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सचिन तेंदुलकर के आखिरी मैच में प्रज्ञान ओझा को ‘मैन ऑफ द मैच’ के पुरस्कार से नवाजा गया. उस समय किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था कि 27 साल का यह गेंदबाज, जो अपने करियर के पीक पर था, वह अपना आखिरी अंतरराष्ट्रीय मैच खेल रहा है.
सचिन तेंदुलकर के रिटायरमेंट टेस्ट में 10 विकेट लेने के बाद भी प्रज्ञान ओझा फिर कभी भारत के लिए नहीं खेल पाए
नई दिल्ली. यह कहानी है उस गेंदबाज की जिसने 10 विकेट झटके, ‘मैन ऑफ द मैच’ बना, और फिर कभी टीम इंडिया की जर्सी नहीं पहन सका. यह साल 2013 की बात है, मुंबई का ऐतिहासिक वानखेड़े स्टेडियम और विपक्षी टीम थी वेस्टइंडीज. पूरा देश ‘मास्टर ब्लास्टर’ सचिन तेंदुलकर के आखिरी मैच की वजह से भावुक था.उस समय टीम इंडिया की कमान महेंद्र सिंह धोनी के हाथों में थी. उस विदाई मैच में जहां सबकी नजरें सचिन पर थीं,वहीं गेंद के साथ प्रज्ञान ओझा अपना ही एक अलग इतिहास लिख रहे थे.
एक गेंदबाज एक टेस्ट मैच में दोनों पारियों में पांच-पांच विकेट लेता है और यही टेस्ट मैच उसके करियर का आखिरी टेस्ट मैच बना दिया जाता है. प्रज्ञान ओझा भारतीय क्रिकेट का एक ऐसा नाम, जिसने अपनी फिरकी से दुनिया के बड़े-बड़े बल्लेबाजों को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया.लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि कोई खिलाड़ी अपने करियर के सबसे बेहतरीन प्रदर्शन के बाद अचानक टीम से हमेशा के लिए ओझल कैसे हो सकता है.
सचिन के रिटायरमेंट टेस्ट में मैन ऑफ द मैच
वेस्टइंडीज के खिलाफ जिस टेस्ट मैच में फैंस इस बात को लेकर इमोशनल थे कि वो अब सचिन तेंदुलकर को मैदान पर नहीं देख पाएंगे किसी को क्य पता था कि उसी टेस्ट में एक और खिलाड़ी अपना अंतिम मैच खेल रहा होगा. बाएं हाथ के स्पिनर प्रज्ञान ओझा ने उस मैच की पहली पारी में 5 विकेट लिए और दूसरी पारी में भी 5 विकेट झटके. पूरे मैच में मात्र 89 रन देकर 10 विकेट लिए. सचिन तेंदुलकर के आखिरी मैच में प्रज्ञान ओझा को ‘मैन ऑफ द मैच’ के पुरस्कार से नवाजा गया. उस समय किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था कि 27 साल का यह गेंदबाज, जो अपने करियर के पीक पर था, वह अपना आखिरी अंतरराष्ट्रीय मैच खेल रहा है.
क्यों हुए ओझा बाहर?
हालांकि सन 2014 के आखिर में उनके एक्शन को संदिग्ध पाया गया इसलिए उनको रणजी में और अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में गेंदबाजी करने से रोक दिया गया उसके बाद उनके एक्शन में सुधार किया गया लेकिन उससे पहले ही उनको टीम से बाहर कर दिया गया था यानी के वह टेस्ट उनका आखिरी टेस्ट ही बनकर रह गया था तो अगर यह कहें कि संदिग्ध एक्शन की ही वजह से उनका करियर खत्म हुआ तो यह कहना पूरी तरह से गलत होगा. ओझा ने हार नहीं मानी उन्होंने कड़ी मेहनत की, अपने एक्शन को सुधारा और 2015 में बीसीसीआई से उन्हें ‘क्लीन चिट’ भी मिल गई.
जडेजा- अश्विन का युग शुरु
जब तक ओझा वापसी के लिए तैयार हुए, तब तक भारतीय क्रिकेट की तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी थी. टीम में रविंद्र जडेजा का उदय हो चुका था. जडेजा न केवल गेंद से बल्कि बल्ले और फील्डिंग से भी मैच जिताने की क्षमता रखते थे. धोनी और बाद में विराट कोहली की कप्तानी में टीम इंडिया ‘पांच गेंदबाज’ की रणनीति की ओर बढ़ रही थी, जहां निचले क्रम पर बल्लेबाजी करने वाले स्पिनरों को तरजीह दी जाने लगी. प्रज्ञान ओझा एक ‘विशुद्ध स्पिनर’ थे, बल्लेबाजी में उनका हाथ तंग था साथ ही, आर.अश्विन और रविंद्र जडेजा की जोड़ी ने टेस्ट क्रिकेट में अपनी जगह इतनी मजबूत कर ली थी कि किसी तीसरे स्पिनर के लिए जगह बनाना लगभग नामुमकिन हो गया. चयनकर्ताओं ने भविष्य को देखते हुए युवाओं पर निवेश करना शुरू कर दिया और 113 टेस्ट विकेट लेने वाले ओझा धीरे-धीरे सिस्टम से बाहर हो गए.
सचिन की विदाई की चमक में एक चमकता सितारा खामोशी से अस्त हो गया. आज ओझा कमेंट्री के जरिए खेल से जुड़े हैं, लेकिन फैंस के मन में आज भी यह सवाल टीस मारता है कि क्या 10 विकेट लेने वाले उस हीरो को एक मौका और नहीं मिलना चाहिए था.
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मैं, राजीव मिश्रा, वर्तमान में नेटवर्क 18 में एसोसिएट स्पोर्ट्स एडिटर के रूप में कार्यरत हूँ. इस भूमिका में मैं डिजिटल स्पोर्ट्स कंटेंट की योजना, संपादकीय रणनीति और एंकरिंग की जिम्मेदारी निभाता हूँ. खेल पत्रका…और पढ़ें


