अखिलेश यादव के भाई प्रतीक यादव को गुरुवार को अंतिम विदाई दे दी गई. बैकुंठधाम भैंसाकुंड श्मशान घाट पर प्रतीक को उनकी पत्नी अपर्णा यादव के पिता अरविंद बिष्ट ने मुखाग्नि दी.अरविंद प्रतीक के ससुर लगते हैं. वहीं प्रतीक की दो बेटियां भी हैं. ऐसे में जैसे ही प्रतीक यादव की चिता को ससुर के द्वारा अग्नि देने की तस्वीर सामने आई तो लोगों के मन में सवाल उठने लगा कि क्या कोई ससुर अपने दामाद को मुखाग्नि दे सकता है? आखिर शास्त्र इस बारे में क्या कहते हैं?
लोगों ने सोशल मीडिया पर भी पूछा कि भाई अखिलेश यादव के होते हुए ससुर ने चिता को आग क्यों लगाई? वहीं प्रतीक यादव की दो बेटियां भी हैं तो क्या यह शास्त्र सम्मत है कि ससुर चिता को दाग लगाए?
इन सवालों पर News18hindi ने उज्जैन के जाने माने ज्योतिषविद् और शास्त्रों के विद्वान दुर्गेश तारे से बातचीत की है. आइए जानते हैं कि उन्होंने इस विषय पर क्या जवाब दिया?
दुर्गेश तारे कहते हैं कि गरुण पुराण में विस्तार से अंतिम संस्कार, हिंदू रीतियों और संस्कारों के बारे में बताया गया है. गरुण पुराण के 14 वें और 15 वें अध्याय में अंतिम संस्कार और मुखाग्नि के अधिकार व विधि के बारे में बताया गया है. इसमें मुखाग्नि का सबसे पहला दायित्व पुत्र को दिया गया है. अगर किसी का पुत्र है तो चिता को आग देने का प्रथम अधिकार पुत्र का ही है. अगर पुत्र नहीं है या ज्यादा छोटा है तो पिता और भाई मुखाग्नि दे सकते हैं.
तारे आगे बताते हैं, अगर किसी का पुत्र, भाई और पिता मौजूद नहीं है तो अन्य रक्त संबंधी भी मुखाग्नि दे सकते हैं. वहीं अगर महिला है तो पति दाग लगा सकता है.
जहां तक बात प्रतीक यादव को ससुर के द्वारा दी गई मुखाग्नि की है तो शास्त्रों के अनुसार अगर कोई रक्त संबंधी नहीं है तो ससुर भी दामाद को मुखाग्नि दे सकता है. ससुर को पिता का ही दर्जा प्राप्त है ऐसे में अगर पिता दाग दे सकता है तो ससुर भी दे सकता है, हालांकि ससुर तभी चिता को आग दे जब मृतक का कोई रक्तसंबंधी भतीजा, पौत्र भी मौजूद न हो. लिहाजा अरविंद बिष्ट ने दाह कर्म किया है तो यह भी सही है.
तारे कहते हैं कि सिर्फ ससुर ही नहीं किसी भी अंतिम स्थिति में ब्राह्मण को भी मुखाग्नि देने का अधिकार दिया गया है. अगर किसी के इनमें से कोई नहीं हैं तो एक शुद्ध ब्राह्मण भी दाह-कर्म कर सकता है और उसे शास्त्रों में पूरी मान्यता है.
क्या बेटियों को अधिकार नहीं?
तारे बताते हैं कि गरुण पुराण में कहीं भी पुत्री को निषेध नहीं किया गया है लेकिन संतान में सिर्फ पुत्र को संबोधित किया गया है और पुत्र को प्रथम अधिकारी बताया है, ऐसे में जिनके पुत्र नहीं है और पुत्री हैं और पुत्री दाह कर्म करती है तो इसमें भी कुछ गलत नहीं है. पुत्री भी अग्नि दे सकती है.
पुत्रियां श्राद्ध भी कर सकती हैं. उस हिसाब से बेटियों को भी मुखाग्नि देने का अधिकार है लेकिन ये तब है जब किसी के पुत्र न हो.
प्रेमानंद जी ने भी कही थी ये बात
एक वीडियो में एकांतिक वार्तालाप में वृंदावन के प्रसिद्ध संत प्रेमानंद महाराज भी कहते हैं कि जो काम बेटे करते हैं वह बेटियां भी कर सकती हैं. शास्त्र कहते हैं कि जिनके बेटा नहीं है, उनकी बेटियां सभी धार्मिक और सामाजिक परंपराओं का निर्वाह कर सकती हैं. पुत्र नहीं है तो पुत्री भी अपने माता-पिता का पालन-पोषण कर सकती है, मरने के बाद उनका श्राद्ध कर सकती है. शास्त्रों में संतान की बात कही है और वह पुत्र भी हो सकता है और पुत्री भी.
ये है सबसे जरूरी बात
तारे कहते हैं कि शास्त्रों में मुखाग्नि का मुख्य उद्देश्य मृत शरीर को मुक्ति और आत्मा को शांति प्रदान करना है. शास्त्र इस बात पर जोर देते हैं कि कर्तव्य ठीक से पूरा हो. इस मामले में क्षेत्रीय, सम्प्रदायगत और पारिवारिक परंपराएं अलग-अलग हो सकती हैं. कुछ परिवारों में ससुर दामाद को मुखाग्नि देते हैं, तो कुछ में दूर के रिश्तेदार को सौंपा जाता है. हालांकि शास्त्रों में इसके बारे में स्पष्ट है.


