संसद में अगले कुछ दिनों में भारतीय राजनीति का एक नया अध्याय लिखा जा रहा है. अब महिलाएं केवल परिवार के पुरुष की राय पर नहीं, बल्कि अपने व्यक्तिगत आर्थिक हितों पर वोट डाल रही हैं. मध्य प्रदेश 2023 चुनाव में भाजपा ने ‘लाड़ली बहन’ योजना के जरिए 1250 रुपये का वादा किया, जिससे भाजपा का वोट शेयर 41.1% से उछलकर 50.2% तक पहुंच गया. पार्टी को 163 सीटें मिलीं.
क्या कहते हैं मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के आंकड़े?
महाराष्ट्र चुनाव 2024 में 1500 रुपये प्रति माह की योजना ने एनडीए को लोकसभा की 0.5% की बढ़त से उठाकर विधानसभा में 14% की प्रचंड बढ़त दिला दी, जिससे गठबंधन 200 के पार पहुंच गया.
इन आंकड़ों ने साबित कर दिया है कि ‘प्रत्यक्ष नकद हस्तांतरण’ जाति और धर्म की सीमाओं को काटकर महिलाओं को एक साझा आर्थिक मंच पर ला खड़ा करता है.
बंगाल में ‘लक्ष्मी भंडार’ बनाम भाजपा का ‘मास्टरस्ट्रोक’
ममता बनर्जी की ‘लक्ष्मी भंडार’ योजना ने पिछले कई चुनावों में टीएमसी की नैया पार कराई है. 1000 रुपये प्रतिमाह पाने वाली महिलाएं ममता का सबसे मजबूत वोट बैंक बनी हुई हैं. लेकिन भाजपा ने अब सीधे ‘तीन गुना’ राशि का वादा कर इस किले को चुनौती दी है. 3000 रुपये का वादा केवल एक वित्तीय प्रलोभन नहीं है, यह टीएमसी के खिलाफ एक स्पष्ट ‘आर्थिक तुलनात्मक’ संदेश है. ममता बनर्जी द्वारा फरवरी 2026 में राशि बढ़ाने की घोषणा यह दर्शाती है कि टीएमसी खेमे में भी भाजपा के इस दांव को लेकर भारी दबाव है.
युवाओं और महिलाओं का ‘कॉम्बो पैक’
भाजपा ने केवल महिलाओं को ही नहीं, बल्कि बेरोजगार युवाओं को भी 3000 रुपये का वादा करके एक ‘युवा-महिला’ कंबाइंड वोट बैंक तैयार करने की कोशिश की है. बंगाल में बेरोजगारी एक बड़ा मुद्दा रहा है, और यह वादा दोनों समूहों की आर्थिक चिंताओं को एक साथ संबोधित करता है. इसके अलावा, भाजपा के संकल्प पत्र में ‘दुर्गा सुरक्षा’ स्क्वॉड और महिला पुलिस थानों का वादा महिलाओं को यह संदेश देने की कोशिश है कि पार्टी उनके बैंक-बैलेंस के साथ-साथ उनके सम्मान की भी रक्षा करेगी.
सीटों का जादुई गणित और 50% का लक्ष्य
विशेषज्ञ मानते हैं कि बंगाल में पूर्ण बहुमत के लिए किसी भी पार्टी को 48-50% वोट शेयर की जरूरत होगी. 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा 45% के करीब थी, लेकिन सीटों में तब्दील नहीं कर पाई. यदि महिला केंद्रित योजनाएं उन्हें 6-9% अतिरिक्त वोट दिलाती हैं, तो भाजपा आसानी से 160-170 सीटों के जादुई आंकड़े को पार कर जाएगी. यह वह बिंदु होगा जहाँ बंगाल में ‘ममता युग’ का अवसान और ‘भाजपा युग’ का उदय हो सकता है.
बंगाल की राजनीति अब जाति, धर्म या पहचान के इर्द-गिर्द नहीं, बल्कि महिलाओं की ‘आर्थिक आजादी’ के इर्द-गिर्द घूम रही है. राजनीति का यह नया गणित सरल है: ‘जो उनकी आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित करेगा, वही सत्ता संभालेगा.’ 4 मई के परिणाम बताएंगे कि क्या बंगाल की महिलाएँ ममता बनर्जी की पुरानी योजनाओं पर विश्वास करती हैं, या भाजपा के 3000 रुपये के वादे पर अपनी मुहर लगाती हैं. बंगाल का यह चुनाव इस नई राजनीतिक संस्कृति की अंतिम परीक्षा है.
पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव में इस बार चुनावी रणनीति का केंद्रबिंदु हैं महिला मतदाता. राज्य की कुल आबादी में तकरीबन आधी महिलाएं हैं. मतदाता सूची में उनका अनुपात लगातार बढ़कर पुरुषों के बराबर पहुंच गया है. ऐसे में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा जारी भाजपा के ‘संकल्प पत्र’ में महिलाओं के लिए 3000 रूपये मासिक कैश ट्रांसफर की घोषणा कोई संयोग नहीं, बल्कि एक सुनियोजित चुनावी रणनीति है. पिछले दो वर्षों में हुए विधानसभा चुनावों के आंकड़े बताते हैं कि जिन पार्टियों ने महिलाओं को प्रत्यक्ष नकद लाभ देने का वादा किया, उन्होंने ने ही सत्ता हासिल की. इसे देखते हुए भाजपा ने बंगाल में सत्ता की चाबी पाने के लिए ‘कैश बेनिफिट’ का आजमाया हुआ राजनीतिक प्रयोग किया है.


