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दिल्ली की इस इमारत को बनवाने में शाह ने लुटाई जहां की दौलत! इसकी प्राचीर पर पहुंचते ही शख्‍स बन जाता है ‘खास’

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History of Redfort & Connection with 12 May: आज से करीब 387 साल पहले दिल्‍ली की इस इमारत को बनवाने के लिए एक शाह ने सारे जहां की दौलत खर्च कर दी थी. यह सिर्फ एक इमारत नहीं थी, बल्कि एक ऐसी सोच थी, जिसे तब के भारत में मौजूद तमाम इमारतों का निचोड़ निकालकर तैयार किया गया है. 1639 में बनी यह इमारत आज भी कितनी खास है, इस बात का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि इसकी प्राचीर पर पहुंचने वाला शख्‍स पूरी दुनिया के लिए बेहद खास हो जाता है. जी हां, यहां पर हम बात दिल्‍ली के लाल किले की कर रहे हैं.

दिल्‍ली का लाल किला आज भी उन चंद इमारतों में शामिल है, जिसके बनाने में सिर्फ पत्‍थर ही नहीं, बल्कि पूरी सल्‍तनत की ताकत लगा दी गई थी. इस किले को बनाने के लिए शाहजहां ने 12 मई 1639 को इसकी नींव रखी थी. लाल किले को चारदीवारी बनाने के लिए फतेहपुर सीकरी से लाल बलुआ पत्थर यमुना के रास्ते दिल्ली मंगाए गए थे. वहीं, किले के अंदर बनने वाले महलों को आलीशान बनाने के लिए राजस्थान के आए संगमरमर का इस्‍तेमाल हुआ था. दीवारों को जीवंत बनाने के लिए इन पत्‍थरों पर फूलों की ऐसी नक्काशी कराई गई. यह काम नौ साल तक चला.

तब के जमाने में इस किले को बनाने में करीब एक करोड़ रुपये का खर्च आया. उससमय एक करोड़ रुपए कई राज्‍यों का सालाना बजट होता था. जहां तक बात इस किले की प्राचीर पर पहुंचने वाले शख्‍स के खास बनने की है तो मुगल काल में लाल किले की प्राचीर पर चढ़ने का मतलब था, बादशाह के दरबार तक सीधी पहुंच रखना. यानी दुनिया की सबसे ताकतवर शख्सियतों में से एक से सीधे रूबरू होना. वहां पहुंचने वाला व्यक्ति सचमुच ‘खास’ हो जाता था. लेकिन आज यह परंपरा एक नए रूप में जिंदा है. 15 अगस्त 1947 से हर साल इसी प्राचीर पर भारत के प्रधानमंत्री झंडा फहराते है. तब से लेकर आज तक लाल किले की प्राचीर वह मंच बन गई है जहां से प्रधानमंत्री देश-दुनिया को संबोधित करते है.

कैसा था शाहजहां के सपनों का स्‍वर्ग लाल किला

  1. यहां फूलों पर लदा होता था सोना: दीवान-ए-खास के सफेद संगमरमर वाले खंभों में फिरोजा, लाजवर्द, पन्ना, नीलम कीमती पत्थर जड़े थे. दीवारों पर कलमकारी का ऐसा काम था कि देखने वाला सिर्फ देखता ही रह जाता था. खुरासान से मंगाए कालीन, रंगीन कांच के झूमर, सोने की परत लगे बर्तन, सब कुछ एक ऐसी दुनिया बनाते थे, जिसकी कल्‍पना करना आम आदमी के लिए लगभग नामुमकिन था.
  2. लाल किले की वो नहरें जहां होती थी शाही मौज: लाल किले में सबसे खास ‘नहर-ए-बिहिश्त’ यानी स्वर्ग की नहर थी. यमुना से लालकिले के बीच बनाई गई यह नहर तमाम महलों के बीच से होकर गुजरती थी. यह नहर एक तरह का कूलिंग सिस्टम थी, जो गर्मी के दिनों में महलों को ठंडा रखती थी. रंग महल पहुंचते-पहुंचते यह नहर एक छोटे से झरने में तब्‍दील हो जाती थी. नहर के पाने को पूरे लालकिले में प्रवाहित करने के‍ लिए बैलों से चलने वाले रहटें रात-दिन काम करती थीं.
  3. हीरों से सजा था शाहजहां का तख्‍त: लाल किले की सबसे कीमती चीज ‘मयूर सिंहासन’ थी, जिसे तख्त-ए-ताऊस कहा जाता था. यह सिर्फ सोने-चांदी का तख्त नहीं था, बल्कि दुनिया का सबसे कीमती सिंहासन था. इस पर सात सोने के मोर थे, और उनकी पूंछें माणिक्य, पन्ने और हीरों से जड़ी हुई थीं. इसी तख्त पर शाहजहां दरबार लगाता था. फारस के नादिरशाह ने 1739 में जब इस तख्त को लूटा, तो हीरे-जवाहरात के साथ वह कोहिनूर हीरा भी ले गया, जो आज ब्रिटेन के ताज में जड़ा है.

