Last Updated:
Kota Famous temple: कोटा का 850 साल पुराना छोटी समाध शिव मंदिर सिर्फ धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि संत परंपरा और चमत्कारों की अनोखी मिसाल माना जाता है. चंबल किनारे स्थित इस मंदिर से जुड़ी पानी के घी बनने की कथा आज भी लोगों की आस्था को मजबूत करती है.
कोटा. चंबल नदी के किनारे स्थित कोटा का करीब 850 साल पुराना प्राचीन शिव मंदिर, जिसे छोटी समाध के नाम से भी जाना जाता है, शहर के प्रमुख आध्यात्मिक स्थलों में गिना जाता है. यह मंदिर आस्था, संत परंपरा और चमत्कारों का अनोखा संगम माना जाता है. खास बात यह है कि यह शिव मंदिर संतों की समाधियों के ऊपर बना हुआ है, इसलिए यहां आने वाले श्रद्धालु इसे बेहद दिव्य और आध्यात्मिक स्थान मानते हैं. मंदिर परिसर में प्रवेश करते ही लोगों को शांति और सकारात्मक ऊर्जा का अनुभव होता है.
मंदिर के पुजारियों के अनुसार यहां विराजमान आशागिरी जी महाराज एक तपस्वी संत थे. उन्होंने अपने जीवन में न तो अपने लिए कोई मंदिर बनवाया और न ही कोई छतरी बनवाई. हालांकि उन्होंने अपने शिष्यों की समाधियों के ऊपर मंदिर और छतरियां जरूर बनवाईं. पुजारियों का कहना है कि आशागिरी जी महाराज ने सादगी और तपस्या का जीवन जिया, इसलिए उन्होंने स्वयं के लिए किसी विशेष निर्माण की इच्छा नहीं जताई.
संत परंपरा और आस्था का प्रमुख केंद्र
यह मंदिर शिव संप्रदाय और जिंदल समाज की आस्था का प्रमुख केंद्र माना जाता है. यहां गुरु आशागिरी जी महाराज, मंडागिरी जी महाराज और मोकम जी महाराज सहित कई संतों की समाधियां बनी हुई हैं. आशागिरी जी महाराज के शिष्यों की समाधियां भी मंदिर परिसर में स्थापित हैं, जहां श्रद्धालु विशेष पूजा-अर्चना करते हैं.
मंदिर को लेकर लोगों में गहरी मान्यता है कि यहां सच्चे मन से मांगी गई हर मनोकामना पूरी होती है. शादी-विवाह, संतान सुख और परिवार की खुशहाली की कामना लेकर दूर-दूर से श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं. सावन महीने में यहां बड़ा मेला भरता है, जहां रात 12 बजे तक शिव अभिषेक चलता रहता है. महाशिवरात्रि के अवसर पर मंदिर को फूलों और रोशनी से सजाया जाता है और विशेष धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं.
चंबल के पानी से घी बनने की कथा
मंदिर से जुड़ी एक चमत्कारी कथा आज भी श्रद्धालुओं की आस्था को और मजबूत करती है. बताया जाता है कि एक बार भंडारे के दौरान घी कम पड़ गया था. तब गुरुजी ने चंबल नदी से पानी लाने को कहा. जब उस पानी को कढ़ाई में डाला गया तो वह घी में बदल गया और पूरा भंडारा संपन्न हुआ. बाद में उतनी ही मात्रा में घी चंबल नदी में अर्पित किया गया. श्रद्धालु आज भी इस घटना को गुरुजी के चमत्कार के रूप में याद करते हैं.
मंदिर में प्रतिदिन सुबह 5 बजे और शाम 7:30 से 8 बजे तक आरती होती है. सामान्य दिनों में भी यहां 100 से 200 श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं, जबकि सावन में भक्तों की संख्या कई गुना बढ़ जाती है.
मंदिर की सेवा से जुड़े सत्य प्रकाश शर्मा, जिन्हें लोग “माइकल बाबा” के नाम से जानते हैं, बताते हैं कि उनके परिवार की यहां पिछले 70 से 80 वर्षों से सेवा रही है. उनके नाना-नानी माधोलाल जी और जमुनाबाई जी भी मंदिर सेवा से जुड़े रहे थे. उनका कहना है कि बचपन से ही उन्होंने इस मंदिर में संतों की साधना, श्रद्धालुओं की आस्था और कई अद्भुत अनुभवों को करीब से देखा है.
यह प्राचीन शिव मंदिर आज भी कोटा की आध्यात्मिक धरोहर के रूप में लोगों की आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है.
About the Author
आनंद पाण्डेय वर्तमान में News18 हिंदी (राजस्थान डिजिटल) में बतौर कंटेंट प्रोड्यूसर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. पिछले 5 वर्षों से सक्रिय पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाते हुए उन्होंने राजनीति, अपराध और लाइफ…और पढ़ें


