India-Korea Relations and General KS Thimayya Role: दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली जे म्युंग तीन दिवसीय भारत दौर पर हैं. सोमवार को पीएम नरेंद्र मोदी के साथ शिखर वार्ता में दोनों देशों के बीच कई अहम समझौते हुए. लेकिन, इस कहानी में हम आज के दौरे की नहीं बल्कि भारत और कोरियाई प्रायद्वीप के बीच रिश्तों के इतिहास को खंगालने की कोशिश करेंगे. आज हम एक करीब आठ दशक पहले की एक कहानी सुनाते हैं. उस वक्त देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने कोरियाई प्रायद्वीप में भड़की जंग को सुलझाने के लिए उस वक्त शीर्ष सैन्य अधिकारी रहे जनरल केएस थिमैया को युद्धक्षेत्र में भेजा था.
दरअसल, कोरियाई प्रायद्वीप में 1950-53 के बीच छिड़ा खूनी युद्ध दुनिया को परमाणु संघर्ष की कगार पर ले आया था. संयुक्त राष्ट्र की सेनाएं मुख्यतः अमेरिका के नेतृत्व में और उत्तर कोरिया-चीन की सेनाओं के बीच सीधी भिड़ंत हो रही थी. युद्धविराम की बातें चल रही थीं, लेकिन एक बड़ा अड़ंगा था करीब 22,000 से 25,000 युद्धबंदी जो अपने देश वापस नहीं जाना चाहते थे. उत्तर कोरिया और चीन जबरन वापसी की मांग कर रहे थे, जबकि कई युद्धबंदी कम्युनिस्ट शासन से बचना चाहते थे. इस जटिल समस्या को सुलझाने का प्रस्ताव भारत के प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने दिया. उन्होंने न्यूट्रप नेशन्स रिपैट्रिएशन कमिशन (NNRC) बनाने का सुझाव रखा, जिसमें तटस्थ देशों के प्रतिनिधित्व हों. इस प्रस्ताव पर दोनों पक्ष सहमत हुए, लेकिन शर्त थी कि भारत इस आयोग की अध्यक्षता करे.
नेहरू ने थिमैया को भेजा
नेहरू ने इस जिम्मेदारी के लिए भारतीय सेना के दिग्गज कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल केएस थिमैया को चुना. थिमैया कुमाऊं रेजिमेंट से थे, द्वितीय विश्व युद्ध में ब्रिगेड कमांड करने वाले पहले भारतीय अधिकारी थे. वह 1947-48 में कश्मीर में जोजीला पास की लड़ाई के नायक थे. नेहरू ने उन्हें यह असंभव सा लगने वाला मिशन सौंपा.
27 जुलाई 1953 को कोरियाई युद्धविराम समझौता हुआ. NNRC की अध्यक्षता थिमैया को सौंपी गई. भारत ने कस्टोडियन फोर्स ऑफ इंडिया (CFI) भेजी. इमसें करीब 6,000 सैनिक थे. इसका नेतृत्व मेजर जनरल एसपीपी थोरात कर रहे थे. ये सैनिक केवल हल्के हथियार लेकर गए थे. उनका काम लड़ना नहीं, बल्कि युद्धबंदियों की सुरक्षा करना और उन्हें स्वतंत्र फैसला लेने देना था.
उस वक्त के दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति भारत की तटस्थ नीति से नाराज थे. उन्होंने CFI को अपने क्षेत्र में उतरने की अनुमति नहीं दी. नतीजतन, अमेरिकी हेलिकॉप्टरों से भारतीय सैनिकों को सीधे डिमिलिटराइज्ड जोन (DMZ) में उतारा गया. वहां भारतीयों ने अपना कैंप बनाया, जिसका नाम रखा गया — हिंद नगर. हिंद नगर एक बारूद का ढेर था. करीब 22,000 युद्धबंदी वहां रखे गए. शिविरों में प्रो-कम्युनिस्ट और एंटी-कम्युनिस्ट गुटों के बीच बार-बार दंगे होते थे. इस दौरान युद्धबंदियों के मूल देशों के प्रतिनिधि उन्हें समझाते कि क्यों वापस लौटना चाहिए, लेकिन यह बातचीत अक्सर हिंसक रूप ले लेती थी. पत्थरबाजी, चीख-पुकार और हमले आम थे.
थिमैया की हर तरफ हुई प्रशंसा
थिमैया की व्यक्तिगत बहादुरी किंवदंती बन गई. कई बार वे हथियारबंद भीड़ के बीच बिना हथियार के घुस जाते. एक प्रसिद्ध घटना में हजारों कैदियों की भीड़ उग्र विद्रोह करने को तैयार थी. थिमैया बीच में जाकर बैठ गए और शांतिपूर्वक बात करते रहे, जब तक तनाव कम नहीं हो गया. मेजर जनरल थोरात ने भी एक बार बिना हथियार के विद्रोही शिविर में घुसकर एक भारतीय अधिकारी को छुड़ाया. भारतीय सैनिकों ने जबरदस्त अनुशासन और संयम दिखाया. उन्होंने गोली चलाने से परहेज किया, भले ही अपनी जान खतरे में हो. इस मिशन के दौरान भारत ने सच्ची तटस्थता का परिचय दिया. दोनों पक्षों पर दबाव झेलते हुए थिमैया और उनकी टीम ने युद्धबंदियों को उनके अधिकार बताए. 120 दिनों के बाद अधिकांश युद्धबंदियों ने अपना फैसला ले लिया. एनएनआरसी का कार्यकाल फरवरी 1954 में समाप्त हुआ. लेकिन 88 युद्धबंदी (74 उत्तर कोरियाई, 12 चीनी और 2 दक्षिण कोरियाई) अभी भी अनिर्णीत थे. वे न तो अपने देश जाना चाहते थे और न ही किसी अन्य पक्ष के साथ रहना. भारत की मानवीय पहल के तहत नेहरू सरकार ने इन 88 लोगों को भारत ले आई. उन्हें दिल्ली के लाल किले में रखा गया. बाद में अधिकांश ब्राजील, अर्जेंटीना और अन्य तटस्थ देशों में बस गए, जबकि कुछ भारत में ही रह गए, शादी की और भारतीय समाज में घुल-मिल गए.
जनरल थिमैया भारत लौटे तो नायक बनकर. अमेरिकी राष्ट्रपति ड्वाइट आइजनहावर ने उनकी प्रशंसा की और कहा कि हाल के वर्षों में किसी सैन्य इकाई ने इतना नाजुक मिशन नहीं संभाला. इस सफलता ने साबित किया कि नया स्वतंत्र भारत बिना किसी पक्ष लिए भी वैश्विक मंच पर नेतृत्व कर सकता है. यह नॉन-एलाइनमेंट नीति की व्यावहारिक और नैतिक ताकत का प्रतीक बना. आज भी दक्षिण कोरिया में थिमैया को सम्मान दिया जाता है. इंडो-कोरियन फ्रेंडशिप पार्क में उनकी प्रतिमा है. हाल के वर्षों में दक्षिण कोरिया के राजदूत और उच्च अधिकारी वहां जाकर श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं. यह भारत-दक्षिण कोरिया के बीच गहरे ऐतिहासिक संबंधों की याद दिलाता है, जो युद्ध के बाद के मानवीय सहयोग से शुरू हुए.