जब लालकिले को लगने लगे बड़े झटके

  1. बाहरी हमलावरों ने लूटा सारा खजाना: शाहजहां के बाद आने वाले बादशाह उतने सक्षम नहीं थे. सबसे पहला और बड़ा झटका 1739 में लगा, जब नादिरशाह ने दिल्ली पर धावा बोल दिया. उसने लाल किले के अंदर दाखिल होने के साथ उसने सोना, हीरे, मयूर सिंहासन, हाथीदांत की कुर्सियां, कीमती पांडुलिपियां सब लूट लीं. उसने करीब 70 करोड़ रुपये की लूट अपने साथ फारस ले जाने का दावा किया था. यह रकम उस समय इतनी बड़ी थी कि नादिरशाह ने फारस में तीन साल तक कोई कर नहीं लगाया.
  2. मराठों के कब्‍जे में आया लालकिला: 1760 के दशक में मराठे लाल किले को जीतने में कामयाब रहे. सदाशिवराव भाऊ ने पानीपत के युद्ध से पहले लाल किले पर यह विजय हासिल की थी. इस जीत को मराठों की मुगलों के खिलाफ सबसे बड़ी जीतों में गिना जाता है. लालकिले पर जीत हासिल करने के बाद मराठों ने सेना के खर्च के लिए दीवान-ए-खास की चांदी की छत को पिघलाकर सिक्कों की शक्‍ल दे दी. इस युद्ध में लाल किले के हिस्‍से खंडहर में तब्‍दील हो गए.
  3. अंग्रेजों ने बैरक में बदल दिया स्‍वर्ग: 1857 का विद्रोह भारत के इतिहास का एक बड़ा मोड़ था. लाल किला इस विद्रोह का केंद्र बना, जब बहादुर शाह जफर को विद्रोहियों ने अपना नेता बना लिया. लेकिन विद्रोह के दब जाने के बाद, अंग्रेजों ने लाल किले को बर्बाद करने की ठान ली. उन्होंने 80% से अधिक अंदरूनी संरचनाओं को ध्वस्त कर दिया. संगमरमर के महलों को तोड़कर उनकी जगह बैरकें बना दीं. बागीचों को तबाह कर नहरों को भर दिया.

