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ब्रिक्स में हाई-वोल्टेज टकराव: क्यों और कैसे भिड़ गए ईरान और UAE? इजरायल कनेक्शन ने बढ़ाया तनाव

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नई दिल्ली. ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक के दौरान ईरान और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के बीच जबरदस्त टकराव खुलकर सामने आ गया. ईरान ने यूएई पर सीधे तौर पर ईरान विरोधी सैन्य अभियानों में शामिल होने का आरोप लगाते हुए कहा कि ‘मिलीभगत का हिसाब लिया जाएगा.’ ब्रिक्स मंच पर दोनों देशों के बीच आरोप-प्रत्यारोप ने पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव को और विस्फोटक बना दिया.

ईरान ने दावा किया कि जब अमेरिका और इजरायल ने 28 फरवरी को ईरान पर हमले शुरू किए, तब यूएई ने न केवल उन हमलों की निंदा नहीं की बल्कि आक्रमणकारियों को समर्थन और सुविधाएं भी उपलब्ध कराईं. ईरान के उप विदेश मंत्री काजेम गरीबाबादी ने यूएई पर हमला बोलते हुए कहा कि “जो देश आक्रमण में शामिल रहा हो, उसे ईरान पर आरोप लगाने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है.”

गरीबाबादी ने कहा, ”जब कोई देश आक्रमण करने वालों को सुविधाएं और मदद देता है, तो यह सिर्फ मदद नहीं होती, बल्कि खुद एक तरह की आक्रामकता होती है। इसलिए संयुक्त अरब अमीरात सिर्फ सहयोगी नहीं, बल्कि खुद एक आक्रामक पक्ष है.” गरीबाबादी ने 1974 के यूनाइटेड नेशंस जनरल असेंबली रेजोल्यूशन का हवाला देते हुए कहा कि हर वह लड़ाकू विमान जो संयुक्त अरब अमीरात से उड़ा है, उसका पूरा रिकॉर्ड मौजूद है. समय, तारीख और उड़ान का रास्ता तक दर्ज है.

ब्रिक्स बैठक के दौरान माहौल तब और गर्म हो गया जब ग़रीबाबादी ने खुलासा किया कि ईरान ने यूएई को पहले ही चेतावनी दी थी कि अगर उसकी जमीन या ठिकानों का इस्तेमाल ईरान के खिलाफ हुआ तो जवाबी कार्रवाई की जाएगी. उन्होंने दावा किया कि ईरान के पास यूएई से उड़ान भरने वाले हर फाइटर जेट का रिकॉर्ड मौजूद है, जिसमें समय, तारीख और रूट तक दर्ज हैं. ईरान ने यह भी कहा कि यूएई में मौजूद अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाना ‘आत्मरक्षा’ के अधिकार के तहत उठाया गया कदम था.

इस पूरे विवाद के बीच इजरायल के उस दावे ने आग में घी डालने का काम किया, जिसमें कहा गया था कि प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने युद्ध के दौरान यूएई का गोपनीय दौरा किया था. हालांकि, यूएई ने इस दावे को खारिज कर दिया, लेकिन ईरान लगातार यह आरोप दोहरा रहा है कि अबू धाबी, इजरायल और अमेरिका के साथ मिलकर ईरान को घेरने की रणनीति का हिस्सा बन चुका है.

तनावपूर्ण माहौल के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यूएई दौरा भी बेहद अहम माना जा रहा है. भारत एक तरफ ब्रिक्स मंच पर दोनों देशों के बीच बढ़ते टकराव को देख रहा है, वहीं दूसरी तरफ ऊर्जा सुरक्षा और खाड़ी क्षेत्र में अपने रणनीतिक हितों को संतुलित करने की चुनौती से भी जूझ रहा है.

पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच अब सवाल सिर्फ ईरान और इजरायल की जंग का नहीं रह गया है, बल्कि इस बात का भी है कि क्या यूएई धीरे-धीरे इस टकराव का खुला हिस्सा बनता जा रहा है. क्षेत्रीय मामलों के जानकारों का मानना है कि हाल के घटनाक्रमों ने इजरायल और यूएई के रिश्तों को लेकर कई नई आशंकाओं को जन्म दिया है.

इराक़ और ईरान मामलों पर नजर रखने वाले विश्लेषकों का कहना है कि युद्ध से पहले, युद्ध के दौरान और उसके बाद जिस तरह इजरायल और यूएई के बीच रणनीतिक तालमेल की खबरें सामने आईं, उससे ईरान का शक और गहरा हो गया है. अब तेहरान यह संदेश देने की कोशिश कर रहा है कि अगर भविष्य में दोबारा संघर्ष भड़का, तो यूएई सिर्फ दर्शक नहीं रहेगा बल्कि उसे सीधे तौर पर संघर्ष का हिस्सा माना जाएगा.

विशेषज्ञों का मानना है कि यूएई ने अब्राहम अकॉर्ड के जरिए इजरायल के साथ जिस तरह अपने रिश्तों को तेजी से मजबूत किया, उसने खाड़ी की रणनीतिक राजनीति को पूरी तरह बदल दिया. आलोचकों के मुताबिक, इस समझौते का असली उद्देश्य ईरान के खिलाफ एक अरब-इजरायल मोर्चा तैयार करना था और हालिया घटनाओं ने इस धारणा को और मजबूत किया है.

यूएई के लिए मुश्किल यह है कि उसका ईरान के साथ रिश्ता कभी उतना शत्रुतापूर्ण नहीं रहा, जितना इजरायल का है. दोनों पड़ोसी देश हैं और व्यापारिक व सामरिक स्तर पर लंबे समय से जुड़े रहे हैं. लेकिन इजरायल के साथ बढ़ती नजदीकियों ने अबू धाबी को ऐसे मोड़ पर ला खड़ा किया है, जहां वह ईरान के शक और गुस्से के केंद्र में आता दिख रहा है.

युद्ध के दौरान इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के कथित गुप्त यूएई दौरे और ‘आयरन डोम’ सुरक्षा सहयोग की खबरों ने भी इस बहस को और हवा दी. माना जा रहा है कि इजरायल खाड़ी देशों को अपनी सुरक्षा रणनीति के और करीब लाने की कोशिश कर रहा है, जबकि ईरान इसे अपने खिलाफ बन रहे नए क्षेत्रीय गठबंधन के तौर पर देख रहा है. अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर पश्चिम एशिया में दोबारा बड़ा संघर्ष शुरू होता है, तो क्या यूएई सिर्फ कूटनीतिक सहयोगी रहेगा या फिर सीधे रणनीतिक मोर्चे पर भी उतरता नजर आएगा.



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