Tamilnadu Chunav News: तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव आते ही देश के कई हिस्सों में पोस्टर, बैनर, झंडे और वादों की बाढ़ आ जाती है. मुफ्त योजनाओं की घोषणाएं होती हैं. नेताओं के काफिले गांव-गांव घूमते हैं. लेकिन इसी लोकतांत्रिक शोर के बीच एक ऐसा गांव भी है, जो इस पूरी संस्कृति से अलग खड़ा है. तमिलनाडु के मदुरै जिले का ओथावीड़ गांव चुनावी प्रचार की उस परंपरा को चुनौती देता है, जहां वोट को प्रभावित करने के लिए हर हथकंडा अपनाया जाता है. यहां न कोई पोस्टर लगता है, न कोई बैनर, और न ही किसी तरह के फ्रीबीज स्वीकार किए जाते हैं. यह गांव दिखाता है कि लोकतंत्र में जागरूकता कैसी हो सकती है, जहां वोट न बिकता है और न ही भावनाओं को भड़काने वाले प्रचार से प्रभावित होता है.
TOI की रिपोर्ट के अनुसार ओथावीड़ गांव के लोग मानते हैं कि चुनाव व्यक्तिगत निर्णय है, जिसे किसी बाहरी प्रभाव से नहीं बदलना चाहिए. इसलिए यहां सख्त नियम बनाए गए हैं. नेता गांव में आकर प्रचार कर सकते हैं, लेकिन उन्हें अपने साथ लाए पोस्टर, झंडे और बैनर वापस लेकर जाना होता है. यह परंपरा सालों से जारी है और आज भी सख्ती से लागू होती है.
क्यों नहीं लगते पोस्टर-बैनर?
- इस गांव में सिर्फ राजनीतिक पोस्टर ही नहीं, बल्कि धार्मिक या निजी आयोजनों के पोस्टर भी नहीं लगाए जाते. अगर कोई ऐसा करता है तो गांव के बुजुर्ग तुरंत उसे हटवा देते हैं. गांव के बस स्टैंड पर इस नियम की जानकारी देने वाला नोटिस भी लगा हुआ है, ताकि बाहरी लोग भी इसे समझ सकें.
- गांव के लोगों का मानना है कि पोस्टर और बैनर लोगों के मन को प्रभावित करते हैं और एक तरह का दबाव बनाते हैं. इसलिए यहां यह सुनिश्चित किया गया है कि हर व्यक्ति बिना किसी बाहरी प्रभाव के अपनी पसंद का उम्मीदवार चुने. यहां तक कि जो लोग बाहर काम करते हैं और चुनाव के समय गांव लौटते हैं, वे भी इसी नियम का पालन करते हैं.
इस गांव में पोस्टर और बैनर क्यों बैन हैं?
गांव के लोग मानते हैं कि पोस्टर और बैनर चुनावी प्रचार का ऐसा माध्यम हैं, जो लोगों के फैसले को प्रभावित कर सकते हैं. इससे निष्पक्ष मतदान पर असर पड़ता है. इसलिए यहां किसी भी तरह के पोस्टर या बैनर की अनुमति नहीं है.
क्या नेता गांव में प्रचार नहीं कर सकते?
नेता गांव में आ सकते हैं और लोगों से मिलकर प्रचार कर सकते हैं. लेकिन उन्हें अपने साथ लाए सभी प्रचार सामग्री जैसे झंडे और बैनर वापस ले जाने होते हैं. गांव में कुछ भी छोड़ने की अनुमति नहीं है.
फ्रीबीज को क्यों मना किया जाता है?
फ्रीबीज को वोट खरीदने का एक तरीका माना जाता है. गांव के लोग इसे लोकतंत्र के खिलाफ मानते हैं. इसलिए यहां किसी भी तरह के उपहार या मुफ्त सामान को स्वीकार नहीं किया जाता.
क्या और भी गांव ऐसे नियम अपनाते हैं?
हां, मदुरै के अलावा विरुधुनगर, रामनाथपुरम और थेनी जिले के कुछ गांव भी इसी तरह के नियमों का पालन करते हैं, जहां चुनावी प्रचार को सीमित रखा जाता है.
लोकतंत्र का अनोखा मॉडल
- ओथावीड़ गांव का यह मॉडल लोकतंत्र की एक अलग तस्वीर पेश करता है. यहां राजनीति को निजी पसंद का विषय माना जाता है, न कि सार्वजनिक बहस का. गांव में चुनाव को लेकर कोई सार्वजनिक विवाद या बहस नहीं होती. पंचायत बैठकों में भी राजनीति पर चर्चा से बचा जाता है.
- इस मॉडल का सबसे बड़ा फायदा यह है कि गांव में आपसी भाईचारा बना रहता है. राजनीतिक मतभेद होने के बावजूद लोग एक-दूसरे के खिलाफ नहीं होते. चुनाव के बाद भी रिश्तों में कड़वाहट नहीं आती.
- इसी वजह से यह गांव आज देशभर में एक मिसाल बन चुका है. जब पूरे देश में चुनावी शोर अपने चरम पर होता है, तब यह गांव शांति और जागरूकता के साथ लोकतंत्र को जीता है.





