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Operation Meghdoot vs Operation Ababeel: सियाचिन ग्लेशियर पर कब्जा करने के लिए पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ ‘ऑपरेशन अबाबील’ की शुरूआत की थी. वहीं, पाकिस्तान अपने मंसूबों में सफल होता, इससे पहले भारतीय सेना ने बड़ा खेल कर दिया. ऑपरेशन मेघदूत शुरू कर भारतीय सेना ने वह पूरा इलाका अपने कब्जे में ले लिया था, जिसपर पाकिस्तान कब्जा करना चाहता था.
कारगिल का काइयां भारत की डेमोग्राफी बदलना चाहता था.
दरअसल, पाकिस्तान के ‘ऑपरेशन अबाबील’ की नींव 1949 में हुए कराची समझौते के साथ ही रख गई थी. यह समझौता भारत और पाकिस्तान के बीच हुए 1947 में हुए पहले युद्ध के बाद हुआ था. इस समझौते में भारत और पाकिस्तान के बीच लाइन ऑफ कंट्रोल प्वाइंट NJ9842 माना गया था. वहीं, ग्लेशियर को लेकर इस समझौते में एक ही लाइन लिखी गई थी और वह थी – ‘देंस नॉर्थ टू द ग्लेशियर्स’, जिसका मतलब था- ‘इसके बाद उत्तर की ओर ग्लेशियर तक’. पाकिस्तान बस इसी एक लाइन का फायदा उठाना चाहता था. वह करीब 76 किलोमीटर इलाके में फैले सियाचिन ग्लेशियर और सॉल्टोरो रिज पर कब्जा करना चाहता था.
मंसूबे पूरा करने के लिए पाकिस्तान ने क्या किया और क्या था भारत का जवाब?
- पाकिस्तान ने अपने दिल में यह गलतफहमी पाल रखी थी कि उसकी सीमा सियाचिन में कराकोरम तक जाती हैं. अपनी इस गलतफहमी को दुनिया के मन में बैठाने के लिए उसने अपने नक्शे में सियाचिन को दिखाना भी शुरू कर दिया था. सियाचिन का पूरा इलाका पाकिस्तान का हिस्सा है, दुनिया को यह भरोसा दिलाने के लिए उसने विदेशी पर्वतारोहियों को इस इलाके में जाने की इजाजत देना भी शुरू कर दिया था.
- इतना ही, पाकिस्तान ने जापान, अमेरिका और जर्मनी मूल के पर्वतारोहियों को पाकिस्तानी लाइजन अधिकारियों के साथ पर्वतारोहण पर भेजना भी शुरू कर दिया. सबसे पहले जर्मनी मूल के पर्वतारोहियों का एक जत्था ‘बिलाफोंड ला’ से होकर सियाचिन पहुंचा था. अब तक पाकिस्तान के इस खेल की जानकारी भारतीय सेना तक पहुंच चुकी थी. पाकिस्तान अपनी साजिश में आगे बढ़ता, इससे पहले भारतीय सेना एक्शन में आ गई थी.
- भारतीय सेना ने कर्नल नरेंद्र कुमार के नेतृत्व में हाई एल्टीट्यूड वॉरफेयर स्कूल के 70 जांबाजों के साथ सियाचिन ग्लेशियर के लिए रवाना किया. जांबाजों की इस टीम को भारतीय वायुसेना के चेतक हेलीकॉप्टर से ग्लेशियर तक पहुंचाया गया चेतक हेलीकॉप्टर ने सियाचिन ग्लेशियर पर पहली लैंडिंग की. इसी के साथ, ब्रिगेडियर केएन ठडानी के नेतृत्व में 68 सदस्यीय एक्सपेडिशन टीम ‘अप्सरसास-1’ पर चढाई पूरी की.
- अबतक भारतीय सेना ने सियाचिन में अपना मिलिट्री स्ट्रक्चर खड़ा कर दिया था. इसी बीच, भारतीय सेना को अपने एक सप्लायर के जरिए खबर लगी कि पाकिस्तान ने बड़ी तादाद में ‘आर्कटिक वेदर गियर’ का ऑर्डर दिया है. भारतीय सेना को समझते देर नहीं लगी कि इन आर्कटिक वेदर गियर का इस्तेमाल सिर्फ सियाचिन के ग्लेशियर में ही हो सकता है. इसके बाद, भारतीय सेना ने अपने पूरे खुफिया तंद्ध को सक्रिय कर दिया.
- 1984 के शुरुआत में रॉ के श्रीनगर स्टेशन चीफ ने भारतीय सेना को जानकारी दी कि पाकिस्तानी ट्रूप का मूवमेंट तेजी से बढ़ा है. साथ ही, गोमा इलाके में इक्विपमेंट की तैनाती और स्कार्दू से नई कम्युनिकेशन लाइन्स शुरू करने की जानकारी भी सामने आई. पाकिस्तान से आई खबर इससे भी ज्यादा दिलचस्प थी, पाकिस्तान ने नॉर्दर्न एरिया के फोर्स कमांड में तैनात भी जवानों की छुट्टियां को कैंसल कर दिया था.
