आजमगढ़: आजमगढ़ का वह गांव जिसे कभी कट्टा फैक्ट्री के नाम से जाना जाता था. यह वही गांव है जिससे आजमगढ़ के अपराधिक कालखंड का इतिहास जुड़ा हुआ है. हम बात कर रहे हैं आजमगढ़ जिले के मुबारकपुर थाना क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले बम्हौर गांव की, जहां कभी खेतों से अनाज कम और देसी कट्टे ज्यादा निकलते थे. इस गांव के हर जंगल झाड़ियों के पीछे देसी कट्टा बनाने के उपकरण मिलते थे.
आखिर में यह हुआ करता था कि पूर्वांचल समेत देश में किसी भी संगीन अपराध या घटना की चर्चा होती थी, तो उसमें आजमगढ़ के बने हुए कट्टो और अवैध हाथियारों का जिक्र जरूर होता था. बिहार, मध्य प्रदेश के साथ साथ उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों में अवैध हथियारों का कारोबार बड़े पैमाने पर पनप रहा था. पुलिस की ओर से लगातार जगह-जगह पर बनाए जाने वाले इन अवैध हथियारों को पकड़ने की कार्रवाई भी होती थी.
जब पहली बार सुर्खियों में छाया बम्हौर
तमसा नदी के किनारे बसे आजमगढ़ के इस छोटे से गांव का नाम 90 के दशक में अपराधिक इतिहास में पहली बार सामने आया था. 12 अगस्त 1997 को जनपद का बम्हौर गांव तब सुर्खियों में आने लगा, जब देश के कैसेट किंग कहे जाने वाले टी-सीरीज के मालिक गुलशन कुमार की गोली मारकर हत्या कर दी जाती है. दरअसल जिस बंदूक और गोलियों से इस वारदात को अंजाम दिया गया था, उस पर लिखा होता है ‘मेड इन बम्हौर’.
रोज की तरह उस दिन भी गुलशन कुमार मुंबई के एक मंदिर से पूजा करके बाहर निकल रहे थे. इसी दौरान कुछ बाइक सवार हमलावरों ने उन्हें निशाना बनाकर उन पर हमला कर दिया और उन्हें 16 गोलियां मारी गईं. वह खून से लथपथ होकर वहीं गिर पड़े और मौके पर ही उनकी मौत हो गई थी.
हथियार पर लिखा था “मेड इन बम्हौर”
मामले की छानबीन करने के दौरान पुलिस को वह हथियार बरामद हुआ, जिससे गुलशन कुमार की हत्या की गई थी. जांच में पुलिस ने पाया कि उस हथियार पर लिखा था ‘मेड इन बम्हौर’. इसके बाद मुंबई पुलिस की टीम इस जगह को ढूंढने में लग गई. ऐसे कयास लगाए जाने लगे कि यह जरूर कोई देश होगा या फिर किसी देश का कोई बड़ा शहर. पुलिस की तलाश का सिलसिला लगातार चलता रहा और देखते ही देखते यूपी तक पहुंचा.
तब पता चला कि यह बम्हौर दुनिया का कोई देश या कोई बड़ा शहर नहीं, बल्कि यूपी के आजमगढ़ जिले का एक छोटा सा गांव है. इस खुलासे के बाद आजमगढ़ जनपद और यहां का यह छोटा सा गांव लोगों में चर्चा का विषय बन गया था और देखते ही देखते बम्हौर गांव अवैध हथियारों के कारोबार का हिस्सा बनता गया.
ऐसे शुरू हुआ था अवैध कारोबार
स्थानीय लोगों का कहना है कि बम्हौर गांव में हिंदू और मुसलमान समेत लोहार व कई अन्य पिछड़ी जातियों के लोग रहते थे. इन्हीं में से कई साल पहले लोहे का काम करने वाले एक लोहार की ओर से चोरी छिपे अवैध हथियार बनाने का काम शुरू किया गया था. इसी के बाद से धीरे-धीरे इस जगह पर अवैध तमंचे बनाने का कारोबार पनपने लगा था. लोग तमसा नदी के किनारे आसपास की जंगल व झाड़ियों के पीछे इन अवैध हथियारों को बनाने का काम करते थे. तमसा नदी का किनारा इन अवैध हथियारों के बनाने का सबसे बड़ा अड्डा बना हुआ था.
