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गौशाला या क्रांतिकारियों का अड्डा? बेगूसराय की इस जगह का इतिहास कर देगा हैरान

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Historic gaushala in bihar : बिहार के बेगूसराय में बखरी की गौशाला 1944 में आजादी की लड़ाई को मजबूती देने के लिए बनी थीं. नाम था श्रीकृष्ण गौशाला. आज 250 गायों के पालन और दूध उत्पादन से यह गौशाला 50 से ज्यादा लोगों को रोजगार दे रही है, जबकि अपनी कमाई से 5 बीघा जमीन भी खरीद चुकी है.

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बेगूसराय : देशभक्ति की अगर मिसाल देखनी हो तो बिहार के बेगूसराय जिले के बखरी अनुमंडल में स्थित श्रीकृष्ण गौशाला की कहानी जरूर जाननी चाहिए. यह सिर्फ एक गौशाला नहीं, बल्कि आजादी की लड़ाई से लेकर आज के दौर में रोजगार और समाज सेवा तक की जीवंत पहचान बन चुकी है. वर्ष 1944 में जब देश अंग्रेजों की गुलामी झेल रहा था, तब इलाके के किसानों, समाजसेवियों और स्वतंत्रता सेनानियों ने मिलकर इस गौशाला की स्थापना की थी.

उस दौर में लोगों ने करीब 10 बीघा जमीन दान में दी थी ताकि यहां से होने वाली आय को अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन और स्वतंत्रता सेनानियों की मदद में लगाया जा सके. इस गौशाला के निर्माण का सपना सिर्फ देशभक्ति का पूरा नहीं हुआ बल्कि आधुनिक भारत की मिसाल बन गया, देखिए

अंग्रेजों को भगाने के लिए बनाई गई थी गौशाला
स्थानीय लोगों कमेटी के सदस्य जानकार के द्वारा लोकल 18 पर बताया गया उस समय यह जगह सिर्फ गौपालन तक सीमित नहीं थी. यहां स्वतंत्रता सेनानी बैठकी करते थे और अंग्रेजों के खिलाफ रणनीति तैयार की जाती थी. गौशाला से होने वाली कमाई का हिस्सा आंदोलन में खर्च किया जाता था. यही वजह है कि आज भी इलाके के लोग इसे सिर्फ गौशाला नहीं, बल्कि देशभक्ति की निशानी मानते हैं.
हमें बताया गया उतार-चढ़ाव के बावजूद यह संस्था लगातार चलती रही. पिछले 15 से 20 वर्षों में यहां तेजी से विकास हुआ है और अब यह इलाके की पहचान बन चुकी है.

250 गायों के सहारे दर्जनों परिवारों का चल रहा घर
आज श्रीकृष्ण गौशाला में करीब 250 गायों का पालन हो रहा है. यहां रोजाना 50 से 100 लीटर तक दूध उत्पादन होता है. दूध बिक्री और गौपालन से होने वाली कमाई से न सिर्फ गौशाला का संचालन होता है, बल्कि यहां काम करने वाले लोगों का घर भी चलता है. गौशाला में काम कर रहे 60 वर्षीय रामविलास ने बताया कि वह वर्ष 1989 से यहां जुड़े हुए हैं. जब उन्होंने काम शुरू किया था तब उन्हें मात्र 450 रुपए वेतन मिलता था, लेकिन आज उनकी आय 10 हजार रुपए तक पहुंच चुकी है. उनका कहना है कि यह गौशाला सिर्फ रोजगार नहीं, बल्कि परिवार की तरह है. हाल ही में यहां काम शुरू करने वाले विजय कुमार पोद्दार ने बताया कि सीजन में 100 लीटर से ज्यादा दूध उत्पादन होता है. उन्होंने कहा कि यहां काम करके लोगों को स्थायी रोजगार का सहारा मिल रहा है.

कमाई से खरीदी गई 5 बीघा जमीन
सबसे खास बात यह है कि गौशाला ने आजादी के बाद अपनी कमाई से अब तक 5 बीघा से ज्यादा जमीन खरीद शहरों में खरीद ली है. यह अपने आप में बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है. स्थानीय लोग बताते हैं कि यदि कमेटी और प्रशासनिक स्तर पर और बेहतर ध्यान दिया जाए तो यह गौशाला आने वाले समय में और बड़ी पहचान बन सकती है. आज के समय में कमाई का ऑडिट हो तो और ही बड़ा पहचान बनाएगी.

आजादी की लड़ाई में योगदान देने वाली यह गौशाला आज भी समाज सेवा, गौपालन और रोजगार के जरिए लोगों के जीवन में नई उम्मीद जगा रही है. यही वजह है कि बखरी की यह कहानी अब पूरे बिहार के लिए गर्व का विषय बनती जा रही है.

About the Author

Amit Singh

7 वर्षों से पत्रकारिता में अग्रसर. इलाहबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स इन जर्नालिस्म की पढ़ाई. अमर उजाला, दैनिक जागरण और सहारा समय संस्थान में बतौर रिपोर्टर, उपसंपादक औऱ ब्यूरो चीफ दायित्व का अनुभव. खेल, कला-साह…और पढ़ें



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