. इस वजह से कुछ समय बाद ही न सिर्फ गुजरात हाईकोर्ट से अमित शाह को जमानत हासिल हुई, बल्कि अगले कुछ वर्षों में एक के बाद एक तमाम मुठभेड़ मामलों को सफल ढंग से लड़कर न सिर्फ शाह बल्कि गुजरात के उन पुलिसकर्मियो को भी छुड़वाने, मामले से बरी करवाने में कामयाब रहे मेहता, जो लंबे समय से जेल में थे.
यही नहीं, 2002 के गुजरात दंगों से जुड़े सभी मामलो को भी गुजरात सरकार की तरफ से सफलतापूर्वक लड़े मेहता, और गोधरा कांड में ज्यादातर आरोपियों को कड़ी सजा दिलाने में कामयाब रहे. ध्यान रहे कि फौजदारी के मामले तुषार मेहता की पहली पसंद कभी नहीं थे, लेकिन उन्होंने जरूरत के हिसाब से इनमें भी महारत हासिल कर ली.
यही वजह रही कि न सिर्फ अमित शाह, बल्कि मोदी के भी लगातार करीब आते गये तुषार मेहता. स्वाभाविक था कि जब मई 2014 में नरेंद्र मोदी की अगुआई में बीजेपी की पूर्ण बहुमत वाली पहली सरकार केंद्र में बनी, उसके महीने भर के अंदर भारत के एडिशनल सॉलिसिटर जनरल नियुक्त हुए तुषार मेहता, सात जून 2014 को इस संबंध में अधिसूचना जारी हुई. इस तरह लगातार छह साल तक गुजरात के एडिशनल एडवोकेट जनरल रहने वाले मेहता भारत के एडिशनल सॉलिसिटर जनरल बन गये.
इस भूमिका में चार साल तक सफलतापूर्वक काम करने के बाद दस अक्टूबर 2018 को सॉलिसिटर जनरल ऑफ इंडिया बने तुषार मेहता. तब से वो लगातार इस पद पर बने हुए हैं और जमकर शोहरत बटोर रहे हैं, अपनी धारदार दलीलों और कानूनी ज्ञान के कारण. भारत सरकार की तरफ से हर बड़े और महत्वपूर्ण मामले में सुप्रीम कोर्ट में हाजिर होते हैं मेहता, और ज्यादातर मामलों में कामयाबी हासिल करते हैं.
आम तौर पर सुर्खियों से दूर रहने वाले मेहता पर 2019 में ज्यादातर लोगों को निगाह गई, जब मोदी सरकार ने अगस्त के महीने में जम्मू- कश्मीर से आर्टिकल 370 को खत्म करने का फैसला किया. किसी को इसकी हवा नहीं थी, और तुषार मेहता ने मोदी और शाह के इशारे पर इससे जुड़ी कानूनी तैयारी कर रहे थे चुपचाप, बिल बनाने से लेकर सुप्रीम कोर्ट में इसे चुनौती हासिल होने पर सरकार के इस कदम का बचाव करने के लिए भी. जिस दिन ये बिल राज्यसभा में पेश किया अमित शाह ने, उससे पहली वाली पूरी रात संसद भवन के ही एक कमरे में बैठकर काम करते रहे थे मेहता. बहुत बाद में लोगों को मेहता की महत्वपूर्ण भूमिका का पता चला.
लेकिन जब सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई का वेबकास्ट होने लगा, तुषार मेहता की धारदार दलीलें अक्सर वायरल होने लगीं, आम आदमी से लेकर कानूनी मामलों के जानकार भी उनके फैन बनते चले गये. मेहता हर बार अपना पक्ष तार्किक ढंग से, पूरी मजबूती के साथ रखते हुए नजर आए. न सिर्फ न्यायिक क्षेत्र में, बल्कि सामान्य लोगों के बीच भी इसकी नोटिस ली गई और इसी से उनकी साख भी बनी.
हालांकि जब मेहता दिल्ली आए थे 2014 में, एडिशनल सॉलिसिटर जनरल के तौर पर, तो दिल्ली की दुनिया उनके लिए बहुत जानी- पहचानी नहीं थी, यहां के लीगल सर्किल में भी उन्हें कम ही लोग जानते थे. लेकिन पिछले बारह वर्षों में उन्होंने अपना लोहा मनवा लिया है, जज भी उनकी बात ध्यान से सुनते हैं, वकील भी उनके कायल हैं. जो वकील कभी पीठ पीछे उन पर टिप्पणी करते थे या फिर जो जज कभी अदालत में उनको झिड़कते थे, उनके भी विचार बदल गये हैं, उन्होंने मान लिया है कि तुषार मेहता में कुछ खास है.
और जहां तक तुषार मेहता का सवाल है, उनके मिजाज में कोई बदलाव नहीं आया है, जामनगर के रंजीतनगर इलाके के गुजरात हाउसिंग बोर्ड के साधारण से मकान से निकल कर वाया अहमदाबाद दिल्ली के लुटियंस जोन के अकबर रोड के विशालकाय बंगला नंबर दस में आने के बावजूद. उनको अपनी रसूख और शोहरत का कोई घमंड नहीं.
आठ साल से वो देश के सॉलिसिटर जनरल हैं, और ये पारी गुजरात से ही आने वाले सीके दफ्तरी के बाद की सबसे बड़ी पारी है. दफ्तरी 1950 से लेकर 1963 तक देश के पहले सॉलिसिटर जनरल रहे थे और 1963 से 1968 तक एटॉर्नी जनरल ऑफ इंडिया. मोदी और शाह दोनों के करीबी तुषार मेहता दफ्तरी का ये रिकॉर्ड तोड़ जाएं, तो कोई आश्चर्य नहीं.
लेकिन तुषार मेहता को अपनी इन शानदार उपलब्धियों को लेकर कोई अहंकार नहीं. आज भी उनमें सहजता है, शेरो- शायरी का शौक बरकरार है, वरिष्ठों के प्रति आदर का भाव और तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों और चुनौतियों से पार पाने के लिए जरूरी धैर्य और सहनशीलता है. यही वजह है कि वो न्यायिक जगत में इतना बड़ा मुकाम हासिल कर पाये हैं, जिसकी झलक रविवार की शाम मिली, सबने इसकी नोटिस ली.


