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Gonda News: उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले के जानकीनगर में जगदीश प्रसाद प्रजापति का परिवार पिछले 40 वर्षों से मिट्टी के बर्तन बनाने की विलुप्त होती पुश्तैनी कला को संजोए हुए है. आधुनिक मशीनी युग और प्लास्टिक के बढ़ते चलन के बावजूद, यह परिवार पारंपरिक चाक और हाथों के हुनर से घड़े, कुल्हड़ और दीये तैयार कर अपनी आजीविका चला रहा है. भट्ठी की आग में तपकर तैयार होने वाले इन बर्तनों की मांग विशेषकर गर्मियों में बढ़ जाती है, जो इस परिवार की मेहनत और अटूट लगन का जीवंत उदाहरण है.
Gonda News: वक्त की रफ्तार ने भले ही इंसानी जरूरतों को प्लास्टिक और मशीनों के सांचे में ढाल दिया हो, लेकिन उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले में एक परिवार ऐसा भी है जिसकी सुबह आज भी मिट्टी की सौंधी खुशबू और चाक की सरसराहट के साथ होती है. विकासखंड झंझरी के ग्राम सभा जानकीनगर के रहने वाले जगदीश प्रसाद प्रजापति का परिवार न केवल मिट्टी के बर्तन बनाकर अपनी आजीविका चला रहा है, बल्कि विलुप्त होती अपनी पुश्तैनी कला को भी बखूबी संजोए हुए है.
चाक पर गढ़ी जा रही है आजीविका
लोकल 18 से बातचीत के दौरान जगदीश प्रसाद प्रजापति बताते हैं कि उनके परिवार की दिनचर्या मिट्टी के इर्द-गिर्द ही घूमती है. परिवार के सदस्य हर दिन अच्छी गुणवत्ता वाली मिट्टी लाते हैं, जिसे घंटों की मेहनत के बाद गूंथा जाता है. जब मिट्टी पूरी तरह तैयार हो जाती है, तो उसे चाक (पारंपरिक चक्र) पर चढ़ाकर हाथों के जादू से घड़ा, कुल्हड़ और दीये जैसे बर्तनों का आकार दिया जाता है. इसके बाद इन्हें धूप में सुखाकर भट्ठी की आग में तपाया जाता है, जिससे ये बाजार में बिकने के लिए मजबूत और तैयार हो जाते हैं.
कैसे तैयार होते हैं मिट्टी के बर्तन?
जगदीश प्रसाद बताते हैं कि बर्तन बनाने की प्रक्रिया काफी धैर्य और मेहनत वाली है. सबसे पहले अच्छी क्वालिटी की मिट्टी का चुनाव किया जाता है. इसके बाद चाक को डंडे की मदद से तेजी से घुमाया जाता है और घूमते हुए चाक पर गीली मिट्टी को उंगलियों के सहारे मनचाहा आकार दिया जाता है. धूप में सुखाने के बाद जब ये पूरी तरह कठोर हो जाते हैं, तब इन्हें भट्ठे में पकाया जाता है. भट्ठे की आंच ही इन बर्तनों को असली मजबूती और रंग देती है.
गर्मी के मौसम में बढ़ती है मांग
भले ही साल भर काम चलता हो, लेकिन गर्मी का मौसम इस परिवार के लिए खुशियां लेकर आता है. जगदीश प्रसाद के अनुसार, गर्मियों में ठंडे पानी के लिए मिट्टी के घड़ों और चाय-लस्सी के लिए कुल्हड़ की मांग काफी बढ़ जाती है. मांग बढ़ने से आमदनी में भी इजाफा होता है, जिससे साल भर का आर्थिक संतुलन बना रहता है. यही वह समय होता है जब उनकी मेहनत को बाजार में सही कद्र मिलती है.
40 वर्षों का सफर: मजदूरी की, फिर लौटे अपनी जड़ों की ओर
अपनी कहानी साझा करते हुए जगदीश प्रसाद भावुक होकर बताते हैं कि उनका परिवार पिछले करीब 40 सालों से इस काम से जुड़ा है. हालांकि, बीच में एक दौर ऐसा भी आया जब मिट्टी के बर्तनों की मांग कम होने की वजह से उन्हें यह काम छोड़ना पड़ा. उस कठिन समय में परिवार ने मजदूरी करके पेट पाला. लेकिन अपनी जड़ों से मोह उन्हें दोबारा इस पुश्तैनी काम की ओर खींच लाया. आज वे पूरी तरह इसी काम पर निर्भर हैं.
पुश्तैनी विरासत और पारंपरिक पहचान
यह कला जगदीश प्रसाद को उनके पूर्वजों से विरासत में मिली है. आधुनिक मशीनीकरण के इस दौर में भी उन्होंने बिजली वाले चाक की बजाय पारंपरिक चाक और हाथों के हुनर को प्राथमिकता दी है. उनका मानना है कि हाथों से बने बर्तनों की गुणवत्ता और पहचान मशीनी उत्पादों से कहीं बेहतर होती है. आज भले ही यह काम बहुत ज्यादा मुनाफा न देता हो, लेकिन यह परिवार अपनी परंपरा को जिंदा रखने के लिए पूरी लगन के साथ जुटा हुआ है.
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राहुल गोयल न्यूज़ 18 हिंदी में हाइपरलोकल (यूपी, उत्तराखंड, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश) के लिए काम कर रहे हैं. मीडिया इंडस्ट्री में उन्हें 16 साल से ज्यादा का अनुभव है, जिसमें उनका फोकस हमेशा न्यू मीडिया और उसके त…और पढ़ें


