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केरल की नवनिर्वाचित यूडीएफ (कांग्रेस गठबंधन) सरकार के शपथ ग्रहण में ‘वंदे मातरम’ का पूरा संस्करण गाए जाने पर सियासी पारा चरम पर है. पूर्व मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन के दामाद और सीपीएम के कद्दावर नेता पी ए मोहम्मद रियास ने कांग्रेस नीत सरकार की नीयत पर सीधा हमला बोला है, जिसे विपक्ष सरकार को ‘हद में रहने’ की खुली चेतावनी के तौर पर देख रहा है.
कौन हैं पूर्व मंत्री मुहम्मद रियाज? जिन्होंने पूरे वंदे मातरम को थोपने के खिलाफ खोला मोर्चा, नई कांग्रेस सरकार की नीयत को सीधे कटघरे में खड़ा किया.
केरल में सत्ता परिवर्तन के साथ ही राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम’ को लेकर एक बड़ा वैचारिक और राजनीतिक युद्ध छिड़ गया है. हाल ही में हुए मुख्यमंत्री और कैबिनेट के शपथ ग्रहण समारोह में वंदे मातरम का पूरा संस्करण (फुल वर्जन) गाया गया. इस बात से नाराज सीपीएम (मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी) के फायरब्रांड नेता और पूर्व लोक निर्माण मंत्री पी ए मोहम्मद रियास ने सोशल मीडिया पर मोर्चा खोल दिया है. उन्होंने कांग्रेस समर्थित यूडीएफ सरकार के इस कदम को देश की धर्मनिरपेक्षता और संवैधानिक आजादी पर हमला करार दिया है. राजनीतिक गलियारों में रियास के इस तीखे बयान को नई कांग्रेस सरकार को सीधे ‘हद में रहने’ की खुली चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है.
जानिए कौन हैं बवाल खड़ा करने वाले मोहम्मद रियास
पी ए मोहम्मद रियास केरल की राजनीति का एक बेहद रसूखदार और चर्चित चेहरा हैं. वह सीपीएम के राज्य सचिवालय के सदस्य होने के साथ-साथ केरल के पूर्व मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन के दामाद भी हैं. छात्र राजनीति (SFI) से अपना करियर शुरू करने वाले रियास वामपंथी युवा संगठन डीवाईएफआई (DYFI) के राष्ट्रीय अध्यक्ष रह चुके हैं. वह बेपोर विधानसभा सीट से विधायक हैं और पिछली एलडीएफ सरकार में बेहद ताकतवर लोक निर्माण (PWD) और पर्यटन मंत्री की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं. अपनी आक्रामक और बेबाक शैली के लिए जाने जाने वाले रियास को कम्युनिस्ट पार्टी में अगली पीढ़ी का बड़ा नेता माना जाता है.
पूरे वंदे मातरम पर आखिरकार क्यों भड़के सीपीएम नेता?
अंग्रेजी समाचार वेबसाइट ‘ओनमनोरमा’ (onmanorama.com) में छपी खबर के मुताबिक, मोहम्मद रियास का गुस्सा इस बात पर फूटा कि शपथ ग्रहण समारोह की शुरुआत और समापन, दोनों ही वक्त राष्ट्रगान के साथ पूरे वंदे मातरम को गाया गया. रियास का तर्क है कि आधिकारिक और कानूनी रूप से वंदे मातरम के केवल पहले दो छंद ही सर्वमान्य हैं और गाए जाते हैं. उन्होंने इतिहास का हवाला देते हुए लिखा कि इस गीत के बाद के हिस्सों को लेकर हमेशा से देश में विवाद और चिंताएं रही हैं. ऐसे में सरकार द्वारा इसे पूरा गवाना उसकी खास राजनीतिक मंशा को दर्शाता है.
सुप्रीम कोर्ट का हवाला देकर कांग्रेस सरकार को घेरा
पूर्व मंत्री रियास ने अपने हमले को कानूनी जामा पहनाते हुए देश की सर्वोच्च अदालत की टिप्पणियों का भी जिक्र किया. उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट और केंद्र सरकार के दिशा-निर्देश यह साफ करते हैं कि राज्यों के लिए वंदे मातरम का गायन महज एक सलाह (एडवाइजरी) है, कोई अनिवार्य नियम नहीं. इसे न गाने पर किसी दंड का प्रावधान नहीं है. रियास ने सवाल उठाया कि जब नई सरकार ने राजभवन की कई प्रशासनिक प्रक्रियाओं को बदलने में जरा भी देर नहीं लगाई, तो फिर इस संवेदनशील मुद्दे पर जानबूझकर आंखें क्यों मूंद लीं?
कांग्रेस गठबंधन को ‘हद में रहने’ की नसीहत या धमकी?
रियास के इस रुख के बाद राज्य की राजनीति में यह चर्चा तेज है कि वामपंथी विपक्ष पहली ही परीक्षा में नई कांग्रेस सरकार को दबाव में लाने की कोशिश कर रहा है. रियास ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि सरकार को बहुलतावादी संस्कृति और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के अनुकूल ही फैसले लेने चाहिए. उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि अगर नई सरकार समावेशी राजनीति करेगी और लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत रखेगी, तभी उसे विपक्ष का सहयोग मिलेगा, वरना वामपंथियों का विरोध झेलना होगा. उनके इस बयान को राजनीतिक विश्लेषक कांग्रेस को हद में रहने की नसीहत मान रहे हैं.
पड़ोसी राज्य तमिलनाडु से भी जुड़े इस विवाद के तार
यह दिलचस्प है कि राष्ट्रगीत को लेकर जारी यह विवाद सिर्फ केरल तक सीमित नहीं है. अभी कुछ समय पहले तमिलनाडु में भी शपथ ग्रहण के दौरान वंदे मातरम गाए जाने पर सीपीआई (भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी) के दिग्गज नेताओं ने तीखा विरोध दर्ज कराया था. वहां वामपंथी नेताओं का तर्क था कि राष्ट्रगीत से पहले राज्य के आधिकारिक गीत ‘तमिल थाई वज्शथु’ को प्राथमिकता दी जानी चाहिए थी. अब केरल में भी ठीक वैसा ही विवाद खड़ा कर लेफ्ट पार्टियों ने साफ कर दिया है कि वे नई सरकार के हर कदम पर पैनी नजर रखने वाली हैं.


