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निचलौल के बरगदवा कुटी मंदिर पर डकैती करने से पहले डाकू लेते थे आशीर्वाद, पुलिस से मुठभेड़ का है गवाह, जाने

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Maharajganj news: महराजगंज जिले के निचलौल क्षेत्र के जंगलों से सटा एक बरगदवा कुटी मंदिर है, जो अपनी अलग और अनोखी आस्था के लिए जाना जाता है. इस मंदिर के साथ बहुत ही रहस्यमई मान्यता है जो खूब चर्चा में रहती है. यह मंदिर जहां स्थित है वहां पहले घना जंगल हुआ करता था और इस क्षेत्र में डाकुओं का बहुत आतंक था.इस मंदिर को लेकर ऐसे भी मानता है कि जब डाकू किसी बड़ी वारदात या डकैती करने के लिए जाते थे तो उसके पहले वह मंदिर में आशीर्वाद लेने के लिए पहुंचते थे. जब उन्हें सफलता के संकेत मिलते थे तो वह उस वारदात को अंजाम देते थे.

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महराजगंज: एक दौर ऐसा था, जब जंगल वाले क्षेत्रों में स्थानीय डाकुओं की दहशत में लोग रहते थे. महराजगंज जिले के निचलौल क्षेत्र के जंगलों से सटा एक बरगदवा कुटी मंदिर है, जो अपनी अलग और अनोखी आस्था के लिए जाना जाता है. इस मंदिर के साथ बहुत ही रहस्यमई मान्यता है जो खूब चर्चा में रहती है. यह मंदिर जहां स्थित है वहां पहले घना जंगल हुआ करता था और इस क्षेत्र में डाकुओं का बहुत आतंक था.

इस मंदिर को लेकर ऐसे भी मानता है कि जब डाकू किसी बड़ी वारदात या डकैती करने के लिए जाते थे तो उसके पहले वह मंदिर में आशीर्वाद लेने के लिए पहुंचते थे. जब उन्हें सफलता के संकेत मिलते थे तो वह उस वारदात को अंजाम देते थे.

कपूर जलाकर लेते थे आशीर्वाद

तत्कालीन समय की बात करें तो उस समय एक डाकुओं से जुड़ी मान्यता यह देखने को मिलती है कि डाकू जब किसी वारदात के लिए निकलते थे तो वह आसपास के मंदिर में कपूर जलाकर आशीर्वाद लेते थे. यदि कपूर सही से जलता था तो वह उन्हें सकारात्मक संदेश लगता था और वहीं जब कपूर नहीं जलता था तो वह वारदात नहीं करते थे. उस समय के डाकुओं में यह अंधविश्वास बहुत ही ज्यादा प्रचलित था जिसकी चर्चा भी होती है. महराजगंज जिले के निचलौल क्षेत्र का बरगदवा कुटी मंदिर ऐसे ही जंगलों से सटा हुआ मंदिर है. ऐसा माना जाता है कि डाकू किसी वारदात को अंजाम देने से पहले यहां आते थे. यह मंदिर सदियों पुराना है और पहले जंगलों के बीच हुआ करता था जहां बहुत कम ही लोग आते जाते थे. हालांकि आज के समय में स्थिति सामान्य हो चुकी है और यहां पर लोगों का आवागमन शुरू हो चुका है. लगभग हर समय यहां पर लोगों के भीड़ देखी जा सकती है. जो जगह पहले डाकुओं के दहशत में रहता था तो वहीं आज एक अच्छे चौराहे नुमा विकसित हो चुका है.

पुलिस और डाकुओं के मुठभेड़ का रहा है गवाह

यह मंदिर सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं है बल्कि इतिहास के कहानियों का साक्षी भी रहा है. सत्तर और अस्सी के दशक में जब डाकुओं के दहशत में लोग रहते थे तो वहीं उनके अंत की कहानी भी यही खत्म हुई थी. ऐतिहासिक जगह कई डाकू और पुलिस के बीच मुठभेड़ का साक्षी रहा है. ऐसा कहा जाता है कि यहां पर कई बार डाकू और पुलिस के बीच मुठभेड़ हुआ और एनकाउंटर में डाकुओं को मार दिया गया. जैसे-जैसे डाकुओं का आतंक खत्म हुआ लोगों का जीवन सामान्य होने लगा. आज के समय में इस मंदिर की बात करें तो यहां का वातावरण बहुत ही शांत और प्राकृतिक दिखता है. हरियाली और जंगलों के होने की वजह से यहां आने पर एक अलग तरह का सुकून मिलता है. इसके साथ ही स्थानीय लोगों का ऐसा मानना है कि यहां मांगी गई मनोकामनाएं पूरी होती हैं और यही वजह है कि दूर-दूर से लोग यहां पर पूजा पाठ करने के लिए आते हैं.

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Rajneesh Kumar Yadav

मैं रजनीश कुमार यादव, 2019 से पत्रकारिता से जुड़ा हूं. तीन वर्ष अमर उजाला में बतौर सिटी रिपोर्टर काम किया. तीन वर्षों से न्यूज18 डिजिटल (लोकल18) से जुड़ा हूं. ढाई वर्षों तक लोकल18 का रिपोर्टर रहा. महाकुंभ 2025 …और पढ़ें



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