सोमेंद्र तोमर (Somendra Tomar) को योगी सरकार 2.0 के दूसरे कैबिनेट विस्तार में राज्यमंत्री से प्रमोट कर स्वतंत्र प्रभार मंत्री बनाया गया है. ऐसा किया जाना केवल प्रशासनिक फैसला नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे 2027 विधानसभा चुनावों से पहले पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में भाजपा की बड़ी सोशल इंजीनियरिंग रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है. इसे पश्चिमी यूपी के प्रभावशाली गुर्जर समुदाय को पार्टी में पर्याप्त राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सम्मान के तौर पर देखा जा रहा है. खासकर ऐसे समय में जब समाजवादी पार्टी लगातार PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फार्मूले के जरिए भाजपा के पारंपरिक OBC वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश कर रही है. तो चलिए सोमेंद्र तोमर के प्रमोशन के राजनीतिक मायने क्या हैं…
पश्चिमी यूपी में कितना प्रभावशाली है गुर्जर वोट बैंक?
दरअसल, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गुर्जर समुदाय को राजनीतिक रूप से बेहद प्रभावशाली माना जाता है. मेरठ, बागपत, गाजियाबाद, गौतमबुद्ध नगर, बुलंदशहर, हापुड़, मुजफ्फरनगर, शामली, सहारनपुर और बिजनौर समेत कई जिलों में गुर्जर वोट निर्णायक भूमिका निभाते हैं. देखा जाए तो पश्चिमी यूपी की करीब 35 से 45 विधानसभा सीटों पर गुर्जर वोट सीधे तौर पर असर डालते हैं, जबकि 15 से अधिक सीटों पर उनका प्रभाव निर्णायक स्थिति तक पहुंच जाता है. यह समुदाय सिर्फ जातीय आधार पर नहीं बल्कि क्षेत्रीय नेतृत्व और स्थानीय समीकरणों के हिसाब से भी वोट डालता है. यही वजह है कि भाजपा, सपा, रालोद और बसपा सभी दल इस समुदाय को साधने की कोशिश करते रहे हैं.
भाजपा की ताकत और कमजोरी कहां?
2013 के मुजफ्फरनगर दंगों और उसके बाद बने हिंदुत्व राष्ट्रवाद के राजनीतिक माहौल में भाजपा ने पश्चिमी यूपी में जाटों के साथ-साथ गुर्जर वोट बैंक में भी मजबूत पकड़ बनाई थी. इसके बाद 2014, 2017 और 2019 के चुनावों में भाजपा को इसका बड़ा फायदा मिला. हालांकि 2022 के विधानसभा चुनाव और 2024 लोकसभा चुनाव में कुछ इलाकों में भाजपा को ग्रामीण असंतोष, किसान आंदोलन और स्थानीय जातीय नाराजगी का असर भी झेलना पड़ा.
भाजपा की सबसे बड़ी ताकत यह रही कि उसने गुर्जर समुदाय को सिर्फ वोट बैंक की तरह नहीं बल्कि सत्ता और संगठन दोनों में हिस्सेदारी देने की कोशिश की. हालांकि पार्टी की चुनौती यह भी है कि पश्चिमी यूपी में स्थानीय स्तर पर जाट-गुर्जर, गुर्जर-दलित और किसान राजनीति के समीकरण तेजी से बदलते रहते हैं. ऐसे में अगर विपक्ष मजबूत सामाजिक गठजोड़ बना लेता है तो भाजपा को नुकसान हो सकता है.
सोमेंद्र तोमर क्यों अहम हैं?
मेरठ दक्षिण से लगातार दूसरी बार विधायक बने सोमेंद्र तोमर छात्र राजनीति से निकले नेता हैं. उनकी पहचान सिर्फ गुर्जर चेहरे के रूप में नहीं बल्कि संगठनात्मक पकड़ वाले नेता के तौर पर भी रही है. भाजपा नेतृत्व मानता है कि युवाओं और शहरी पश्चिमी यूपी के जातीय समीकरणों के बीच तोमर पार्टी के लिए एक उपयोगी चेहरा साबित हो सकते हैं. उनका प्रमोशन यह संकेत भी माना जा रहा है कि भाजपा पश्चिमी यूपी में सिर्फ जाट नेतृत्व पर निर्भर नहीं रहना चाहती, बल्कि गुर्जर नेतृत्व को भी समानांतर रूप से मजबूत कर रही है. यही वजह है कि एक तरफ प्रदेश भाजपा अध्यक्ष भूपेंद्र सिंह चौधरी (Bhupendra Singh Chaudhary) जैसे जाट चेहरे को संगठन में महत्व मिला हुआ है, वहीं दूसरी तरफ सोमेंद्र तोमर को सरकार में प्रमोट कर जाट-गुर्जर संतुलन साधने की कोशिश दिखाई दे रही है.
क्या सपा की गुर्जर महापंचायत का असर?
राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज है कि समाजवादी पार्टी द्वारा हाल के महीनों में पश्चिमी यूपी में आयोजित गुर्जर महापंचायतों और समुदाय के बीच बढ़ती सक्रियता ने भाजपा को भी सतर्क किया है. सपा प्रमुख अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) लगातार PDA फार्मूले के जरिए गैर यादव OBC और क्षेत्रीय जातीय समूहों को जोड़ने की रणनीति पर काम कर रहे हैं. पश्चिमी यूपी में गुर्जर समुदाय को लेकर सपा की सक्रियता इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि किसान आंदोलन के दौरान भाजपा के खिलाफ कुछ नाराजगी देखने को मिली थी. हालांकि अभी तक गुर्जर वोट पूरी तरह भाजपा से दूर जाता नहीं दिखा, लेकिन भाजपा यह जोखिम भी नहीं लेना चाहती कि 2027 से पहले विपक्ष इस वर्ग में मजबूत पैठ बना ले.
क्या यह PDA की काट है?
राजनीतिक विश्लेषकों का बड़ा वर्ग मानता है कि सोमेंद्र तोमर का प्रमोशन सीधे तौर पर भाजपा की ‘काउंटर PDA’ रणनीति का हिस्सा है. भाजपा अब सिर्फ हिंदुत्व या मोदी-योगी फैक्टर पर निर्भर रहने के बजाय जातीय प्रतिनिधित्व के संतुलन पर भी ज्यादा ध्यान दे रही है. यही वजह है कि हालिया मंत्रिमंडल विस्तार में OBC और दलित चेहरों को ज्यादा महत्व दिया गया. पार्टी यह संदेश देना चाहती है कि भाजपा सिर्फ ऊंची जातियों की पार्टी नहीं, बल्कि सभी सामाजिक वर्गों को प्रतिनिधित्व देने वाली पार्टी है. चूंकि उत्तर प्रदेश की सत्ता का रास्ता पश्चिमी यूपी से होकर गुजरता है.


