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Varanasi Tulsi Ghat: काशी में घाटों की लंबी श्रृंखला है.अस्सी से आदिकेशव के बीच कुल 84 घाट है. इन घाटों का अपना धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व है. इन्ही घाटों में एक है ‘तुलसी घाट’ जिसका गोस्वामी तुलसीदास ने सीधा कनेक्शन है.काशी में गंगा के किनारे इसी स्थान पर गोस्वामी तुलसीदास ने लंबा समय बिताया था.
16वीं शताब्दी में गोस्वामी तुलसीदास ने इसी घाट पर रहकर पवित्र ग्रंथ रामचरितमानस की रचना की थी. जानकारी के अनुसार उन्होंने इस घाट पर रामचरितमानस के चार अध्याय लिखे थे. इसके अलावा अपने जीवन के अंतिम समय में भी उन्होंने यहां कई काव्यों की रचना की. उनके नाम पर ही इस घाट को तुलसी घाट कहा जाने लगा. हालांकि पहले यह स्थान सूर्य तीर्थ का एक हिस्सा हुआ करता था.

उनके ओर से लिखी गई रामचरितमानस की हस्तलिखित पांडुलिपियां आज भी यहां सुरक्षित हैं. ये पांडुलिपियां अवधि भाषा में लिखी गई हैं. हालांकि अब इन्हें बेहद सुरक्षित और संरक्षित रखा गया है. इन्हें देखने की अनुमति आम लोगों को नहीं दी जाती है, क्योंकि कुछ साल पहले ये पांडुलिपियां चोरी हो गई थीं, लेकिन बाद में इन्हें वापस रिकवर कर लिया गया था.

इस जगह पर गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस के 7 कांडों में से 4 कांडों की रचना की थी. इसे लिखने में उन्हें लगभग 2 साल 7 महीने का समय लगा था. वैसे तो वाल्मीकि जी ने रामायण की रचना की थी, लेकिन गोस्वामी तुलसीदास ने उसे जन-जन की भाषा में ढालकर आम लोगों के लिए अधिक सरल और सहज बना दिया. इसके अलावा हनुमान चालीसा और बजरंग बाण की रचना भी उन्होंने काशी में ही की थी. हालांकि यह बात आज भी कम ही लोग जानते हैं.
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पद्मश्री राजेश्वर आचार्य ने बताया कि किष्किंधा कांड के बाद के अध्यायों की रचना गोस्वामी तुलसीदास ने काशी में ही की थी. वे गंगा के तट पर बैठकर इसकी रचना करते थे और जब थक जाते तो वहीं विश्राम भी करते थे. आज भी उनकी खड़ाऊं यहां सुरक्षित रखी गई है. ऐसी मान्यता है कि गंगा किनारे उन्हें यहां हनुमान जी के दर्शन भी हुए थे.

गोस्वामी तुलसीदास ने काशी में कई स्थानों पर हनुमान जी की प्रतिमाएं भी स्थापित की थीं. संकट मोचन हनुमान मंदिर की स्थापना का श्रेय भी उन्हें ही दिया जाता है. मान्यता है कि इस प्रतिमा को उन्होंने गोबर से बनाया था. कथाओं के अनुसार, जिस स्थान पर उन्होंने संकट मोचन हनुमान जी की स्थापना की, वहां उन्हें हनुमान जी के साक्षात दर्शन भी हुए थे.

तुलसी घाट पर ही गोस्वामी तुलसीदास जी ने अपना शरीर त्यागा था. हालांकि पौराणिक काल में तुलसी घाट लोलार्क तीर्थ यानी सूर्य उपासना के केंद्र के रूप में जाना जाता था. उस समय संतान प्राप्ति की कामना से श्रद्धालु लोलार्क कुंड में स्नान करने के बाद यहां गंगा में भी स्नान करने आते थे. साल 1941 में बलदेवदास बिड़ला ने इस घाट का पक्का निर्माण कराया था. इससे पहले यह एक कच्चा घाट हुआ करता था.

काशी में इस स्थान पर रामचरितमानस की रचना के साथ ही गोस्वामी तुलसीदास ने कृष्ण लीला की शुरुआत भी कराई थी. पूरे देश में तुलसी घाट की कृष्ण लीला काफी प्रसिद्ध है. इस लीला के “नाग नथैया” के मंचन को देखने के लिए आज भी काशी नरेश यहां आते हैं. नाग नथैया की यह लीला काशी के प्रसिद्ध लक्खा मेलों में शामिल मानी जाती है.

महज 5 मिनट की इस लीला को देखने के लिए यहां लाखों श्रद्धालु आते हैं. ऐसी मान्यता है कि इस दौरान स्वयं भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन होते हैं. इसके साथ ही गंगा कुछ समय के लिए यमुना का रूप धारण कर लेती है. यह क्षण बेहद अद्भुत और दिव्य माना जाता है. विदेशी मेहमान भी इसे देखने के लिए सात समुंदर पार से यहां आते हैं.


