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नोएडा: उत्तर प्रदेश के गौतमबुद्ध नगर जिले के नोएडा स्थित अलग-अलग औद्योगिक इलाकों में जमकर श्रमिकों ने बवाल किया. कहीं गाड़ियों में आग लगाई गई तो कहीं बिल्डिंगों में तोड़फोड़ की. सड़कों पर मानो श्रमिकों का सैलाब आ गया था. इस जनसमूह में केवल पुरुष ही नहीं बल्कि महिलाएं भी थीं. हर किसी का यही दुख है कि जिस स्पीड से महंगाई बढ़ी है, उससे कई गुना कम रफ्तार से उनकी तन्ख्वाह बढ़ी है. परिवार का पेट भरना मुश्किल हो गया है. बच्चों की फीस नहीं जमा हो पा रही है. ऐसे ही श्रमिक हैं अभिषेक, जो मूल रूप से बिहार के रहने वाले हैं. उन्होंने अपने जीवन में आ रही मुश्किलों को लेकर बात की है.
मेरा नाम अभिषेक है और मैं आज से करीब 10 साल पहले नोएडा आया था, ये सोचकर कि 12 से 15 हजार की नौकरी किसी कंपनी में मिल जाएगी. लेकिन पढ़ाई कम थी, अनुभव था नहीं और घर की जिम्मेदारियां थीं. बड़ा बेटा होने के चलते मजबूरी थी कि कहीं न कहीं जॉब करना है. फिर मैंने मात्र 7 हजार रुपये में एक कंपनी में ज्वाइन किया और आज करीब दस साल बीत गए हैं. उसी कंपनी में हूं और इतना समय गुजारने के बाद मात्र 9 हजार रूपये की वृद्धि मेरी सैलरी में हुई है.
मैं अपने परिवार में सबसे बड़ा हूं और मेरे ऊपर ही परिवार का बोझ है. परिवार में मां-बाबूजी, दो बहनें और एक भाई है. कमरे का किराया 4 हजार रुपया है, वो भी बिना किचन और शेयरिंग में बाथरूम वाला. अगर हम कहीं सेपरेट लेते हैं तो उसका किराया 7 से 10 हजार है जो कि हमारे बस के बाहर है. बीते दिनों से ईरान इजरायल के बीच चल रहे युद्ध के कारण जो गैस के दामों में बढ़ोतरी हुई है, उससे और ज्यादा बैलेंस बिगड़ गया है.
आपदा में अवसर तलाश रहे हैं लोग
अब सुबह-शाम घर में सिर्फ खाने के अलावा कुछ और नहीं बनता, ताकि गैस की बचत हो सके. खाने में भी वो सब्जी जो जल्दी पक जाए. सरकार का दावा है कि मजदूर वर्ग को छोटे सिलेंडर उपलब्ध करा रही है. मैं नोएडा में दर्जनों एजेंसी पर गया, मुझे वो सिलेंडर नहीं मिला. गैस एजेंसी संचालकों का कहना था कि हमारे पास नहीं आए हैं, आते ही आपको सूचना मिल जाएगी. ये है यहां की एजेंसी के हालात. मार्केट में हर आदमी आपदा में अवसर तलाश रहा है, जिसके चलते साग सब्जी से लेकर किचन का आइटम मंहगा कर दिया है.
मजबूरी में करना पड़ता है ओवरटाइम
घर के खर्चे के अलावा भी कपड़े और दूसरे खर्ज भी होते है. कंपनी में ओवरटाइम ड्यूटी करनी पड़ती है. कई बार मन और शरीर थक जाता है. उसके बाद भी हमें ओवर टाइम लगाना पड़ता है ये सोचकर कि नहीं करेगें तो खाएंगे क्या! कंपनी में 30 से 30 दिन काम होता है. संडे की भी छुट्टी नहीं मिलती. अगर हम छुट्टी मारते हैं तो उसका रूपये कटता है कुछ इस तरह चल रहा है हमारा जीवन.
मात्र 11 हजार में कर रही है नौकरी
वहीं प्रीति बताती है कि वो पांच साल पहले कोविड के शुरुआतकाल के शुरुआत में आईं. उस समय परिवार का सहारा लेते हुए पढ़ाई करती रहीं. लेकिन जब लगा कि घर का गुजारा नहीं चल रहा है तो बीते साल एक कंपनी ज्वाइन कर ली, जहां उन्हें फिलहाल 11 हजार रुपए मिल रहे हैं. कमरे का किराया घर के खर्चे के बाद हम देखते है तो आखिरी महीने के समय हाथ में कुछ नहीं बचता. कुछ इस तरह हमारा जीवन चल रहा है.
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Prashant Rai am currently working as Chief Sub Editor at News18 Hindi Digital, where he lead the creation of hyper-local news stories focusing on politics, crime, and viral developments that directly impact loc…और पढ़ें