लालकिले से जुड़ी दर्द, मुकदमें और प्रतीक की कहानी

  1. बहादुर शाह जफर के बेटों की हत्या: 1857 के बाद के दृश्य सबसे दर्दनाक थे. अंग्रेजों ने अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर को पकड़ लिया था. अंग्रेज अफसर विलियम हडसन ने जफर के तीन बेटों को बिना किसी मुकदमे के गोली मारने का आदेश दे दिए थे. बहादुर शाज जफर के तीनों बेटों मिर्जा मुगल, मिर्जा खिज्र सुल्तान और मिर्जा अबू बक्र की हत्या लाल किले के एक दरवाजे के पास हुई. बूढ़े बादशाह को अपने बेटों के शव देखने पर मजबूर किया गया. इस घटना के बाद जफर को बर्मा निर्वासित कर दिया गया, जहां 1862 में उनकी मौत हो गई.
  2. लाल किला मुकदमा और आजाद हिंद फौज: 1945 में दूसरे विश्व युद्ध के अंत के बाद लाल किला एक बार फिर सुर्खियों में आया. आजाद हिंद फौज के शाह नवाज खान, गुरबख्श सिंह ढिल्लों और प्रेम कुमार सहगल का कोर्ट मार्शल लाल किले के अंदर ही किया गया. यह मुकदमा इतना प्रसिद्ध हुआ कि पूरे देश में आग लग गई. कांग्रेस हो या मुस्लिम लीग सबने एकजुट होकर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. लोगों ने लाल किले के बाहर प्रदर्शन शुरू कर दिए. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी ब्रिटेन को शर्मिंदगी उठानी पड़ी.
  3. 15 अगस्त 1947 को लाल किले पर फहराया तिरंगा: 15 अगस्त 1947 की सुबह भारत के इतिहास का सबसे गौरवशाली पल बनी, जब देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने लाल किले की प्राचीर से पहली बार तिरंगा फहराया. इसी के साथ 200 साल लंबे ब्रिटिश शासन का अंत हुआ और आजाद भारत की शुरुआत हुई. लाल किले पर फहराया गया पहला तिरंगा राजस्थान के दौसा जिले के आलूदा गांव में तैयार किया गया था. आजादी के इस ऐतिहासिक जश्न की शुरुआत बिस्मिल्लाह खान की शहनाई से हुई.

लाल किला को विश्व धरोहर का दर्जा कब मिला?
साल 2007 में यूनेस्को ने लाल किला को विश्व धरोहर स्थल घोषित किया था. यह किला मुगल वास्तुकला की शानदार मिसाल माना जाता है, जिसमें फारसी, तैमूरी और भारतीय कला का सुंदर मेल दिखाई देता है. इसकी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक अहमियत पूरी दुनिया में मानी जाती है.

‘नहर-ए-बिहिश्त’ का क्या हुआ?
लाल किला में एक खास जल व्यवस्था थी, जो यमुना नदी से पानी लाकर महलों को ठंडा रखती थी. 1857 की क्रांति के बाद अंग्रेजों ने इसे जानबूझकर बर्बाद कर दिया. नहरों में मलबा भर दिया गया और पानी के रास्ते बंद कर दिए गए. आज भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने इसके कुछ हिस्सों को दोबारा बनाया है, लेकिन यह सिस्‍टम अब पहले की तरह काम नहीं करता है.

क्या लाल किले के अंदर कोई गुप्त सुरंग है?
कुछ पुराने दस्तावेजों और लोक कहानियों में कहा जाता है कि किले के नीचे गुप्त सुरंगें थीं, जो उसे यमुना नदी या दूसरी जगहों से जोड़ती थीं. लेकिन अब तक हुई पुरातात्विक जांच में ऐसी किसी बड़ी सुरंग का पक्का सबूत नहीं मिला है. इसलिए इन सुरंगों की कहानी आज भी पूरी तरह सच साबित नहीं हुई है और इसे आधी हकीकत, आधी किवदंती माना जाता है.

लाल किला का ताजमहल से क्या संबंध है?
ताजमहल और लाल किला दोनों को शाहजहां ने बनवाया था. इन दोनों के वास्तुकार उस्ताद अहमद लाहौरी थे. ताजमहल मुमताज महल की याद में बना एक मकबरा है, जबकि लाल किला मुगल शासकों का शाही किला और सत्ता का केंद्र था. ताजमहल को प्यार की निशानी माना जाता है, वहीं लाल किला ताकत, शासन और मुगल साम्राज्य की शान का प्रतीक माना जाता है.

लाल किला किस तारीख को बना था और क्यों महत्वपूर्ण है?
दिल्ली के लाल किले की नींव 12 मई 1639 को रखी गई थी. इसी दिन मुगल बादशाह शाहजहां ने ‘किला-ए-मुबारक’ के नाम से इसके निर्माण की शुरुआत करवाई थी. करीब 9 साल तक चले निर्माण के बाद यह किला 1648 में बनकर तैयार हुआ.



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