पुलिस और जांच एजेंसीयों की सख्ती
गुलशन कुमार की हत्या की घटना के बाद आजमगढ़ जिला लगार चर्चा का हिस्सा बन गया था. जनपद का यह छोटा सा गांव पुलिस महकमें के साथ-साथ देश की तमाम बड़ी-बड़ी जांच एजेंसियों के केंद्र में आ जाता है और देखते ही देखते यह गांव पुलिस और जांच एजेंसीयों की छावनी में तब्दील हो जाता है. पुलिस की ओर से गांव में लगातार छापेमारी को अंजाम दिया जाता और वहां मौजूद कई घरों से अवैध हथियारों की बरामदेगी भी की गई. पुलिस की इसी सख्ती के बढ़ने के साथ इस गांव में धीरे-धीरे अवैध हथियारों का कारोबार खत्म होने लगा.
परिवर्तन की बयार
वर्तमान में इस गांव की दशा और दिशा दोनों बदल चुकी है. आपराधिक पृष्ठभूमि के तौर पर जहां पहले बम्हौर गांव की गिनती की जाती थी, वहीं अब इस गांव के युवा इसके विपरीत पढ़ाई-लिखाई और व्यवसाय में जुटे हैं. लोग यहां पर सरकारी नौकरियों में लगकर देश की सेवा कर रहे हैं. वहीं व्यवसाय करने के साथ अपने साथ-साथ कई लोगों को रोजगार भी उपलब्ध करा रहे हैं.
गांव के स्थानीय निवासी किशन ने लोकल18 से बातचीत करते हुए बताया कि 90 के दशक में इस गांव में देसी हथियार बनाने का काम होता था. गुलशन कुमार की हत्या के बाद इस गांव में पुलिस के छापे पड़ने लगे थे. आजमगढ़, मुबारकपुर पुलिस के साथ-साथ दिल्ली से भी पुलिस की टीम इस गांव में आती थी, लेकिन वर्तमान स्थिति बिल्कुल बदल चुकी है. उनका कहना है कि भाजपा सरकार बनी है, तब से यहां पर सख्ती बढ़ गई है और गांव में पूरी तरह से परिवर्तन आ चुका है.
सरकारी नौकरियों में लगे युवा
उन्होंने बताया कि गांव के जो लोग पहले कट्टा बनाने के काम में लगे हुए थे, उनमें से ज्यादातर लोग मर चुके हैं या फिर जेल में बंद हैं. इसके साथ ही उनके घर के युवा अब सरकारी नौकरियों में लग चुके हैं. कोई फौज में काम कर रहा है तो कोई पुलिस में भर्ती हो चुके हैं. वही बहादुर कनौजिया का कहना है कि इस गांव में कभी भी कोई असलहा बनाने की फैक्ट्री नहीं हुआ करती थी. गांव के कुछ लोग जरूर इस काम में लगे हुए थे, जो अब खत्म हो चुका है.
वही गांव में पूर्वांचल एक्सप्रेसवे के बन जाने से भी बेहद परिवर्तन देखने को मिला है. गांव में पहले जंगल झाड़ियां ज्यादा हुआ करती थी, जिसकी आड़ में इस तरीके का काम किया जाता था. उन्होंने बताया कि इन्हीं कारणों की वजह से आजमगढ़ के युवाओं को बाहर के बड़े शहरों में रहने और कमाने में भी अक्सर समस्याएं देखने को मिलती थी, लेकिन अब सब कुछ परिवर्तित हो चुका है.


