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Rajasthan 1 000 year old Sahasra Bahu narayan temples or Sasbahu Temples history | राजस्थान का 1000 साल पुराना सहस्रबाहु मंदिर कैसे बन गया सास-बहू मंद

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1000 साल पुराना सहस्रबाहु मंदिर कैसे बन गया सास-बहू मंदिर? जानें असली वजह

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Sahasra Bahu Narayan Temples: भारत में वैसे तो कई मंदिर हैं, जो अपने रहस्य और चमत्कार के लिए प्रसिद्ध हैं लेकिन आज हम आपको एक ऐसे मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं, जो सास-बहू की वजह से प्रसिद्ध हैं. भगवान नारायण को समर्पित यह मंदिर राजस्थान के उदयपुर में स्थित हैं. यह मंदिर परिसर ना सिर्फ धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है बल्कि राजस्थान की प्राचीन वास्तुकला और कला को जीवंत रखने वाला एक जीता-जागता प्रमाण भी है.

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Sahastra Bahu Temples: देश-दुनिया में नारायण के दशावतार को समर्पित कई भव्य व प्राचीन मंदिर मिल जाएंगी, लेकिन राजस्थान के उदयपुर से मात्र 22 किलोमीटर दूर नागदा गांव में स्थित नारायण के ‘सहस्रबाहु’ अवतार को समर्पित एक ऐसा प्राचीन मंदिर है, जिसका नाम भी मजेदार है और हैरत में डालता है. ‘सास-बहू मंदिर’ ना सिर्फ अपनी वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि अपने अनोखे नाम के कारण भी लोगों की जिज्ञासा का विषय बना हुआ है. मंदिर की दीवारों पर रामायण के दृश्यों, देवी-देवताओं और दिव्य प्राणियों की सुंदर नक्काशी देखते ही बनती है. एएसआई ने इस पूरे परिसर को संरक्षित स्मारक घोषित किया है और यहां 360 डिग्री वर्चुअल टूर की सुविधा भी उपलब्ध कराई है.

1000 साल पुराना सास-बहू मंदिर
यह मंदिर भगवान विष्णु के सहस्रबाहु यानी हजार भुजाओं वाले स्वरूप को समर्पित है, लेकिन समय के साथ इसका नाम ‘सास-बहू’ मंदिर के रूप में प्रचलित हो गया. जानकारी के अनुसार इस भव्य मंदिर का निर्माण 10वीं शताब्दी के अंत में कच्छपघात राजवंश के राजा महिपाल और रत्नपाल द्वारा बनवाया गया था. लगभग 1000 वर्ष पुराना यह मंदिर ‘नागर’ वास्तुकला शैली का उत्कृष्ट नमूना है. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा संरक्षित यह स्थल अपनी बारीक नक्काशी, जटिल मूर्तिकला और शानदार वास्तुकला के लिए जाना जाता है.

भगवान विष्णु का सहस्रबाहु मंदिर
भारत सरकार के अतुल्य भारत पोर्टल पर मंदिर के नाम व निर्माण आदि के बारे में विस्तार से जानकारी मिलती है, जिसके अनुसार, मंदिर का मूल नाम ‘सहस्रबाहु’ था, जिसका अर्थ है ‘हजार भुजाओं वाला’. यह भगवान विष्णु के उस दिव्य स्वरूप को समर्पित है, जिसमें उन्हें हजार भुजाएं प्राप्त थीं. समय के साथ नाम का अपभ्रंश हो गया और उच्चारण में आसानी के कारण सहस्रबाहु नाम सरल भाषा में सास-बहू बन गया.

सास और बहू दोनों के अलग अलग मंदिर
परिसर में दो मुख्य मंदिर हैं बड़ा मंदिर ‘सास’ और छोटा मंदिर ‘बहू’ के नाम से जाना जाता है. ‘सास’ मंदिर के चारों ओर दस छोटे मंदिर हैं, जबकि ‘बहू’ मंदिर में पांच छोटे मंदिर स्थित हैं, जो वास्तुकला का अद्भुत नमूना भी कहा जाता है. मंदिर परिसर में प्रवेश करते ही पूर्व दिशा में बना सुंदर ‘मकर-तोरण’ ध्यान आकर्षित करता है. दोनों मंदिरों का लेआउट लगभग एक समान है. इनमें पंचरथ गर्भगृह, अंतराल, सभा-मंडप और बरामदा शामिल हैं. बाहरी दीवारों पर भगवान ब्रह्मा, शिव, विष्णु, राम, बलराम और परशुराम की मूर्तियां बनी हैं. दीवारों पर रामायण के दृश्यों, देवी-देवताओं और दिव्य प्राणियों की सुंदर नक्काशी देखते ही बनती है.

छोटा मंदिर विशेष रूप से आकर्षक
इसके अलावा, मंदिर परिसर के उत्तर-पूर्व में स्थित एक छोटा मंदिर विशेष रूप से आकर्षक है, जिस पर पत्थर का सुंदर शिखर बना हुआ है. छोटी-छोटी ताखों में ब्रह्मा, शिव और विष्णु की मूर्तियां स्थापित हैं. यह मंदिर परिसर ना सिर्फ धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है बल्कि राजस्थान की प्राचीन वास्तुकला और कला को जीवंत रखने वाला एक जीता-जागता प्रमाण भी है. यह पर्यटन के लिहाज से भी आकर्षक है और यहां बड़ी संख्या में पर्यटक आते हैं.

360 डिग्री वर्चुअल टूर की भी सुविधा
पहाड़ियों और खजूर के पेड़ों से घिरा यह स्थल बेहद शांत और मनमोहक वातावरण प्रदान करता है. खास बात है कि सास-बहू मंदिर एकलिंगजी मंदिर से लगभग 3 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. पास ही बघेला झील के किनारे अद्भुतजी शांतिनाथ जैन मंदिर भी है. एएसआई ने इस पूरे परिसर को संरक्षित स्मारक घोषित किया है और यहां 360 डिग्री वर्चुअल टूर की सुविधा भी उपलब्ध कराई है, जिससे दूर बैठे लोग भी इसकी भव्यता का आनंद ले सकते हैं.

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Parag SharmaChief Sub Editor

पराग शर्मा Hindi News18 Digital में Chief Sub Editor के पद पर कार्यरत हैं. वर्तमान में धर्म, ज्योतिष, ग्रह-नक्षत्र, राशि और वास्तु से जुड़ी खबरों पर काम कर रहे हैं. भारतीय धार्मिक परंपराओं, ज्योतिष शास्त्र, मेद…और पढ़ें





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