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West Bengal Election: पश्चिम बंगाल चुनाव से पहले न्यूज18 इंडिया के डिबेट शो ‘गूंज’ में चुनाव आयोग की भूमिका को लेकर तीखी बहस देखने को मिली. राजनीतिक विश्लेषक बादल देवनाथ ने खुद को टीएमसी समर्थक मानने से इनकार कर दिया. वहीं, पूर्व डीजीपी विक्रम सिंह ने टीएमसी के धमकी भरे लहजे पर कड़ी आपत्ति जताते हुए इसे लोकतंत्र के लिए खतरनाक बताया है.
गूंज डिबेट शो के दौरान बादल देवनाथ ने खुद को टीएमसी समर्थक कहने पर आपत्ति जाहिर कर दी.
West Bengal Election: पश्चिम बंगाल में चुनावी सरगर्मी के बीच चुनाव आयोग की भूमिका को लेकर सियासी बयानबाजी तेज हो गई है. न्यूज18 इंडिया के डिबेट शो ‘गूंज’ के दौरान राजनीतिक विश्लेषक बादल देवनाथ ने खुद को तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) का समर्थक मानने से साफ इनकार कर दिया. वहीं पूर्व डीजीपी विक्रम सिंह ने आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ इस्तेमाल हो रही भाषा पर नाराजगी जाहिर की है.
डिबेट की शुरूआत बादल देवनाथ के रुख को लेकर हुई. जब उन्हें टीएमसी समर्थक बताया गया, तो उन्होंने तुरंत आपत्ति जताते हुए कहा कि उन्हें टीएमसी समर्थक के रूप में पेश न किया जाए. हालांकि, इसी दौरान अन्य पैनलिस्टों ने याद दिलाया कि पहले वे खुद ममता बनर्जी के समर्थन की बात कर चुके हैं. इस पर बहस और तीखी हो गई और उनके रुख में आए बदलाव को लेकर सवाल खड़े होने लगे. इस बीच चर्चा का मुद्दा चुनाव आयोग की निष्पक्षता और सुरक्षा व्यवस्था रहा.
बादल देवनाथ ने आरोप लगाया कि बंगाल में भारी संख्या में केंद्रीय बलों की तैनाती और प्रशासनिक अधिकारियों के तबादले के पीछे दूसरी मंशा हो सकती है. उन्होंने कहा कि राज्य में पहले से व्यवस्था चल रही थी, ऐसे में बड़े पैमाने पर बदलाव की जरूरत क्यों पड़ी.
पूर्व डीजीपी ने दिया खरा-खरा जवाब
- इसके जवाब में पूर्व डीजीपी विक्रम सिंह ने बेहद सख्त लहजे में कहा कि चुनाव के दौरान सुरक्षा बलों की तैनाती पूरी तरह जायज है. उन्होंने साफ कहा कि जो कानून का पालन करता है, उसके लिए सुरक्षा बलों की मौजूदगी खुशी की बात है, लेकिन जो कानून तोड़ता है, उसे वर्दी देखकर डर लगता है.
- विक्रम सिंह ने डिबेट के दौरान सबसे गंभीर चिंता उस भाषा को लेकर जताई, जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ बयान दिए जा रहे थे. उन्होंने कहा कि किसी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति को इस तरह धमकी देना बेहद खतरनाक है और यह लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत नहीं है.
- उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि अगर यही भाषा किसी निचले स्तर के पुलिस अधिकारी के खिलाफ इस्तेमाल की जाती, तो तुरंत सख्त कार्रवाई होती. डिबेट में यह मुद्दा भी उठा कि चुनाव आयोग पर लगातार सवाल क्यों उठाए जा रहे हैं.
- इस पर एक अन्य पैनलिस्ट ने तर्क दिया कि जब भी किसी राज्य में सत्ताधारी पार्टी को चुनौती मिलती है, तब आयोग और केंद्रीय एजेंसियों पर आरोप लगने लगते हैं. उन्होंने 2005 के बिहार चुनाव और 2011 के बंगाल चुनाव का उदाहरण देते हुए कहा कि भारी सुरक्षा बलों की तैनाती नई बात नहीं है.
- वहीं, टीएमसी और बीजेपी के बीच आरोप-प्रत्यारोप भी जारी रहे. एक पक्ष ने आरोप लगाया कि बीजेपी चुनाव आयोग के जरिए माहौल को प्रभावित करना चाहती है, जबकि दूसरे पक्ष ने कहा कि असली लड़ाई राजनीतिक दलों के बीच है, आयोग को बीच में घसीटना गलत है.
अभी और सख्त कदम उठाए जाने चाहिए
डिबेट के दौरान बंगाल में हिंसा का मुद्दा भी जोर-शोर से उठा. 2021 के चुनाव के बाद हिंसा की घटनाएं सामने आई थीं, जिसमें विरोधी दलों के समर्थकों को नुकसान उठाना पड़ा. डिबेट में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों का भी जिक्र हुआ. इस पर कहा गया कि अदालत ने अभूतपूर्व तरीके से चुनावी प्रक्रिया पर नजर रखी और जरूरत पड़ने पर हस्तक्षेप भी किया. हालांकि, कुछ लोगों का मानना था कि अभी और सख्त कदम उठाए जा सकते थे. डिबेट अंत में चर्चा इस सवाल पर आकर ठहर गई कि क्या बंगाल की जनता बिना डर के मतदान करने निकलेगी. इस पर अधिकांश पैनलिस्टों ने विश्वास जताया कि भारी सुरक्षा व्यवस्था के बीच लोग बड़ी संख्या में वोट डालने आएंगे, जैसा कि पिछले चुनावों में भी देखने को मिला था.