- अब यह बात पूरी तरह से समझ में आ चुकी थी कि पाकिस्तान सियाचिन ग्लेशियर पर कुछ बड़ा करना चाहता था. इसी बीच, खबर आई कि पाकिस्तान अपना पहला हमला 17 अप्रैल को करने वाला है. इस बात की जानकारी तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और रक्षा मंत्री आर वेंकटरमन को दी गई. सरकार से हरी झंडी मिलते ही आर्मी चीफ जनरल अरुण वैद्य ने नॉर्दर्न आर्मी कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल पीएन हून को ऑपरेशन मेघदूत शुरू करने के लिए कहा.
- ऑपरेशन मेघदूत को 13 अप्रैल 1984 की तारीख तय हुई. इस दिन बैसाखी थी. पहले चरएा में कुमायूं रेजिमेंट की एक बटालियन लेफ्टिनेंट डीके खन्ना के नेतृत्व में जोजी ला दर्रे के लिए कूच कर गई. इसी के साथ, भारतीय वायुसेना के IL-76 और An-32 ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट से लेह बेस पर ट्रूप्स और सप्लाई एयरलिफ्ट की गई. जोरावर टास्क फोर्स बनाई गईं, जिसमें चार कुमायू, लद्दाख स्काउट्स और 19 कुमायूं के जांबाज शामिल थे.
- 13 अप्रैल 1984 की सुबह ऑपरेशन शुरू हुआ. लगभग 300 भारतीय सैनिकों को हेलीकॉप्टर से सियाचिन ग्लेशियर तक पहुंचाया गया. 14 अप्रैल तक मेजर आरएस संधू की यूनिट ने ग्लेशियर की अहम चोरियों पर अपना कब्जा जमा लिया था. 4 कुमायूं रेजिमेंट के कैप्टर संजय कुलकर्णी औश्र सेकेंड लेफ्टिनेंट भुयान की प्लाटून ने बिलाफोंड ला पर भी भारतीय तिरंगा फहराया दिया था. इसके बाद, कैप्टन पीवी यादव की यूनिट ने सॉल्टोरो रिज को भी अपने कब्जे में ले लिया.
- पाकिस्तान के आने से पहले भारतीय सेना ने सिया ला सहित अन्य दर्रों पर भी भारतीय परचम लहरा दिया था. भारतीय सैनिक सॉल्टोरो रिज की सभी प्रमुख चोटियों पर पैर जमाकर बैठ चुके थे. 7 अप्रैल 1984 को जब पाकिस्तानी हेलीकॉप्टर रेकी में भारतीय सैनिक दिखे, तो वह हैरान रह गया. इसके बाद, पाकिस्तान ने ऑपरेशन अबाबील शुरू किया, लेकिन पहले से ही देर हो चुकी थी. वे केवल सॉल्टोरो रिज तक ही पहुंच पाए.
- सियाचिन पर कब्जे के लिए 25 अप्रैल 1984 को पहली बार गोलीबारी हुई. इसके बाद, पाकिस्तान ने 23 जून 1984 को बड़ा हमला किया. लेकिन हर हमले में उसे मुंह की खानी पड़ी. भारत ने न केवल पूरे सियाचिन ग्लेशियर, बल्कि आसपास के अन्य ग्लेशियर और सॉल्टोरो रिज को पूरी तरह से अपने कब्जे में ले लिया था.
भारत को कैसे पता चला कि पाकिस्तान सियाचिन ग्लेशियर पर कब्जे की साजिश रच रहा है?
ब्रिटेन में भारत और पाकिस्तान की सेना का एक ही सप्लायर था. इसी सप्लायर से भारतीय सेना को पता चला था कि पाकिस्तान ने बड़ी तादाद में आर्कटिक गियर और हाई-एल्टीट्यूड इक्यूपमेंट ऑर्डर किए है. भारतीय सेना को पहले से भनक थी कि सियाचिन को लेकर पाकिस्तान के इरादे नेक नहीं हैं. साथ ही, स्पेशल आर्कटिक गियर और हाई-एल्टीट्यूड इक्यूपमेंट का इस्तेमाल सियाचिन ऑपरेशन के लिए ही किया जा सकता है. यही से भारतीय सेना को पाकिस्तान के असल मंसूबों के बारे में सबकुछ पता चल गया था.
कौन है कारगिल का काइयां, जिसने रची थी भारत के खिलाफ ‘ऑपरेशन अबाबील’ की साजिश?
सियाचिन ग्लेशियर पर कब्जे से लिए ऑपरेशन अबाबीन की साजिश रचने वाला कारगिल का काइयां कोई और नहीं, बल्कि ब्रिगेडियर परवेज मुशर्रफ था. यही ब्रिगेडियर परवेज मुशर्रफ आगे चलकर पाकिस्तान का आर्मी चीफ बना. परवेज मुशर्रफ ने एसएसजी कमांडोज और नार्दन लाइन इंफेंट्री के साथ मिलकर यह पूरी साजिश रची थी. कहा जाता है कि ऑपरेशन मेघदूत में मिली करारी हार कर बदला लेने के लिए परवेज मुशर्रफ ने आर्मी चीफ बनने के बाद कारगिल की साजिश रची थी.
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Anoop Kumar Mishra is associated with News18 Digital for the last 6 years and is working on the post of Assistant Editor. He writes on Health, aviation and Defence sector. He also covers development related to …और पढ़ें


