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सिंधु नदी का गेम ओवर, अब चेनाब का पानी मोड़ेगा भारत! बना रहा सीक्रेट टनल, 2600 करोड़ के दो प्रोजेक्ट शुरू

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नई दिल्ली: सिंधु जल समझौते को होल्ड (In Abeyance) पर रखने के बाद भारत ने चेनाब नदी प्रणाली पर दो बेहद महत्वपूर्ण इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स का काम तेज कर दिया है. नेशनल हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर कॉरपोरेशन (NHPC) के इन दोनों प्रोजेक्ट्स की कुल लागत लगभग 2,600 करोड़ रुपये है. इसके तहत पहला काम हिमाचल प्रदेश के लाहौल-स्पीति में एक बड़ी इंटर-बेसिन वाटर डायवर्जन टनल बनाने का है. दूसरा प्रोजेक्ट जम्मू-कश्मीर के सलाल बांध की परिचालन क्षमता को वापस पाने के लिए गाद प्रबंधन (Sediment Management) से जुड़ा है. ये दोनों प्रोजेक्ट्स भारत के जल अधिकारों के बेहतर इस्तेमाल के लिहाज से गेमचेंजर माने जा रहे हैं.

लाहौल-स्पीति में बनने वाली 2,352 करोड़ रुपये की चेनाब-ब्यास लिंक टनल परियोजना क्या है?

इस पूरे प्लान में सबसे बड़ा हिस्सा लाहौल-स्पीति में बनने वाली चेनाब-ब्यास लिंक टनल प्रोजेक्ट का है. इस प्रोजेक्ट पर करीब 2,352 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे.

योजना के तहत लगभग 8.7 किलोमीटर लंबी एक टनल बनाई जाएगी. इस टनल का मुख्य उद्देश्य चेनाब बेसिन के अतिरिक्त पानी को मोड़कर ब्यास नदी प्रणाली में पहुंचाना है. यह प्रोजेक्ट एक बड़े इंटर-बेसिन रिवर-लिंकिंग अभियान का हिस्सा है.

पहले फेज में लाहौल घाटी में नदी पर एक 19 मीटर ऊंचा बराज (Barrage) बनाने का भी प्रस्ताव है. इसके जरिए चेनाब की सहायक चंद्रा नदी के पानी को हाइड्रोलिक स्ट्रक्चर और टनल की मदद से ब्यास बेसिन की तरफ डायवर्ट किया जाएगा. यह पूरा इलाका चीन और सामरिक दृष्टि से बेहद संवेदनशील माना जाता है.

सलाल हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट पर 268 करोड़ रुपये की लागत से क्या बदलाव होने जा रहा है?

हिमाचल प्रदेश के अलावा जम्मू-कश्मीर में भी चेनाब नदी से जुड़ा एक और अहम प्रोजेक्ट शुरू हुआ है.

  1. रियासी जिले में स्थित सलाल हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट पर एनएचपीसी 268 करोड़ रुपये खर्च करने जा रही है. यहां एक नया डायवर्जन-कम-सेडिमेंट बाईपास टनल (गाद निकालने वाली टनल) बनाया जाएगा.
  2. दरअसल, पहाड़ों से बहकर आने वाली मिट्टी और मलबे के कारण सलाल बांध के जलाशय में भारी गाद जमा हो चुकी है. एक सर्वे के अनुसार, इस गाद की वजह से सलाल जलाशय की वाटर स्टोरेज क्षमता घटकर सिर्फ 5% रह गई है.
  3. गाद जमा होने से बिजली बनाने वाले टर्बाइनों की लाइफ और क्षमता दोनों पर बुरा असर पड़ता है. यह नई टनल जरूरत पड़ने पर पानी को मोड़ने और जलाशय में जमा गाद को बाहर निकालने का काम करेगी.

सलाल बांध की पुरानी गलतियों को सुधारने के लिए नई टनल क्यों जरूरी हो गई थी?

सलाल बांध के इतिहास में गाद प्रबंधन को लेकर एक बड़ा विवाद रहा है. दशकों पहले जब इस बांध का निर्माण हो रहा था, तब सिंधु जल समझौते के तहत पाकिस्तान की आपत्तियों के बाद बांध के निचले हिस्से में मौजूद स्लुइस (गाद निकालने वाले गेट) को कंक्रीट से बंद कर दिया गया था.

भारतीय विशेषज्ञों का हमेशा से मानना था कि इस बदलाव के कारण बांध की गाद साफ करने की क्षमता पूरी तरह खत्म हो गई. अब बनने वाली नई बाईपास टनल इसी पुरानी कमी को दूर करेगी. यह टनल बांध को बिना कोई नुकसान पहुंचाए गाद को बाहर फ्लश करने का रास्ता देगी. इससे सलाल पावर स्टेशन की बिजली उत्पादन क्षमता में भारी सुधार होगा और इंफ्रास्ट्रक्चर की उम्र भी बढ़ जाएगी.

फैसले की टाइमिंग का रणनीतिक महत्व भी है

इन दोनों प्रोजेक्ट्स की टाइमिंग रणनीतिक नजरिए से बहुत मायने रखती है. साल 1960 में हुए सिंधु जल समझौते के तहत भारत को पूर्वी नदियों (रावी, ब्यास, सतलुज) पर पूरा अधिकार मिला था, जबकि पश्चिमी नदियों (सिंधु, झेलम, चेनाब) का पानी पाकिस्तान को दिया गया था. हालांकि, भारत के पास इन पश्चिमी नदियों पर बिना पानी रोके रन-ऑफ-द-रिवर बिजली प्रोजेक्ट बनाने का अधिकार हमेशा से रहा है.

पिछले साल पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारत ने इस समझौते को होल्ड पर डालने का कड़ा रुख अपनाया था. अब इन प्रोजेक्ट्स के जरिए भारत यह साफ संदेश दे रहा है कि वह अपने हिस्से के पानी की एक-एक बूंद का पूरा इस्तेमाल करेगा. पानी को मोड़ने और गाद प्रबंधन की इस तैयारी पर पाकिस्तान की भी पैनी नजर बनी हुई है.



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