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Siddhpeeth Maa Bhadrakali Temple Meerut: मेरठ के हस्तिनापुर स्थित महाभारत कालीन सिद्धपीठ मां भद्रकाली मंदिर की महिमा निराली है. यहां मां पिंडी स्वरूप में विराजमान हैं, जिनकी पूजा स्वयं पांडवों ने की थी. इस प्राचीन मंदिर में दूध-दही अर्पित करने से बीमार पशु ठीक हो जाते हैं और भक्तों की हर मनोकामना पूर्ण होती है. माघ और आषाढ़ मेले के दौरान देश भर से श्रद्धालु यहां दर्शन हेतु उमड़ते हैं. जानिए इस ऐतिहासिक मंदिर का पूरा इतिहास और अद्भुत धार्मिक मान्यताएं.
Siddhpeeth Maa Bhadrakali Temple Meerut: पश्चिमी उत्तर प्रदेश का मेरठ जिला केवल क्रांति की ही नहीं, बल्कि महाभारत कालीन रहस्यों की भी जननी है. मेरठ से महज 45 किलोमीटर दूर हस्तिनापुर की पावन धरा पर आज भी ऐसे कई मंदिर मौजूद हैं, जिनकी जड़ें सीधे द्वापर युग से जुड़ी हैं. इन्हीं में से एक है मध्य गंग नहर के निकट स्थित अकबरपुर गांव का सिद्धपीठ मां भद्रकाली मंदिर. मान्यता है कि यहां मां के पिंडी स्वरूप के दर्शन मात्र से भक्तों के कष्ट दूर हो जाते हैं और स्वयं पांडवों ने भी यहां शक्ति की आराधना की थी.
पांडवों की आराध्य हैं मां भद्रकाली
हस्तिनापुर क्षेत्र के ऐतिहासिक महत्व को दुनिया जानती है, लेकिन अकबरपुर गांव स्थित सिद्धपीठ मां भद्रकाली मंदिर की आस्था विशेष है. मंदिर के मुख्य पुजारी परणपुरी महाराज ने लोकल-18 की टीम से खास बातचीत करते हुए बताया कि इस मंदिर का इतिहास महाभारत काल से जुड़ा हुआ है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पांचों पांडव भी मां भद्रकाली की पूजा-अर्चना किया करते थे. यहां मां किसी प्रतिमा के रूप में नहीं, बल्कि साक्षात ‘पिंडी’ के रूप में विराजमान हैं, जो उनकी प्राचीनता और जीवंत शक्ति का प्रतीक है.
बीमार पशुओं के लिए वरदान है यहां का प्रसाद
इस सिद्धपीठ की सबसे अनोखी परंपरा पशुओं के प्रति मां की कृपा है. आसपास के गांवों के लोग मां भद्रकाली को अपनी ‘कुलदेवी’ के रूप में पूजते हैं. पुजारी जी बताते हैं कि यदि किसी ग्रामीण की गाय, भैंस या अन्य पालतू पशु बीमार हो जाता है, तो वे यहां आकर मां को दूध और दही का प्रसाद अर्पित करते हैं. भक्तों का अटूट विश्वास है कि ऐसा करने से पशुओं की बीमारी दूर हो जाती है और वे स्वस्थ हो जाते हैं. सामान्य तौर पर यहां मां को हलवा-पूरी का भोग भी लगाया जाता है.
माघ और आषाढ़ मेले में उमड़ता है जनसैलाब
यूं तो यहां साल भर भक्तों का तांता लगा रहता है, लेकिन माघ और आषाढ़ के महीने में यहां का नजारा देखने लायक होता है. इन महीनों में भव्य मेलों का आयोजन किया जाता है, जिसमें देश के कोने-कोने से श्रद्धालु अपनी मनोकामनाएं लेकर मां के दरबार में हाजिरी लगाते हैं. श्रद्धालुओं का मानना है कि जो भी विधि-विधान से यहां पूजा करता है, मां उसकी झोली कभी खाली नहीं रहने देतीं.
सोमवार का विशेष महत्व और जलाभिषेक
सिद्धपीठ में सोमवार के दिन को विशेष फलदायी माना जाता है. इस दिन श्रद्धालु बड़ी संख्या में पहुंचकर मां भद्रकाली के पिंडी स्वरूप का जलाभिषेक करते हैं. दर्शन के लिए आए श्रद्धालु आलोक ने बताया कि वे सपरिवार यहां आते हैं और आज तक उन्होंने जो भी मांगा है, मां ने उसे पूरा किया है. यही वजह है कि वे हर साल इस पावन स्थान पर मथ्था टेकने जरूर पहुंचते हैं.
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राहुल गोयल न्यूज़ 18 हिंदी में हाइपरलोकल (यूपी, उत्तराखंड, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश) के लिए काम कर रहे हैं. मीडिया इंडस्ट्री में उन्हें 16 साल से ज्यादा का अनुभव है, जिसमें उनका फोकस हमेशा न्यू मीडिया और उसके त…और पढ़ें


