नई दिल्ली: भारत और यूरोप के रिश्तों में पिछले छह महीनों के दौरान जो तेजी आई है, उसने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है. अक्टूबर 2025 से मार्च 2026 के बीच कूटनीति के मैदान में ऐसी हलचल दिखी, जिसने इस पार्टनरशिप को ‘मोस्ट हैपनिंग’ बना दिया है. जानकारों का मानना है कि यह केवल व्यापारिक सौदा नहीं है. इसके पीछे अमेरिका के साथ दोनों पक्षों के बदलते समीकरण और दुनिया को मल्टीपोलर (बहुध्रुवीय) बनाने की एक गहरी सोच छिपी है. भारत अब यूरोप के लिए केवल एक मार्केट नहीं, बल्कि एक भरोसेमंद सुरक्षा और तकनीक पार्टनर बनकर उभरा है.
ब्रिटेन के साथ विजन 2035 और टेक्नोलॉजी का नया मेल
इस यात्रा का सबसे बड़ा आकर्षण टेक्नोलॉजी सिक्योरिटी इनिशिएटिव (TSI) रहा. दोनों देशों ने फिनटेक और डिजिटल बदलाव पर साथ काम करने का फैसला किया है. इसके अलावा, डिफेंस सेक्टर में भी बड़ी प्रगति हुई है. ब्रिटेन के कैरियर स्ट्राइक ग्रुप का भारत आना और रॉयल नेवी का ‘कोंकण’ अभ्यास इस बात का सबूत है कि समंदर में भी दोनों की ताकत साथ मिल रही है. शिक्षा के क्षेत्र में भी ब्रिटिश यूनिवर्सिटीज के कैंपस भारत में खुलने का रास्ता साफ हो गया है.
जर्मनी के साथ डिफेंस और सेमीकंडक्टर की डील कितनी अहम?
- जर्मनी के चांसलर ओलाफ शोल्ज के बाद फ्रेडरिक मर्ज़ की जनवरी 2026 की भारत यात्रा ने रिश्तों को नई ऊंचाई दी. जर्मनी और भारत के बीच द्विपक्षीय व्यापार अब 50 अरब डॉलर के पार पहुंच चुका है.
- यह भारत के ईयू के साथ होने वाले कुल व्यापार का 25 परसेंट से भी ज्यादा है. मर्ज़ की यात्रा के दौरान सबसे ज्यादा जोर सेमीकंडक्टर की वैल्यू चेन पर रहा.
- बेंगलुरु और अहमदाबाद में हुई मुलाकातों ने यह साफ कर दिया कि जर्मनी अब भारत को तकनीक के मामले में अपना सबसे बड़ा सहयोगी मानता है.
- गिफ्ट सिटी (GIFT City) में जर्मनी के ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर का खुलना एक मील का पत्थर है. दोनों देश अब डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग में भी हाथ मिला रहे हैं, जिससे भारत की निर्भरता अन्य देशों पर कम होगी.
ईयू के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट से क्या बदल जाएगा?
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा केंद्र बिंदु यूरोपीय संघ (EU) के टॉप लीडर्स उर्सुला वॉन डेर लेयेन और एंटोनियो कोस्टा की यात्रा रही. वे भारत के 77वें गणतंत्र दिवस पर मुख्य अतिथि थे. इसी दौरान 16वें भारत-ईयू शिखर सम्मेलन का आयोजन हुआ.
सबसे बड़ी खबर यह रही कि भारत-ईयू फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) की बातचीत पूरी हो गई है और यह 2026 के अंत तक लागू हो जाएगा.
दोनों पक्ष अब क्लासिफाइड इनफॉर्मेशन यानी गोपनीय जानकारी साझा करने के लिए भी एक फ्रेमवर्क तैयार कर रहे हैं. यह कदम चीन जैसे देशों के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है.
फ्रांस और भारत की ‘स्पेशल ग्लोबल स्ट्रेटेजिक पार्टनरशिप’ क्या है?
अब दोनों देश मिलकर डिफेंस प्लेटफॉर्म्स को डिजाइन और डेवलप करेंगे. इसका मतलब है कि अब हथियार सिर्फ खरीदे नहीं जाएंगे, बल्कि साथ मिलकर बनाए जाएंगे.
मैक्रों ने एआई इम्पैक्ट समिट में भी हिस्सा लिया. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और न्यूक्लियर एनर्जी के क्षेत्र में फ्रांस और भारत का सहयोग अब अगले लेवल पर पहुंच गया है.
जियोपॉलिटिक्स में बदलाव का यह कैसा संकेत है?
फिनलैंड के राष्ट्रपति अलेक्जेंडर स्टब ने हाल ही में रायसीना डायलॉग में जयशंकर की बात का समर्थन किया. उन्होंने माना कि दुनिया अब सिर्फ दो शक्तियों (अमेरिका और चीन) के भरोसे नहीं रह सकती. ट्रंप 2.0 की नीतियों और ग्लोबल अनिश्चितता ने यूरोप को भारत के करीब ला दिया है. आर्थिक और रणनीतिक हितों ने दोनों को यह समझने पर मजबूर कर दिया है कि मिलकर काम करना ही भविष्य की जरूरत है.
भविष्य की राह: क्या चुनौतियां अब भी बरकरार हैं?
हालांकि रिश्ते सुधर रहे हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि चुनौतियां खत्म हो गई हैं. यूक्रेन, चीन और मिडिल ईस्ट के मुद्दों पर अब भी दोनों के नजरिए में थोड़ा अंतर है. लेकिन अब फोकस उन बातों पर है जहां दोनों देश सहमत हैं. सेंटर फॉर सोशल एंड इकोनॉमिक प्रोग्रेस (CSEP) के जानकारों का कहना है कि यह एक ‘स्ट्रेटेजिक इन्फ्लेक्शन पॉइंट’ है.
अगले कुछ सालों में भारत और यूरोप की यह पार्टनरशिप दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण जोड़ियों में से एक होगी. व्यापार, डिफेंस, और क्लाइमेट चेंज जैसे बड़े मुद्दों पर इनका साथ आना एक नई ग्लोबल व्यवस्था की नींव रख रहा है. यह पार्टनरशिप न केवल भारत के आर्थिक विकास के लिए जरूरी है, बल्कि दुनिया में बैलेंस ऑफ पावर बनाए रखने के लिए भी अनिवार्य है.





