आज के समय में कम उम्र में बच्चों को चश्मा लगने की समस्या तेजी से बढ़ रही है. इसकी सबसे बड़ी वजह मायोपिया (निकट दृष्टिदोष) के मामलों में लगातार हो रही वृद्धि है. इसी चिंता को देखते हुए ऑल इंडिया ऑप्थैल्मोलॉजिकल सोसायटी (AIOS) ने विश्व मायोपिया सप्ताह 2026 के दौरान बच्चों में मायोपिया की रोकथाम और उपचार के लिए नए राष्ट्रीय दिशा-निर्देश जारी किए है. इन दिशानिर्देशों का उद्देश्य डॉक्टरों, अभिभावकों, शिक्षकों और हेल्थकेयर प्रोफेशनल्स को बच्चों की आंखों की बेहतर देखभाल के लिए सही और व्यावहारिक जानकारी उपलब्ध कराना है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि मायोपिया की समय पर पहचान और सही प्रबंधन नहीं किया गया तो आगे चलकर यह गंभीर नेत्र रोगों का कारण बन सकता है. हाई मायोपिया की स्थिति में रेटिना डिटैचमेंट, ग्लूकोमा, मोतियाबिंद और स्थायी दृष्टि हानि का खतरा काफी बढ़ जाता है.
बच्चों में तेजी से बढ़ रही है मायोपिया की समस्या
हालिया रिपोर्ट्स के अनुसार वर्ष 2050 तक दुनिया की लगभग आधी आबादी मायोपिया से प्रभावित हो सकती है. भारत में भी स्कूल जाने वाले बच्चों के बीच इसके मामले तेजी से बढ़ रहे है. शहरी क्षेत्रों में मायोपिया के मामले लगभग 14 प्रतिशत तक पहुंच गए है, जबकि ग्रामीण इलाकों में भी इसकी संख्या लगातार बढ़ रही है.
13 शहरों और 12 राज्यों में किए गए एक स्कूल स्क्रीनिंग कार्यक्रम के दौरान 1,00,000 से अधिक बच्चों की आंखों की जांच की गई. इसमें लगभग 13.6 प्रतिशत बच्चों में मायोपिया पाया गया, जबकि 27 प्रतिशत बच्चों में अन्य नेत्र संबंधी समस्याएं मिली. जिनके लिए डॉक्टर की सलाह आवश्यक थी.
बदलती लाइफस्टाइल और स्क्रीन टाइम बड़ी वजह विशेषज्ञों के मुताबिक बच्चों में मायोपिया बढ़ने के पीछे बदलती जीवनशैली अहम भूमिका निभा रही है. लंबे समय तक मोबाइल, लैपटॉप और टीवी स्क्रीन देखना, बाहर खेलने का समय कम होना, पढ़ाई का बढ़ता दबाव और लगातार नजदीक से पढ़ना आंखों पर अतिरिक्त तनाव डाल रहे है. कई बच्चे रोजाना 4 से 6 घंटे या उससे भी ज्यादा समय स्क्रीन के सामने बिता रहे है. जिससे उनकी आंखों पर बोझ बढ़ रहा है.
AIOS के महत्वपूर्ण सुझाव
AIOS ने बच्चों की आंखों को सुरक्षित रखने के लिए कुछ सरल लेकिन जरूरी उपाय सुझाए है. हर साल बच्चों की आंखों की जांच अवश्य कराएं. पढ़ाई के दौरान उचित दूरी और पर्याप्त रोशनी का ध्यान रखें. मनोरंजन के लिए स्क्रीन टाइम को सीमित करें. बच्चों को रोज कम से कम 2 घंटे आउटडोर गतिविधियों के लिए प्रोत्साहित करें और 20-20-20 नियम अपनाएं. हर 20 मिनट बाद 20 सेकंड का ब्रेक लें और 20 फीट दूर किसी वस्तु को देखें.
इलाज संभव, लेकिन सतर्कता सबसे जरूरी
विशेषज्ञों का कहना है कि एट्रोपिन आई ड्रॉप्स, मायोपिया कंट्रोल चश्मे, ऑर्थोकेराटोलॉजी और मल्टीफोकल कॉन्टैक्ट लेंस जैसे विकल्प मायोपिया की प्रगति को धीमा कर सकते है. लेकिन इसे पूरी तरह रोक नहीं सकते. इसलिए इनका उपयोग केवल विशेषज्ञ नेत्र चिकित्सक की सलाह से ही किया जाना चाहिए.
विशेषज्ञ मानते है कि बच्चों की दृष्टि की सुरक्षा के लिए परिवार, स्कूल और हेल्थकेयर सिस्टम को मिलकर काम करना होगा. ताकि समय पर पहचान और सही इलाज के जरिए बच्चों की आंखों की रोशनी को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सके.


