कोलकाता. पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव का नतीजा सत्ता परिवर्तन के रूप में सामने आने के महज 48 घंटे बाद वरिष्ठ भाजपा नेता सुवेंदु अधिकारी के करीबी सहयोगी (पीए) चंद्रनाथ रथ की हत्या ने राज्य को ऐसी स्थिति में धकेल दिया है जहां चुनाव बाद की हिंसा के लोकतांत्रिक परिवर्तन पर भारी पड़ने का खतरा पैदा हो गया है. भाजपा की ऐतिहासिक जीत के बाद छिटपुट झड़पों के रूप में जो शुरू हुआ था, वह अब तेजी से एक बड़े टकराव का रूप ले चुका है, जिसमें भय, प्रतिशोध का विमर्श और राजनीतिक रूप से संवेदनशील जिलों में क्षेत्रीय वर्चस्व की लड़ाई शामिल है.
बंगाल में अपनी पहली सरकार बनाने की तैयारी कर रही भाजपा के लिए यह हत्या एक चुनौती होने के साथ-साथ एक राजनीतिक अवसर भी है. चुनौती भावनात्मक रूप से आवेशित भाजपा कार्यकर्ताओं की ओर से जवाबी हिंसा को रोकने की है जबकि अवसर भगवा खेमे के लंबे समय से चले आ रहे इस आरोप को पुष्ट करने का है कि तृणमूल शासन के तहत धमकियां, लक्षित हमले और मजबूत स्थानीय सत्ता नेटवर्क बंगाल की राजनीति में हिंसा की संस्कृति को दर्शाते रहे हैं.
घटना को ‘पूर्व नियोजित’ बताते हुए, अधिकारी ने आरोप लगाया कि उनके करीबी सहयोगी चंद्रनाथ रथ की मध्यग्राम में गोली मारकर हत्या करने से पहले कई दिन तक उनकी रेकी की गई. बुधवार देर रात अस्पताल पहुंचने के बाद अधिकारी ने पार्टी कार्यकर्ताओं से कहा, “यह दिल दहला देने वाला है. उन्होंने उसका पीछा किया और उसे मार डाला.” उन्होंने इसके साथ ही समर्थकों से अपील की कि वे “कानून को अपने हाथ में न लें”. इस अपील से ही भाजपा नेतृत्व के भीतर व्याप्त चिंता का व्यापक स्वरूप झलकता है.
हत्या के कुछ ही घंटों के भीतर, जिलों में पार्टी के संगठनात्मक नेटवर्क के माध्यम से, विशेष रूप से उत्तर 24 परगना और पूर्वी मेदिनीपुर में, जहां अधिकारी का काफी प्रभाव है, आक्रोश तेजी से फैल गया. भाजपा के वरिष्ठ नेताओं ने निजी तौर पर इस बात की आशंका जताई कि अगर इस स्थिति को राजनीतिक रूप से नियंत्रित नहीं किया गया तो इससे स्वतःस्फूर्त प्रतिशोध भड़क सकता है. पार्टी के एक नेता ने कहा, “यह हत्या का कोई सामान्य मामला नहीं है. यह राजनीतिक आतंकवाद है.” उन्होंने “पुरानी व्यवस्था” पर नई सरकार के सत्ता संभालने से पहले भय का माहौल पैदा करने की कोशिश का आरोप लगाया गया.
रथ कोई साधारण कार्यकर्ता नहीं थे, बल्कि भाजपा की चुनाव मशीनरी में गहराई से शामिल व्यक्ति थे. वह बंगाल में पार्टी के प्रमुख रणनीतिकार और तृणमूल कांग्रेस विरोधी सबसे जुझारू चेहरे सुवेंदु अधिकारी के साथ घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए थे. राजनीतिक विश्लेषक सुभोमोय मोइत्रा ने कहा, “यह बंगाल की राजनीति का सबसे संवेदनशील दौर है – एक शासन के पतन और दूसरे के सत्ता में आने के बीच का समय. इस दौरान होने वाली हर हिंसक घटना प्रतीकात्मक महत्व रखती है.”
चुनाव परिणामों की घोषणा के बाद से कई जिलों से पार्टी कार्यालयों पर हमले, तोड़फोड़, धमकी और झड़पों की खबरें सामने आई हैं. मध्यग्राम में हुई हत्या से जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं के बीच असुरक्षा की भावना बढ़ने और उत्तर 24 परगना, नदिया, हुगली तथा पूर्वी मेदिनीपुर जैसे जिलों में ध्रुवीकरण गहराने की आशंका है, जहां हाल के वर्षों में राजनीतिक निष्ठाओं में तेजी से बदलाव आया है.
वहीं, एक अन्य विश्लेषक ने कहा, “खतरा यह है कि हिंसा स्वतःस्फूर्त होती है. हर हमला प्रतिशोध के लिए एक और औचित्य प्रदान करता है.” भाजपा इस घटना को न केवल एक आपराधिक कृत्य के रूप में बल्कि इस बात के सबूत के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश कर रही है कि निवर्तमान सत्ताधारी तंत्र के कुछ वर्ग सत्ता हस्तांतरण को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं.
इस हत्या से भाजपा के भीतर उन आवाजों को भी मजबूती मिल सकती है जो शपथग्रहण समारोह के तुरंत बाद राजनीतिक रूप से अस्थिर क्षेत्रों में त्वरित पुलिस फेरबदल, कड़ी सुरक्षा व्यवस्था और आक्रामक कार्रवाई की वकालत कर रही हैं. स्थिति पर एक राजनीतिक विश्लेषक ने टिप्पणी की, “भाजपा का संदेश स्पष्ट है; वे इसे एक ढहती हुई व्यवस्था के अंतिम प्रतिरोध के रूप में चित्रित करना चाहते हैं.”
साथ ही, भाजपा नेतृत्व के सामने एक नाजुक संतुलन बनाए रखने की चुनौती है. हालांकि, पार्टी सार्वजनिक रूप से आक्रामक रुख अपना रही है, लेकिन वह इस बात से अवगत है कि स्थानीय कैडर नेटवर्क के अनियंत्रित प्रतिशोध से नए प्रशासन के औपचारिक रूप से कार्यभार संभालने से पहले ही अस्थिरता और गहरी हो सकती है.
तृणमूल कांग्रेस के लिए, यह घटना एक खतरनाक राजनीतिक जाल की तरह है. पार्टी ने हत्या की निंदा की और अदालत की निगरानी में सीबीआई जांच की मांग की, साथ ही यह आरोप भी लगाया कि चुनाव के बाद हुई झड़पों में उसके कई कार्यकर्ताओं पर हमला किया गया है. हालांकि, भाजपा ने हत्या के इर्द-गिर्द खुद के पीड़ित होने का विमर्श सफलतापूर्वक मजबूत कर लिया है.
यह स्थिति तृणमूल कांग्रेस के लिए विशेष रूप से समस्या पैदा करने वाली है, ऐसे समय में जब वह चुनावी हार के बाद संगठनात्मक क्षरण की धारणाओं से पहले से ही जूझ रही है. पिछले कुछ वर्षों में, अधिकारी ने खुद को बंगाल की राजनीति में भाजपा के जमीनी स्तर के प्रमुख लड़ाके के रूप में स्थापित किया है, और तृणमूल कांग्रेस के साथ लगातार टकराव के माध्यम से अपनी छवि बनाई है. अधिकारी के करीबी सहयोगी की हत्या से भाजपा का रुख और भी सख्त होने की संभावना है तथा आने वाले दिनों में पार्टी का राजनीतिक संदेश और भी तीव्र हो सकता है.


