नई दिल्ली: देश की सबसे बड़ी अदालत के गलियारे मंगलवार को मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत के नेतृत्व वाली नौ-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने सबरीमाला मंदिर मामले की नींव पर ही प्रहार कर दिया. सालों से चले आ रहे इस कानूनी दंगल में एक नया और नाटकीय मोड़ तब आया जब सीजेआई ने 2018 के ऐतिहासिक फैसले का आधार बनी जनहित याचिका (PIL) को सिरे से खारिज करते हुए उसे कूड़ेदान में फेंकने लायक करार दिया. बेंच ने केवल शब्दों के बाण ही नहीं छोड़े बल्कि जनहित याचिकाओं के बढ़ते पब्लिसिटी और पॉलिटिकल कल्चर पर भी करारा तंज कसा. सीजेआई सूर्यकांत ने तीखा सवाल दागते हुए याचिकाकर्ता के वकील से पूछा, “क्या आप देश के मुख्य पुजारी हैं?”
सुप्रीम कोर्ट के इस सख्त रुख ने न केवल 2006 की उस मूल याचिका की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए हैं बल्कि भविष्य में आस्था और कानून के टकराव के मामलों में लॉबिंग और बिना आस्था वाली याचिकाओं के लिए दरवाजे भी कड़े कर दिए हैं. यह सुनवाई केवल एक मंदिर में प्रवेश का मुद्दा नहीं रह गई है बल्कि यह अब भारतीय न्यायपालिका की गरिमा और जनहित याचिकाओं की शुचिता की एक बड़ी अग्निपरीक्षा बन चुकी है.
सुप्रीमकोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियां
· याचिका की वैधता: मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि इस जनहित याचिका को बिल्कुल भी स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए था और इसमें दिए गए दस्तावेजों को कूड़ेदान में फेंक दिया जाना चाहिए था.
· दस्तावेजों पर सवाल: कोर्ट ने अखबार की रिपोर्टों और असत्यापित सामग्री पर भरोसा करने के लिए याचिका की आलोचना की और इसे न्यायिक विचार के अयोग्य माना.
· PIL का दुरुपयोग: जस्टिस नागरत्ना ने टिप्पणी की कि जनहित याचिका अब प्राइवेट, पब्लिसिटी, पैसा और पॉलिटिकल इंटरेस्ट लिटिगेशन बन गई है. जस्टिस सुंदरेश ने इसे कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग बताया.
· याचिकाकर्ताओं की मंशा: बेंच ने याचिकाकर्ताओं की मंशा पर सवाल उठाते हुए पूछा, “क्या आप देश के मुख्य पुजारी हैं?” और यह भी पूछा कि वकीलों के संगठन को बार के कल्याण के बजाय ऐसे मुद्दों में क्यों पड़ना चाहिए.
सुनवाई और संवैधानिक पीठ का विवरण
· बेंच का गठन: नौ-न्यायाधीशों की इस संविधान पीठ में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के साथ जस्टिस बीवी नागरत्ना, एमएम सुंदरेश, अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, अरविंद कुमार, एजी मसीह, आर महादेवन, प्रसन्ना बी वराले और जॉयमल्या बागची शामिल हैं.
· मौजूदा स्थिति: यह पीठ वर्तमान में सबरीमाला समीक्षा कार्यवाही से उत्पन्न व्यापक संवैधानिक प्रश्नों पर विचार कर रही है, जिसमें धार्मिक स्वतंत्रता और समानता के बीच संतुलन शामिल है.
· धार्मिक स्वतंत्रता की सीमा: कोर्ट ने इस पर चिंता जताई कि क्या वे लोग जो किसी विशेष देवता में विश्वास नहीं रखते, मंदिर में प्रवेश के अधिकार का दावा कर सकते हैं.
मामले की पृष्ठभूमि
· 2018 का फैसला: पांच न्यायाधीशों की पीठ ने 4:1 के बहुमत से केरल के सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर लगी सदियों पुरानी रोक को हटा दिया था.
· 2019 का संदर्भ: समीक्षा याचिकाओं पर विचार करते हुए कोर्ट ने बड़े संवैधानिक प्रश्नों को नौ-न्यायाधीशों की पीठ के पास भेज दिया था, जिसका फैसला होना अभी बाकी है.
सवाल-जवाब
1. सुप्रीम कोर्ट ने 2006 की सबरीमाला PIL के बारे में क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस याचिका को स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए था और इसके आधार के रूप में पेश किए गए असत्यापित दस्तावेजों को “कूड़ेदान में फेंक देना चाहिए था”.
2. PIL के बढ़ते दुरुपयोग पर जस्टिस नागरत्ना की क्या टिप्पणी थी?
जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि जनहित याचिका (PIL) अब निजी स्वार्थ, प्रचार (Publicity), पैसा और राजनीतिक हितों के लिए इस्तेमाल होने वाला हथियार बन गई है.
3. वर्तमान में कौन सी बेंच इस मामले की सुनवाई कर रही है?
वर्तमान में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के नेतृत्व वाली नौ-न्यायाधीशों की संविधान पीठ इस मामले और धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े व्यापक पहलुओं की सुनवाई कर रही है.


