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अप्रैल की बढ़ती गर्मी और लू के थपेड़ों के बीच हाइब्रिड मक्का की फसल को बचाए रखना एक चुनौती है. इस महीने में मक्का घुटने की ऊंचाई से लेकर फूल आने की अवस्था में होती है, जहां पानी की कमी पैदावार को 25-40% तक घटा सकती है. ऐसे में किसानों को सही समय पर सिंचाई करते रहना चाहिए. जिससे की फसल में नमीं बनी रहे और दाने मजबूत हों.
कृषि एक्सपर्ट डॉ हादी हुसैन खान ने बताया कि अप्रैल में तापमान आमतौर पर 35°C से 42°C के बीच रहता है. ऐसे में मिट्टी की किस्म के आधार पर हाइब्रिड मक्का में 7 से 10 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करनी चाहिए. अगर मिट्टी रेतीली है, तो यह अंतराल 5 से 6 दिन भी हो सकता है. इस समय पौधों में वाष्पोत्सर्जन तेजी से होता है, जिसे बनाए रखने के लिए मिट्टी में नमी जरूरी है.

पौधा खुद बोलकर अपनी जरूरत बताता है. अगर मक्का की पत्तियां सुबह 10 बजे के बाद अंदर की ओर मुड़ने लगें, तो समझ लें कि उसे तुरंत पानी चाहिए. इसके अलावा, अगर पुरानी पत्तियां समय से पहले पीली होकर सूखने लगें या मिट्टी में दरारें दिखने लगें, तो यह गंभीर जल तनाव का संकेत है.

अप्रैल के अंत तक मक्का में फूल और बालियां निकलने लगती हैं. यह फसल चक्र का सबसे संवेदनशील समय है. इस दौरान अगर एक दिन भी पानी की कमी हुई, तो परागण की प्रक्रिया प्रभावित होगी और भुट्टे में दाने नहीं भरेंगे. इस अवस्था में खेत में 50 से 60% नमी हमेशा बनी रहनी चाहिए.
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सिंचाई का निर्णय लेने के लिए ‘बॉल टेस्ट’ करें. पौधे की जड़ के पास से 6 इंच गहरी मिट्टी निकालें और उसे हथेली से दबाकर गोला बनाएं. अगर गोला आसानी से बन जाए और हाथ में नमी महसूस हो, तो सिंचाई की जरूरत नहीं है. अगर मिट्टी बिखर जाए या गोला न बने, तो समझें कि फसल प्यासी है और सिंचाई का समय आ गया है.

तेज धूप में सिंचाई करने से बचें. हमेशा सुबह जल्दी या शाम के समय पानी दें, क्योंकि दिन में पानी देने से मिट्टी का तापमान अचानक गिरता है, जिससे पौधों को थर्मल शॉक लग सकता है. संभव हो तो ‘नाली विधि’ अपनाएं, जिससे पानी सीधे जड़ों तक पहुंचता है और बर्बादी कम होती है.

हाइब्रिड मक्का को पानी तो चाहिए, लेकिन जड़ों में पानी खड़ा रहना इसके लिए जहर के समान है. अप्रैल में अचानक होने वाली प्री-मानसून बारिश के बाद खेत में पानी जमा न होने दें. अधिक जलभराव से जड़ें सांस नहीं ले पातीं और पौधा पीला पड़कर सूखने लगता है. जल निकासी का उचित प्रबंध रखें.

वाष्पीकरण को रोकने के लिए खेत की कतारों के बीच सूखी घास या फसल अवशेषों की मल्चिंग करना फायदेमंद रहता है. इससे मिट्टी का तापमान नियंत्रित रहता है और सिंचाई का अंतराल 2 से 3 दिन बढ़ाया जा सकता है. यह तकनीक विशेष रूप से उन क्षेत्रों के लिए वरदान है यहां पानी की उपलब्धता सीमित है.

सिंचाई केवल पानी देना नहीं है, बल्कि यह उर्वरकों की कार्यक्षमता भी बढ़ाती है. अप्रैल में जब आप यूरिया की टॉप-ड्रेसिंग करें, तो उसके तुरंत बाद हल्की सिंचाई जरूर करें. नमी के बिना नाइट्रोजन गैस बनकर उड़ जाता है और पौधे को नहीं मिल पाता है. सही समय पर पानी और खाद का मेल ही भुट्टों को चमकदार और वजनदार बनाता है.


