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कोई पूछने तक नहीं आया, रोती मां-पत्नी और बच्चों का भविष्य, पहलगाम हमले के एक साल बाद छलका मृतक IB अधिकारी मनीष के परिवार का दर्द

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रोहतास. (Pahalgam attack) 22 अप्रैल 2025 यह सिर्फ एक तारीख नहीं है बल्कि रोहतास के करगहर थाना क्षेत्र के अरुही गांव के एक परिवार के लिए ऐसा जख्म बन चुकी है जो वक्त के साथ भी भर नहीं पा रहा. जम्मू-कश्मीर के पहलगाम की शांत और खूबसूरत वादियों में उस दिन अचानक गोलियों की आवाज गूंजी थी और उसी हमले में हैदराबाद में तैनात इंटेलिजेंस ब्यूरो के अधिकारी मनीष रंजन सहित 26 लोगों की जिंदगी हमेशा के लिए थम गई.

मनीष रंजन अपने परिवार के साथ कश्मीर घूमने गए थे. एक खुशहाल पल, जो यादों में संजोया जाना था वही पल कुछ ही सेकंड में दर्दनाक हादसे में बदल गया. आतंकियों ने हमला किया और मनीष को उनकी पत्नी और बच्चों के सामने गोली मार दी गई. उस दिन न सिर्फ एक अधिकारी शहीद हुआ बल्कि एक परिवार का सहारा, एक मां का बेटा, एक पत्नी का जीवनसाथी और बच्चों का पिता उनसे छिन गया.

अब इस घटना को लगभग एक साल पूरा होने जा रहा है. लेकिन अरुही गांव में आज भी वक्त जैसे उसी दिन ठहर गया हो. Local 18 की टीम जब इस परिवार का हाल जानने गांव पहुंची तो हर चेहरे पर दर्द साफ झलक रहा था.

रोती मां, बेहोश होती पत्नी और बच्चों का भविष्य
मनीष रंजन के चाचा अरविंद कुमार मिश्रा ने बातचीत में बताया कि पूरा परिवार आज भी उस सदमे से उबर नहीं पाया है. घर का माहौल आज भी गमगीन रहता है. मनीष परिवार के सबसे बड़े बेटे थे और उनकी कमी हर पल महसूस होती है. उनकी मां का हाल आज भी बेहद खराब है, वो अक्सर रोते-रोते टूट जाती हैं. एक मां के लिए अपने बेटे को इस तरह खो देना शायद सबसे बड़ा दर्द होता है.

मनीष की पत्नी की स्थिति भी सामान्य नहीं हो पाई है. वह अब भी बार-बार बेहोश हो जाती हैं और लगातार उनकी काउंसलिंग कराई जा रही है. इस दर्दनाक घटना को उनके बच्चों ने अपनी आंखों से देखा था और यही वजह है कि वे भी गहरे सदमे में चले गए. इसका असर उनकी पढ़ाई पर साफ देखा जा रहा है, उनका बचपन जैसे अचानक बोझिल हो गया है.

अपने ही राज्य ने बेटे को भुला दिया
परिवार ने सरकारों के रवैये को लेकर भी अपनी पीड़ा जाहिर की. उन्होंने बताया कि पश्चिम बंगाल, असम, झारखंड समेत कई राज्यों की सरकारों और केंद्र सरकार ने संवेदना जताई और मदद भी की लेकिन बिहार सरकार की ओर से अब तक कोई ठोस पहल नहीं दिखी, न कोई प्रतिनिधि परिवार से मिलने आया, न ही किसी तरह की सहायता दी गई. इस बात का दर्द परिवार के शब्दों में साफ झलकता है कि ‘अपने ही राज्य ने अपने बेटे को भुला दिया.’

हालांकि, स्थानीय स्तर पर प्रशासन के कुछ अधिकारियों ने व्यक्तिगत रूप से आकर संवेदना जरूर प्रकट की लेकिन परिवार को जिस सहारे की उम्मीद थी वह अब तक अधूरी ही है. परिवार ने केंद्र सरकार से मांग की है कि आतंकवाद के खिलाफ अब निर्णायक और अंतिम कार्रवाई की जाए ताकि किसी और परिवार को इस तरह का दर्द न सहना पड़े, कोई और बच्चा अपने पिता को इस तरह खोते हुए न देखे.

बड़े भाई के नक्शेकदम पर छोटा भाई
इस दर्द के बीच एक उम्मीद की किरण भी है. मनीष रंजन के छोटे भाई प्रवीण कुमार ने अपने भाई के नक्शेकदम पर चलने का फैसला किया है. वह भी इंटेलिजेंस ब्यूरो में अधिकारी बनना चाहते हैं और इसी दिशा में उन्होंने इस साल मेन्स की परीक्षा भी दी है. परिवार को अब उन्हीं से उम्मीद है.

वर्तमान में मनीष रंजन की पत्नी और बच्चे पश्चिम बंगाल के झालदा में रह रहे हैं जबकि परिवार के अन्य सदस्य आज भी रोहतास जिले के अरुही गांव में उसी याद और दर्द के साथ जिंदगी काट रहे हैं.



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