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Fish Disease Diagnosis NSPAD App: मछली पालन में नुकसान से बचना है तो डिजिटल खेती अपनाएं. पूसा विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों की सलाह है कि मछलियों में घाव या दाग दिखते ही खुद डॉक्टर न बनें. बल्कि NSPDT ऐप का सहारा लें. ऐप पर फोटो अपलोड करते समय तालाब का सही साइज और पानी के रंग की जानकारी जरूर दें. ताकि वैज्ञानिक सटीक दवा बता सकें. याद रखें, सही समय पर सही सलाह ही आपके उत्पादन को दोगुना कर सकती है. बेवजह की महंगी दवाओं का खर्च बचा सकती है.
समस्तीपुर: बिहार समेत देश के कई हिस्सों में मछली पालन तेजी से किसानों की आमदनी बढ़ाने वाला व्यवसाय बनता जा रहा है. बड़ी उम्मीद और मेहनत के साथ किसान तालाबों में मछली पालन करते हैं, लेकिन कई बार अचानक मछलियों में बीमारी फैलने से उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ता है. सबसे बड़ी परेशानी यह होती है कि किसानों को बीमारी की सही पहचान और इलाज की जानकारी समय पर नहीं मिल पाती. ऐसे में कई लोग दवा दुकानदारों के भरोसे इलाज करते हैं, जिससे नुकसान और बढ़ जाता है. इसी समस्या को दूर करने के लिए समस्तीपुर स्थित डॉ.राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय पूसा के वैज्ञानिकों की टीम ने एनएसपीडीटी ऐप पर विशेष नजर रखती है. इस ऐप के जरिए मछली पालक अब अपने मोबाइल से बीमारी की फोटो अपलोड कर सीधे वैज्ञानिकों से सलाह प्राप्त कर सकेंगे.
फोटो अपलोड करते ही वैज्ञानिकों तक पहुंचेगी जानकारी
विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने बताया कि यह ऐप मछली पालकों के लिए काफी उपयोगी साबित होगा. तालाब में अगर किसी मछली के शरीर पर दाग, फफूंदी, घाव या किसी अन्य तरह की बीमारी दिखाई देती है तो किसान उसकी तस्वीर खींचकर ऐप पर अपलोड कर सकते हैं. फोटो अपलोड होते ही जानकारी विशेषज्ञों की टीम तक पहुंच जाएगी. इसके बाद वैज्ञानिक बीमारी की पहचान कर उसके इलाज और बचाव के उपाय बताएंगे. इससे किसानों को सही समय पर सही दवा और उचित सलाह मिल सकेगी. वैज्ञानिकों का मानना है कि समय पर उपचार मिलने से मछलियों की मौत कम होगी और उत्पादन में भी बढ़ोतरी होगी. साथ ही गलत दवा के उपयोग से होने वाले नुकसान से भी बचाव हो सकेगा.
ऐप डाउनलोड करने की प्रक्रिया भी आसान
मत्स्य पालन विभाग के वैज्ञानिक डॉ. राजीव कुमार ब्रह्मचारी ने बताया कि किसान भाई सबसे पहले अपने मोबाइल के प्ले स्टोर में जाकर NSPAD लिखकर ऐप डाउनलोड करें. इसके बाद मोबाइल नंबर के जरिए रजिस्ट्रेशन करना होगा. ओटीपी सत्यापन के बाद किसान अपनी पसंद की भाषा चुन सकते हैं. ऐप में मछली, झींगा और अन्य जलीय जीवों के अलग-अलग विकल्प दिए गए हैं. किसान अपनी जरूरत के अनुसार विकल्प चुनकर समस्या से जुड़ी फोटो या वीडियो अपलोड कर सकते हैं. इसके साथ तालाब का आकार, प्रभावित मछलियों की संख्या और बीमारी से जुड़ी अन्य जानकारी भी दर्ज करनी होगी. जानकारी अपलोड होने के बाद वैज्ञानिकों की टीम मामले का अध्ययन करेगी और किसान से संपर्क कर उचित उपचार बताएगी.
जरूरत पड़ने पर गांव तक पहुंचेगी वैज्ञानिकों की टीम
डॉ. राजीव कुमार ब्रह्मचारी ने कहा कि कई बार किसान बीमारी की सही जानकारी नहीं मिलने के कारण गलत दवा का उपयोग कर लेते हैं. इससे मछलियों को नुकसान होने के साथ-साथ बाद में उसका सेवन करने वाले लोगों के स्वास्थ्य पर भी असर पड़ सकता है. उन्होंने कहा कि इस ऐप का उद्देश्य किसानों को वैज्ञानिक और सुरक्षित सलाह उपलब्ध कराना है.दरभंगा, मधुबनी, समस्तीपुर, वैशाली समेत आसपास के जिलों में अगर किसी तालाब में बीमारी की गंभीर स्थिति सामने आती है तो विश्वविद्यालय की टीम मौके पर पहुंचकर जांच भी करती है. वैज्ञानिक खुद तालाब का निरीक्षण कर बीमारी की वजह पता लगाते हैं और फिर उपचार की सही सलाह देते हैं. विश्वविद्यालय की यह पहल मछली पालकों के लिए राहत भरी साबित हो रही है और इससे किसानों को कम नुकसान के साथ बेहतर उत्पादन मिलने की उम्मीद बढ़ गई है.
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मैंने अपने 12 वर्षों के करियर में इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट और डिजिटल मीडिया में काम किया है। मेरा सफर स्टार न्यूज से शुरू हुआ और दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर डिजिटल और लोकल 18 तक पहुंचा। रिपोर्टिंग से ले…और पढ़ें


