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India-Holland Historical Relation: भारत और हॉलैंड (आज का नीदरलैंड) का रिश्ता इन दिनों सुर्खियों में है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नीदरलैंड की ऐतिहासिक यात्रा संपन्न की है. इस दौरान सेमीकंडक्टर को लेकर बड़ा करार किया गया है. इस समझौते को गेमचेंजर बताया जा रहा है. लेकिन क्या आपको पता है कि हॉलैंड भारत की सरजमीं पर कदम रखने वाली दूसरी यूरोपीय ताकत थी. अंग्रेज उसके बाद आए थे. हॉलैंड ने सबसे पहले मसालों का व्यापार किया था. तमाम तरह के उबड़-खाबड़ रास्तों से गुजरते हुए भारत और हॉलैंड ने 400 साल से ज्यादा का सफर तय कर लिया है. पीएम मोदी की यात्रा ने इसे नई ऊंचाई दी है. (सभी तस्वीरें AI जेनरेटेड)
विदेशी निवेश के क्षेत्र में भी नीदरलैंड भारत के प्रमुख साझेदारों में शामिल है. उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, भारत में नीदरलैंड का कुल संचयी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश लगभग 52 बिलियन डॉलर तक पहुंच चुका है. विशेषज्ञों के मुताबिक, डच कंपनियां भारतीय बाजार में लॉजिस्टिक्स, बंदरगाह विकास, खाद्य प्रसंस्करण, नवीकरणीय ऊर्जा और तकनीकी क्षेत्रों में तेजी से निवेश बढ़ा रही हैं. दोनों देशों के बीच का संबंध 400 साल से भी ज्यादा पुराना है. यह द्विपक्षीय संबंध लगातार आगे बढ़ रहा है.

भारत और नीदरलैंड के संबंधों का इतिहास चार शताब्दियों से भी अधिक पुराना है. व्यापार, समुद्री संपर्क और औपनिवेशिक दौर से शुरू हुआ यह रिश्ता आज रणनीतिक साझेदारी, निवेश, जल प्रबंधन, कृषि और टेक्नोलॉजी सहयोग तक पहुंच चुका है. दोनों देशों के बीच संबंध केवल आर्थिक हितों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों, बहुलवाद और नियम आधारित वैश्विक व्यवस्था के साझा दृष्टिकोण पर भी आधारित हैं.

भारत-नीदरलैंड संबंधों की नींव 17वीं शताब्दी में पड़ी थी, जब डच व्यापारी भारत पहुंचे. पुर्तगालियों के बाद डच भारत आने वाले दूसरे यूरोपीय थे. वर्ष 1602 में डचों ने ‘यूनाइटेड ईस्ट इंडिया कंपनी’ की स्थापना की और इसके बाद भारतीय तटों पर व्यापारिक गतिविधियां तेज हुईं. डचों ने वर्ष 1605 में आंध्र प्रदेश के मुसलीपत्तनम में अपनी पहली व्यापारिक फैक्ट्री स्थापित की थी. केरल के कोचीन में भी डच ने फैक्ट्री खोली थी.
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इसके बाद डचों ने पुलीकट, सूरत, चिनसुरा और कासिमबाजार जैसे महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र विकसित किए. पुलीकट स्थित टकसाल से भगवान वेंकटेश्वर की आकृति वाले सोने के पैगोडा सिक्के जारी किए गए, जो उस समय के व्यापारिक प्रभाव का प्रतीक माने जाते हैं. हालांकि, 18वीं शताब्दी में डच शक्ति कमजोर पड़ने लगी. वर्ष 1741 में त्रावणकोर के राजा मार्तंड वर्मा ने कोलाचेल के युद्ध में डच सेना को पराजित किया. बाद में 1759 के बेदरा युद्ध में अंग्रेजों से हार के बाद भारत में डच प्रभाव लगभग समाप्त हो गया और 1825 तक वे पूरी तरह भारत से बाहर हो गए.

स्वतंत्र भारत और नीदरलैंड के बीच आधुनिक राजनयिक संबंध वर्ष 1947 में स्थापित हुए. तब से दोनों देशों के रिश्ते लगातार सौहार्दपूर्ण और सहयोगात्मक रहे हैं. वर्ष 2022 में दोनों देशों ने अपनी राजनयिक साझेदारी के 75 वर्ष पूरे किए. विदेश नीति विशेषज्ञों का मानना है कि दोनों देश लोकतंत्र, कानून के शासन, मानवाधिकारों और मुक्त एवं समावेशी हिंद-प्रशांत क्षेत्र के साझा मूल्यों को समर्थन देते हैं.

आर्थिक और वाणिज्यिक संबंध वर्तमान समय में इस साझेदारी की सबसे मजबूत कड़ी बनकर उभरे हैं. वित्त वर्ष 2023-24 में भारत और नीदरलैंड के बीच द्विपक्षीय व्यापार 27.34 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गया. इसमें भारत के पक्ष में 17.39 बिलियन डॉलर का व्यापार अधिशेष दर्ज किया गया. नीदरलैंड अब अमेरिका और संयुक्त अरब अमीरात के बाद भारत का तीसरा सबसे बड़ा निर्यात गंतव्य बन चुका है. भारत मुख्य रूप से पेट्रोलियम उत्पाद, फार्मास्यूटिकल्स, इलेक्ट्रिकल इक्विपमेंट और इंजीनियरिंग सामान का निर्यात करता है.

तमिलनाडु के तटीय क्षेत्र पुलिकट (जिसे ऐतिहासिक रूप से पझावेर्काडु के नाम से जाना जाता है) कभी भारत में डच ईस्ट इंडिया कंपनी (VOC) का प्रमुख केंद्र हुआ करता था. वर्ष 1609 में स्थापित यह बंदरगाह कोरोमंडल तट पर डच व्यापार और प्रशासन का मुख्यालय बना, जहां से मसालों, वस्त्रों और हीरों के व्यापार को ऑपरेट किया जाता था. बाद में क्षेत्रीय प्रशासनिक गतिविधियों को अन्य स्थानों पर ट्रांसफर कर दिया गया, लेकिन पुलिकट लंबे समय तक डच उपस्थिति का प्रमुख प्रतीक बना रहा.


