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खिलाड़ियों और टीमों के बेहद करीब इन इन्फ्लुएंसर्स को पहुंच देना एक बड़ा जोखिम है. अचानक ये लोग बिना किसी फिल्टर के अंदर तक पहुंच बना लेते हैं, जबकि वर्षों से मेहनत कर रहे पत्रकारों को भी इतनी सहज पहुंच नहीं मिलती. इसके उलट, कुछ इन्फ्लुएंसर्स खासतौर पर महिलाएं कंटेंट बनाने के नाम पर खिलाड़ियों के साथ जरूरत से ज्यादा नजदीकी बनाते नजर आते रहे है.
क्रिकेट जैसे लोकप्रिय खेल को को क्या सच में सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स की जरूरत है?
नई दिल्ली. आईपीएल को लेकर भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के हालिया निर्देशों पर काफी चर्चा हो चुकी है. अनचाहे तत्वों, खासतौर पर हनी ट्रैप जैसे मामलों से लीग को बचाने के लिए उठाया गया यह कदम दरअसल काफी पहले ही उठाया जाना चाहिए था और धीरे-धीरे हालात ऐसे बनते जा रहे थे कि बोर्ड के लिए हस्तक्षेप करना जरूरी हो गया था, और सच कहें तो टूर्नामेंट की चमक भी कहीं न कहीं फीकी पड़ने लगी थी.
वक्त आ गया था कि बीसीसीआई सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स की बढ़ती दखलअंदाजी पर भी सख्ती से लगाम लगाए. कई पत्रकार इस मुद्दे पर पहले ही अपनी राय दे चुके हैं, लेकिन यह साफ है कि खिलाड़ियों और टीमों के बेहद करीब इन इन्फ्लुएंसर्स को पहुंच देना एक बड़ा जोखिम है. अचानक ये लोग बिना किसी फिल्टर के अंदर तक पहुंच बना लेते हैं, जबकि वर्षों से मेहनत कर रहे पत्रकारों को भी इतनी सहज पहुंच नहीं मिलती. इसके उलट, कुछ इन्फ्लुएंसर्स खासतौर पर महिलाएं कंटेंट बनाने के नाम पर खिलाड़ियों के साथ जरूरत से ज्यादा नजदीकी बनाते नजर आते रहे है.
क्रिकेट खेल है हीरो बाकी सब जीरो
आईपीएल की असली ताकत हमेशा क्रिकेट रहा है न ग्लैमर, न मनोरंजन बल्कि बेहतरीन क्रिकेट ने इस टूर्नामेंट को यहां तक पहुंचाया है बाकी सब सिर्फ सहायक तत्व हैं, कहानी का मुख्य हिस्सा नहीं. मई 2013 में कोलकाता में स्पॉट-फिक्सिंग जैसे बड़े विवाद के बावजूद हजारों दर्शकों का फाइनल देखने पहुंचना इस बात का प्रमाण है. उस समय सोशल मीडिया का इतना दबदबा भी नहीं था, फिर भी फैंस ने आईपीएल का साथ नहीं छोड़ा क्योंकि उनके लिए क्रिकेट ही सबसे अहम था सस्ते सोशल मीडिया हथकंडे अपनाना इस लीग को फायदा नहीं, बल्कि नुकसान ही पहुंचाएगा.
होटल लॉबी बन चुका था अड्डा
क्रिकेट जगत का लंबे समय से हिस्सा होने के नाते यह समझना मुश्किल नहीं कि मैदान के बाहर क्या-क्या होता है. होटल लॉबी अक्सर ऐसे लोगों का अड्डा बन जाती हैं, जिनका खेल से कोई सीधा संबंध नहीं होता. अगर अनुशासन पर सख्ती नहीं बरती गई, तो खिलाड़ियों के हनी ट्रैप जैसे मामलों में फंसने का खतरा हमेशा बना रहेगा. ये युवा खिलाड़ी होते हैं और एक छोटी सी गलती भी बड़ी समस्या बन सकती है. ऐसे में बीसीसीआई की यह एडवाइजरी बिल्कुल सही समय पर आई है.
‘लाइक’ के लिए लाचारी क्यों?
जहां तक इन्फ्लुएंसर्स का सवाल है, उन्हें अपने काम करने और पैसे कमाने का पूरा अधिकार है लेकिन खिलाड़ियों और टीम मैनेजमेंट तक इतनी आसान पहुंच देना पूरी तरह अनुचित है. मैदान और उससे जुड़ा हर क्षेत्र एक संरक्षित दायरा होना चाहिए, लेकिन अब यह सीमाएं तेजी से टूटती नजर आ रही हैं. सवाल यह है कि आखिर क्यों? कुछ इंस्टाग्राम लाइक्स, X पर रीपोस्ट्स या थोड़ी-बहुत फैन एंगेजमेंट के लिए क्या इस तरह के जोखिम उठाना सही है? आखिर टीमें खुद ऐसा क्यों चाहेंगी? ब्रॉडकास्टर्स ने मैदान तक विशेष पहुंच के लिए भारी रकम खर्च की है. ऐसे में खिलाड़ियों या उनके परिवारों सहित किसी को भी इन अधिकारों का उल्लंघन करने की अनुमति क्यों दी जाए? सुधारात्मक कदम उठाना बेहद जरूरी है और बीसीसीआई के हालिया निर्देश इस दिशा में एक मजबूत शुरुआत हैं.
सच तो यह है कि ऐसे कंटेंट की कोई जरूरत नहीं है न टीमों को, न बीसीसीआई को और न ही आईपीएल को इसकी दरकार है. मैदान और खिलाड़ियों के आसपास का दायरा हमेशा सुरक्षित और सीमित रहना चाहिए, जहां हर किसी की एंट्री नियंत्रित हो. आज जो कुछ कंटेंट बनाया जा रहा है, वह कई बार बेहद असहज और स्तरहीन लगता है.
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मैं, राजीव मिश्रा, वर्तमान में नेटवर्क 18 में एसोसिएट स्पोर्ट्स एडिटर के रूप में कार्यरत हूँ. इस भूमिका में मैं डिजिटल स्पोर्ट्स कंटेंट की योजना, संपादकीय रणनीति और एंकरिंग की जिम्मेदारी निभाता हूँ. खेल पत्रका…और पढ़ें


